भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1258
  • प्रभासखण्ड * | १२२९ ---|---

वामस्य०' इत्यादि मन्त्रसे पाँचवीं परिक्रमा करनी चाहिये। 'त्रिभिष्टवं देव०' इस मन्त्रसे छठी परिक्रमाका विधान है। तथा सामगान करनेवाले मनीषी पुरुषोंने जो दस प्रकारके सामगान किये हैं, उनके द्वारा सातवीं परिक्रमा करनी चाहिये। हिंकार, प्रणव, उद्गीथ, प्रस्ताव, प्रहर, आरण्यक और निधन—ये सात प्रकारके साम कहे गये हैं। हिंकार और प्रणव न रहनेपर पाँच प्रकारका साम बताया गया है। पूर्वोक्त सात प्रकारके सामके अतिरिक्त साध्य नामक आठवाँ साम है। नवाँ वामदेव साम है और दसवाँ ज्येष्ठ साम कहा गया है, जो ब्रह्माजीको परम प्रिय एवं उत्तम प्रतीत होता है। इन सब सामोंका विधिपूर्वक जप करना चाहिये। जो निष्कामभावसे भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, वह इस क्षेत्रके माहात्म्यसे तथा अर्क—सूर्यके प्रभावसे निश्चय ही मोक्षको प्राप्त होता है। दूसरे स्थानोंमें एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे जो फल होता है, वही अर्कस्थलमें एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे प्राप्त होता है। सूर्यग्रहणमें जो स्नान, दान, जप और होम किया जाता है, वह सब यहाँ अर्कस्थलके प्रभावसे कोटिगुना हो जाता है। जो मनुष्य माघमासके कृष्ण पक्षमें रविवारयुक्त सप्तमीको अर्कस्थलके समीप जागरण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले सभी मनुष्योंके लिये अर्कस्थल पूजनीय हैं। कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि वह भगवान् सूर्यपर जलमें पैदा हुआ या मुरझाया हुआ अथवा किसी दोषसे दूषित या बासी फूल न चढ़ावे।

पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! सूर्यदेवको राहु कैसे ग्रस लेता है?

महादेवजीने कहा—देवि! मैं ग्रहणका कारण बतलाता हूँ, सुनो। विशेष समय आनेपर सूर्यदेव अपनी किरणोंसे अमृतकी धारा बहाते हैं। उस समय अमृतकी इच्छा रखनेवाला राहु अपने विमानपर बैठकर सूर्यबिम्बके नीचे आ जाता है। उसके बिम्बसे सूर्यका बिम्ब छिप जाता है। इसीको सूर्यग्रहण कहते हैं। वास्तवमें कोई भी सूर्यदेवको ग्रस नहीं सकता। वे निश्चय ही ग्रसनेवालेको जलाकर भस्म कर देंगे।

पूर्वकालमें उस क्षेत्रके भीतर लोकपाल, महर्षि, सिद्ध, विद्याधर, यक्ष, गन्धर्व तथा मुनिलोग सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। कुबेर, भीष्म, ययाति, गालव तथा साम्बने भी यहाँ उत्तम सिद्धि प्राप्त की है। यह माहात्म्यकथा नास्तिक, श्रद्धाहीन, क्रूर, दोषदर्शी एवं शठ मनुष्यसे न कहे। अपने पुत्र, शिष्य, धर्मिष्ठ, ज्ञानी तथा भगवान् सूर्यके भक्तको ही यह प्रसंग सुनाना चाहिये। जो तेजका सनातन आश्रय, जलकी गति, दिशाओंका अविनाशी दीपक, सिद्धिका खुला हुआ द्वार, जगत्‌का सामान्य नेत्र, आकाशरूपी सरोवरका सुवर्णमय कमल, दिगंगनाओंका देदीप्यमान कुण्डल तथा काल-गणनाका एकमात्र मापक यन्त्र है, वह भगवान् सूर्यका बिम्ब आप सब लोगोंकी रक्षा करे।

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चन्द्रमाकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा ओषधि आदिका पोषण

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! भगवान् शिवके इस प्रकार कहनेपर यशस्विनी देवी पार्वतीने इस प्रकार पूछा—'देव! आपके मस्तकपर जो ये चन्द्रमा विराजमान हैं, किसके पुत्र हैं? कब और किस प्रकार इनकी उत्पत्ति हुई है?'

महादेवजीने कहा—देवि! देवताओं और दानवोंने मिलकर जब क्षीरसागरका मन्थन किया, तब उसमेंसे चौदह रत्न निकले। उन्हीं रत्नोंमें ये महातेजस्वी चन्द्रमा भी थे। इनकी उत्पत्ति अमृतसे हुई है। इसीलिये विषपान करनेके पश्चात् इन्हें मैं आजतक सिरपर धारण करता हूँ। पूर्वकालमें मैंने चन्द्रमाको अपना शिरोभूषण बनाया है, इसीलिये लोग मुझे चन्द्रभूषण कहते हैं।