संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1274, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * | १२४५
'कपर्दी' की अग्रपूजाका हेतु और महिमा
पार्वतीजीने पूछा—भगवान्! आपने जो यह कहा है कि पहले 'कपर्दी' का दर्शन करे, इसका क्या कारण है? क्योंकि वह तो आपका सेवक है। स्वामीके पश्चात् ही सेवकका पूजन हो, यह सनातन धर्म है।
महादेवजी कहते हैं—प्रभासक्षेत्रमें सोमेश्वर देवके रूपमें जो लिंगरूपधारी सदाशिव विराजमान हैं, वे इन्द्रियातीत पुरुषोंद्वारा चिन्तन करने योग्य हैं। उनके वामभागमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु और दक्षिणभागमें प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान हैं। द्वापरकी सन्धिमें कलियुग प्राप्त होनेपर स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र तथा अन्य पापाचारी मनुष्य भी भगवान् सोमनाथका दर्शन करके शीघ्र ही स्वर्गलोकको चले जाते थे। बालक और वृद्ध सभी उत्तम गतिको प्राप्त होते थे। यह देख इन्द्र आदि देवता मेरी शरणमें आये और हाथ जोड़कर बोले—'भगवान्! आपके प्रसादसे यह सम्पूर्ण स्वर्ग मनुष्योंसे भर गया है, अतः अब हमारे रहनेके लिये कोई दूसरा स्थान दीजिये। जिनके लिये भयंकर कुम्भीपाक सजाया गया, रौरव तथा शाल्मलि आदि नरकोंका निर्माण किया गया, उन्हें स्वर्गमें स्थित देखकर यमराजने अपना व्यापार ही छोड़ दिया है।'
मैंने कहा—देवताओ! मैंने चन्द्रमाकी भक्तिसे संतुष्ट होकर उनसे यह प्रतिज्ञा की है कि प्रभासक्षेत्रमें सदा मेरा निवास होगा। मैं अपनी कही हुई बात किसी प्रकार पलट नहीं सकता। जो लोग वहाँ मेरा दर्शन करेंगे, वे निश्चय ही स्वर्गलोकमें जायँगे।
पार्वती! यह सुनकर देवता भयसे व्याकुल हो गये और तुम्हें वहाँ खड़ी देख हाथ जोड़कर बोले—'माता! तुम्हीं हमें आश्रय दो।' यों कहकर वे तुम्हारी स्तुति करने लगे।
देवता बोले—देवेश्वरी! तुम्हें नमस्कार है। जगदम्बा! तुम्हें नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाली देवी! तुम्हें नमस्कार है। सुवर्णके सदृश गौर आकृति धारण करनेवाली गौरी! तुम्हें नमस्कार है। जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाली महेश्वरि! तुम्हें नमस्कार है। शंकर प्रिये! तुम्हें नमस्कार है। कालका भी नाश करनेवाली कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार है। गिरिराजकुमारी! तुम्हें नमस्कार है। आर्ये! भद्रे! विशालाक्षि! त्रिलोकसुन्दरि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं रति, धृति, श्री, स्वाहा, स्वधा, सती, दुर्गा, मति, मेधा, पृथ्वी तथा सर्वस्वरूपा हो। तुमने इस सम्पूर्ण चराचर त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। नदियों, पर्वत-शिखरों, समुद्रों, गुफाओं, वनों, मन्दिरों तथा मुनियोंके आश्रमोंमें भी तुम विराज रही हो। देवि! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई स्थान मैं नहीं देखता, जहाँ तुम विद्यमान न हो। विशाल नेत्रोंवाली शिवे! हमारी यह प्रार्थना सुनकर महान् भयसे हमें बचाओ।
पार्वती! इन्द्र आदि देवताओंके इस प्रकार स्तवन करनेपर तुम करुणाके वशीभूत हो हाथ मलने लगीं। इससे गजराजके-से मुखवाला एक मनोहर कुमार प्रकट हुआ, जिसके चार भुजाएँ थीं। तब तुमने देवताओंसे कहा—'देवगण! मैंने तुम्हारे हितके लिये इस बालकको उत्पन्न किया है। यह मनुष्योंके समक्ष सब प्रकारके विघ्न उपस्थित करेगा, जिससे मोहग्रस्त होकर वे सोमनाथका दर्शन नहीं करेंगे और अपने पापोंके कारण नरकमें जायँगे।'
इसके बाद गजाननने तुमसे विनयपूर्वक पूछा—'माँ! मुझे आज्ञा दो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ?' तुमने कहा—'बेटा! तुम प्रभासक्षेत्रमें जाओ, जहाँ सोमेश्वरलिंगके रूपमें महादेवजी सदैव निवास करते हैं। वहाँ रहकर सोमनाथकी रक्षा करो, जिससे मनुष्योंको उनका दर्शन न होने