संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1273, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
करो।' समुद्रने कहा—'देवि! लाओ, बडवानलको मुझे दे दो।' तब सरस्वतीने बडवानलसे कहा—'जैसे अग्निदेव घीकी आहुति ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी जल भक्षण करो।' यों कहकर उसने वह बडवानल समुद्रको समर्पित कर दिया। इसके बाद सरस्वती पुनः नदी होकर नारदेश्वरके मार्गसे समुद्रमें मिल गयी। वह स्वरूपसे ही परम पवित्र थी, फिर प्रभासक्षेत्र और समुद्रके सम्पर्कसे अत्यन्त पुण्यमयी हो गयी। महाबली बडवानल समुद्रमें रहकर अपने मुखसे उसका जल पीने लगा। उसके उच्छ्वासकी वायुसे उठा हुआ जल ज्वारके रूपमें समुद्रसे बाहरतक दौड़ जाता है। इस प्रकार समस्त पातकोंका नाश करनेवाली सरस्वती ब्रह्मलोकसे उत्तम प्रभासक्षेत्रमें आयी है। समुद्रके समीप सोमनाथके दक्षिण एवं आग्नेय दिशामें सरस्वतीकी स्थिति है। पहले अग्नितीर्थमें स्नान करके मनुष्य विधिपूर्वक सरस्वतीका पूजन करे। वहाँ ब्राह्मणदम्पतिको भोजन कराकर उन्हें पहननेके लिये वस्त्र दे। उसके बाद कपर्दीश्वरकी पूजा करे। पार्वती! इस प्रकार यह सरस्वती नदीके प्रकट होनेका वृत्तान्त तुमसे कहा गया है।
सरस्वती नदीकी महिमा तथा वहाँ स्नान, दान और श्राद्धका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—प्रभासक्षेत्रमें सरस्वती नदी स्वर्गलोककी सीढ़ीके समान स्थित हैं। प्राची सरस्वती सर्वत्र दुर्लभ हैं; परंतु प्रभास, कुरुक्षेत्र और पुष्करमें उनका दर्शन विशेष दुर्लभ है। अग्नितीर्थके समीप सरस्वती बहती हैं। जो पहले उनका पूजन करता है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। सागर तीर्थ भी पापोंका नाश और पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। उसके दर्शनसे ही महायज्ञका फल होता है। अग्नितीर्थमें स्नान करके क्रमशः सरस्वती-कपर्दीश्वर, केदारेश्वर, भीमेश्वर तथा सोमेश्वरदेवका विधिपूर्वक पूजन करके बालरूपधारी ब्रह्माजीकी पूजा करे। इस प्रकार शैवी यात्रा बतायी गयी है।
जो मनुष्य भोजन करके या बिना भोजन किये, दिनमें अथवा रातमें चन्द्रभागा, गंगा और सरस्वती—इन तीन नदियोंका जल पीते हैं, वे देवताके समान हैं। जहाँ प्राची सरस्वती बहती हैं, वहाँ काल, अग्नि और यमराजका भय नहीं है। जैसे कामदा गौएँ हर समय फल देनेवाली होती हैं, वैसे ही प्राची सरस्वती भी हैं। जहाँ चिन्तामणिके समान प्राची सरस्वती हैं, वहाँ स्वर्ग और मोक्ष दोनों सुलभ हैं। अठासी हजार ऊर्ध्वरेता मुनि जहाँ संन्यास आश्रममें स्थित हैं, उस सरस्वतीसे बढ़कर और कौन-सा तीर्थ है। पार्वती! प्रभास नामक महाक्षेत्रमें सरस्वतीके उत्तर तटपर जो अपने शरीरका त्याग करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मनुष्य इस तीर्थमें श्राद्ध करेंगे, वे अपनी इक्कीस पीढ़ियोंके साथ स्वर्गलोकमें चले जायँगे। यहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको सदा ही स्नानकी विधि है। यहाँ श्राद्ध करनेसे पितरोंको अक्षय तृप्ति मिलती है। जो यहाँ अधिक अन्न दान करते हैं, वे मोक्ष मार्गको प्राप्त होते हैं। जो पुरुष ब्राह्मणको यहाँ सुन्दर दही देता है, वह गोलोकमें जाकर उत्तम भोग भोगता है। जो भक्तिपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणको ऊनी चद्दर दान करता है, उसे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। जो भक्तिपूर्वक इस तीर्थमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है।