भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1272, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1272
  • प्रभासखण्ड * १२४३

और पूर्ववाहिनी होकर प्राची सरस्वतीके नामसे विख्यात होना।

महादेवजी कहते हैं—ब्रह्माजीका यह आदेश पाकर सरस्वती अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करती हुई चलीं। उस समय अपने पीछे-पीछे आती हुई गंगाजीसे सरस्वतीने कहा—'सखी! अब मैं पुनः कहाँ तुम्हारा दर्शन करूँगी?' गंगाजीने स्नेहभरी वाणीमें उत्तर दिया—'सुव्रते! पश्चिम जाती हुई तुम जब-जब पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके देखोगी, तब-तब मुझे अपने समीप खड़ी हुई पाओगी। वहाँ मैं सब देवताओंके साथ तुम्हें दर्शन दूँगी।' तब उन्होंने गंगाजीसे विदा लेकर कहा—'भद्रे! अब तुम अपने स्थानको जाओ, मुझे पुनः तुम्हारा दर्शन प्राप्त हो।' इसी प्रकार सरस्वतीने यमुना, गायत्री और सावित्री आदि सखियोंको भी विदा किया। तदनन्तर हिमालय पर्वतपर आकर वे एक पाकड़के वृक्षसे नदीरूपमें प्रकट हुई और पृथ्वीपर उतरीं। उस समय पुण्यसलिला सरस्वतीदेवीकी ब्रह्मर्षिगण स्तुति कर रहे थे। बडवानलको लेकर वह नदी बड़े वेगसे चली और पृथ्वी फोड़कर पातालमें प्रवेश कर गयी। कहीं-कहीं मर्त्यलोकमें भी प्रत्यक्ष हो जाती थी। इस प्रकार पातालमार्गसे समुद्रके निकट गयी। खदिरामोद नामक वनमें पहुँचकर सरस्वतीने समुद्रको देखा और बडवानलको लेकर उसके समीप जानेका विचार किया। जब वह दक्षिणकी ओर मुख करके प्रस्थित हुई, उसी समय वेदोंके पारंगत विद्वान् चार महर्षि प्रभासक्षेत्रमें आये। उनके नाम इस प्रकार हैं—हिरण्य, वज्र, न्यंकु और कपिल। वे चारों तपस्वी थे। उन्होंने अलग-अलग स्नान करनेके लिये सरस्वतीका आवाहन किया। इतनेमें ही समुद्र भी सहसा सरस्वतीके सम्मुख उपस्थित हुआ। तब सरस्वतीने पाँच धाराओंमें विभक्त होकर उन सबको सन्तुष्ट किया। इससे इस पृथ्वीपर उसके पाँच नाम विख्यात हुए—हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला और सरस्वती। यह पंचस्रोता सरस्वती अपने भीतर जलपान और स्नान करनेसे मनुष्योंके पाँच महापातकोंका नाश करती है। एक सप्ताहतक वहाँ उपवास, जप, होम, स्नान और जलपान करनेसे वह सब पापोंका नाश कर देती है। सरस्वती अपने भीतर आचमन और स्नान करनेपर मनुष्योंकी घोर ब्रह्महत्याका तथा कपिला मदिरापानरूप महापातकका नाश करती है। न्यंकु नदीमें स्नान करके पुरुष चोरीके महापातकसे मुक्त हो जाता है। वज्रिणी नदीका जल पीनेसे गुरुपत्नीगमनरूप महापातकका नाश होता है। हरिणी नदी सात दिनोंतक स्नान करनेसे संसर्गजनित महापातकका अपहरण करनेवाली है। इस तरह पाँच धाराओंमें विभक्त सरस्वती नदी सब पातकोंका निश्चय ही नाश कर देती है। तदनन्तर पुनः बडवानलको लेकर सरस्वती समुद्रके समीप स्थित हुईं। बडवानलने उठती हुई तरंगोंसे युक्त समुद्रको देखकर सरस्वतीसे पूछा—'भद्रे! यह क्या है? क्षारसमुद्र मुझसे डरता क्यों है?' सरस्वतीने हँसकर कहा—'अग्ने! तुमसे कौन भयभीत न होगा।' बडवानल बोला—'भद्रे! मैं तुम्हें वर दूँगा, इच्छानुसार वर माँगो।' तब सरस्वतीने भगवान् विष्णुका स्मरण किया। भगवान्‌ने हृदयमें प्रकट होकर उसे दर्शन दिया। सरस्वतीने पूछा—'भगवन्! बडवानल मुझे वरदान देता है; बताइये, मैं इससे क्या माँगूँ?' हृदयस्थित भगवान्‌ने कहा—'कल्याणी! तुम उससे कहो कि वह अपना मुँह सूईके समान बना ले।' तब सरस्वतीदेवीने उससे कहा—'बडवानल! तुम सुईके समान मुँह बनाकर समुद्रका जल पीते रहो।' उसके यों कहनेपर बडवानलने सूईके छिद्रके समान अपना मुँह कर लिया। जैसे घटीसूचक पात्रमें धीरे-धीरे जल प्रवेश करता है, उसी प्रकार वह भी जल पीने लगा।

महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर सरस्वतीने समुद्रको बुलाकर कहा—'तुम सब देवताओंके आदि तथा प्राणियोंके प्राण हो, भगवान् विष्णुकी आज्ञासे यहाँ आकर इस बडवानलको ग्रहण

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