भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1260
* प्रभासखण्ड *१२३१

लोकोंको अपना ग्रास बनानेवाले भगवान् काल ध्रुवके पुत्र हैं। सोमके पुत्रोंके नाम वर्चा और बुध हैं। धरके हुत, हव्यवह और द्रविण—ये तीन पुत्र हुए। अनलके कई पुत्र हुए, जो अग्निके समान गुणवाले ही हैं। अनिलके दो पुत्र हुए—मनोजव और अविज्ञातगति। प्रत्यूषके पुत्र योगी देवल हुए। बृहस्पतिकी बहिन ब्रह्मवादिनी आठवें वसु प्रभासकी पत्नी हुई। उसीके पुत्र शिल्पकर्म करनेवाले प्रजापति विश्वकर्मा हुए। मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, पान, नेमि, यम, नृप, हंस, नारायण, विभु तथा प्रभु—ये बारह साध्य (या तुषित) देवता कहे गये हैं।

अब कश्यपकी सन्तानोंका वर्णन करता हूँ। अंश, धाता, भव, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु—ये सहस्र किरणोंवाले बारह आदित्य (अदितिके पुत्र) हैं। अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रेवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सवित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित—ये ग्यारह रुद्रगण हैं; जो असंख्य रुद्रगणोंके स्वामी हैं (इन्हें सुरभिकी सन्तान कहा जाता है)। बलपर गर्व रखनेवाली दितिने दो पुत्र प्राप्त किये—ज्येष्ठका नाम हिरण्यकशिपु और छोटेका नाम हिरण्याक्ष था। हिरण्यकशिपुके चार महाबली पुत्र हुए, जिनमें प्रह्लाद ज्येष्ठ थे, उनसे छोटेका नाम अनुह्लाद था। अनुह्लादसे छोटे क्रमशः ह्लाद और ह्रद थे। ह्रदके दो पुत्र हुए—सुन्द और उपसुन्द। ह्लादके एक ही पुत्र हुआ, जो मूक नामसे विख्यात था। सुन्दका पुत्र मारीच था, जो ताड़काके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। उसे महाबली श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें मार डाला। मूक भी सव्यसाची अर्जुनके द्वारा किरात प्रदेशमें मारा गया। संह्लादके कुलमें निवातकवच नामक दैत्य उत्पन्न हुए, जिनकी संख्या तीन करोड़ बतायी गयी है। वे सभी अर्जुनके द्वारा मारे गये। गवेष्ठी, कालनेमि, जम्भ, बल्वल, शम्भु तथा विरोचन—ये प्रह्लादके पुत्र माने गये हैं। शम्भुके दो पुत्र हुए—धेनुक और सोमलोमा। विरोचनके एक ही पुत्र प्रतापी बलि हुए। हिरण्याक्षके पाँच पुत्र हुए जो बड़े पराक्रमी और महाबली थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—अन्धक, शकुनि, कालनाभ, महानाभ तथा भूतसन्तापन। इनकी लाखों सन्तानें हुईं। ये सभी तारकामय संग्राममें मारे गये। इस प्रकार संक्षेपसे कश्यपजीकी सन्तानोंका वर्णन किया गया, जिनके द्वारा देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है।

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चन्द्रमाके द्वारा प्रभासक्षेत्रमें शिवकी आराधना, वरदान-प्राप्ति, सोमनाथके मन्दिरका निर्माण तथा ब्राह्मणोंको उनकी आराधनामें लगाना

देवी पार्वती ने पूछा— जगदीश्वर ! प्रभासक्षेत्रमें किस समय सोमनाथ लिंगकी स्थापना हुई है? रोहिणीवल्लभ चन्द्रमाने कृतार्थ होकर किस प्रकार उसकी आराधना की।

महादेवजीने कहा— प्रिये! वैवस्वत मन्वन्तरके दसवें त्रेतायुगमें दुर्वासासहित चन्द्रदेव उत्पन्न हुए। उस समय चन्द्रमाने सहस्रों वर्षोंतक तपस्या करके भगवान् शंकरका प्रत्यक्ष दर्शन किया और लोककर्ता ब्रह्माजीके द्वारा शिवलिंगकी स्थापना करायी। तत्पश्चात् पुनः सहस्र वर्षोंतक मुझ शंकरकी आराधना की। विधिपूर्वक मेरी पूजा करनेके अनन्तर अपने कार्यों और मनोरथोंकी सिद्धिके लिये निशानाथने मेरा स्तवन किया।

चन्द्रमा बोले— शिवके समान दूसरा कोई देवता नहीं है। रणभूमिमें शिवजीके समान कोई रक्षक नहीं है। संसारमें शिवके सदृश शरणागतवत्सल नहीं है तथा शिवके समान दूसरी कोई गति