संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पार्वती! मैं ही सृष्टि, पालन और संहारका कर्ता हूँ। सृष्टिकालमें मैं रजोगुणसे संयुक्त होता हूँ। पालनके समय सत्त्वगुणमें स्थित रहता हूँ और संहारकालमें तमोगुणसे युक्त हो जाता हूँ। मैं ही तीन रूपोंमें स्थित हूँ। अतः ब्रह्मा भी मुझ महेश्वरके ही अंश हैं। ब्रह्माका स्वामी मैं ही हूँ। विष्णु और ब्रह्मा दोनों ही मुझ सदाशिवसे अभिन्न हैं; क्योंकि मैं सर्वात्मक हूँ। शिव ही सम्पूर्ण जगत्का पालन करनेवाले विष्णु हैं। मेरे द्वारा निर्मित ब्रह्माण्डमें ये लोक हैं। इसीके भीतर सम्पूर्ण चराचर जगत् है। इस ब्रह्माण्डमें अबतक कितने चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण बीत गये और कितने अभी होंगे, इसकी गणना असम्भव है।
चन्द्रमाका जो तेज पृथ्वीपर प्राप्त हुआ, उससे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करनेवाली ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। उन्हीं ओषधियोंके द्वारा सम्पूर्ण लोक तथा चार प्रकारके प्रजा वर्ग जीवन धारण करते हैं। फल लगनेपर जिनका अन्त हो जाता है, ऐसी ओषधियाँ शण कहलाती हैं। वे सोलह प्रकारकी हैं—धान, जौ, गेहूँ, अणु, तिल, मोठ, कँगनी, कोदो, चीना, उड़द, मूँग, मसूर, निष्पाव, कुलथी, अरहर और चना—ये सोलह प्रकारके शण हैं। ये ग्रामीण ओषधियोंकी जातियाँ बतायी गयी हैं। ग्राम और वनमें उत्पन्न होनेवाली चौदह प्रकारकी ओषधियाँ यज्ञके काममें आती हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—धान, जौ, गेहूँ, अणु, तिल, कँगनी, कुलथी, साँवा, तिल्ली, बनतिल, गवेधु, उड़द, मकई और वेणुयव (बाँसधान)। तृण, गुल्म, लता, वीरुथ तथा गुच्छ आदि करोड़ों प्रकारके औषध और तृणोंके स्वामी चन्द्रमा हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं। भगवान् सोम जगत्का हित करनेकी इच्छासे सबको धारण करते हैं, इसलिये ब्रह्माजीने उन्हें बीज, ओषधि, ब्राह्मण तथा मन्त्रोंका राज्य प्रदान किया है। राजाके पदपर अभिषिक्त हो महातेजस्वी सोमने अपने प्रकाशसे तीनों लोकोंको पुष्ट किया है।
सृष्टि-कथा—दक्षकन्याओं तथा धर्म एवं कश्यपजीकी सन्ततिका संक्षिप्त वर्णन
महादेवजी कहते हैं—देवि! प्राचीन कालमें ब्रह्माजीसे दक्ष नामक पुत्र हुआ। ब्रह्माजीने दक्षको सृष्टि करनेकी आज्ञा दी। तब दक्षने अपनी पत्नी वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दसको तो उन्होंने धर्मके साथ ब्याह दिया। तेरह कश्यपजीको दीं। सत्ताईस कन्याओंका विवाह चन्द्रमाके साथ किया। चार कन्याएँ अरिष्टनेमिको, दो भृगुपुत्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको तथा दो अंगिरा मुनिको ब्याह दी। मरुत्वती, वसु, जामी, लंबा, भानु, अरुन्धती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या, विश्वा—ये धर्मराजकी स्त्रियोंके नाम हैं। अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू, त्विषा और वसु—ये कश्यपजीकी स्त्रियाँ हैं। अब इनके पुत्रोंके नाम सुनो—विश्वाके विश्वेदेव हुए। साध्याने साध्य देवताओंको जन्म दिया। भानुके भानु और मुहूर्ताके मुहूर्त नामक पुत्र हुए। लम्बाके पुत्रोंकी घोष नामसे प्रसिद्धि हुई। जामीसे नागवीथी नामकी कन्या हुई। संकल्पासे संकल्प नामक पुत्रका जन्म हुआ। मरुत्वतीसे मरुत्वान् नामवाले देवताओंकी उत्पत्ति हुई। अरुन्धतीके गर्भसे पृथ्वीपर होनेवाले समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। वसुसे आठों वसुओंका जन्म हुआ। आप, ध्रुव, सोम, वर, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। आपके पुत्र—देव, भ्रम, शान्त और ध्वनि हुए।