संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सोमनाथके दर्शन-पूजनकी महिमा और पंचस्रोता सरस्वतीका आविर्भाव तथा माहात्म्य; बडवानलका समुद्रमें वास
महादेवजी कहते हैं—देवि! इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान करके समुद्रको अर्घ्य दे; गन्ध, पुष्प, वस्त्र और चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे; तत्पश्चात् तर्पण करके भगवान् कपर्दीके समीप जाय। उनकी भी पुष्प, धूप, गन्ध तथा वस्त्रद्वारा भक्तिपूर्वक पूजा करे। 'गणानां त्वां' इत्यादि मन्त्र पढ़कर उन्हें अर्घ्य निवेदन करे। शूद्रोंको अष्टाक्षर मन्त्र (गं गणपतये नमः)-का उच्चारण करके अर्घ्य देना चाहिये। तदनन्तर सोमनाथजीके समीप जाय। उन्हें विधिसे स्नान कराकर शतरुद्रियका जप (पाठ) करे। रुद्रपंचांगोंका तथा अन्यान्य रुद्रसंहिताओंका भी जप करना चाहिये। दूध, दही, घी, मधु तथा इक्षुरससे सोमेश्वरको नहलाकर उनके अंगोंमें कुंकुमका लेप करे। उसमें कपूर, खस और कस्तूरीको भी मिलाये रखना चाहिये। इसके बाद सुगन्धयुक्त चन्दन और फूलोंसे पूजा करे। नाना प्रकारके धूप निवेदन करके उन्हें वस्त्रसे आवेष्टित करे। तत्पश्चात् उत्तम नैवेद्य अर्पण करे और इच्छानुसार स्तुति करे। साष्टांग प्रणाम करके गीतवाद्य आदिका आयोजन करे। धर्म-कथा सुने और भगवान्की परिक्रमा करे। तदनन्तर ब्राह्मणों, तपस्वियों, दीनों, अन्धों, कंगालों तथा भिक्षुओंको अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। उस दिन उपवास करना चाहिये। जिस दिन पहले-पहल मनुष्य सोमनाथका दर्शन करे; उस तिथिको एक वर्षतक भक्तिपूर्वक उपवास करे। यों करके मनुष्य अपने जन्मका फल पा लेता है। पिता और माताके कुलका उद्धार कर देता है। सोमनाथका दर्शन करनेसे सब पापोंका नाश हो जाता है; अतः सात जन्मोंतक कभी दुःख, दारिद्र्य और दुर्भाग्यकी प्राप्ति नहीं होती। सोमनाथके प्रति भक्ति बढ़ती है। पहले दूधसे स्नान कराकर फिर जलसे स्नान कराना चाहिये। जो मनुष्य मध्याह्नकालमें और सन्ध्याके समय सोमेश्वर शिवकी आरतीका दर्शन करते हैं, वे फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते।
पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! प्रभासक्षेत्रमें सरस्वती नदी कहाँसे आयी है।
महादेवजीने कहा—देवि! सुनो। हरिणी, वज्रिणी, न्यंकु, कपिला तथा सरस्वती—इन पाँच स्रोतोंसे युक्त सरस्वती नदी इस क्षेत्रमें प्रवाहित होती है। एक समय देवाधिदेव भगवान् विष्णुने सरस्वतीसे कहा—'कल्याणि! तुम पश्चिम दिशामें क्षारसमुद्रके समीप जाओ और बडवानलको वहीं ले जाकर डाल दो। इससे सब देवता निर्भय हो जायँगे।' तब सरस्वती बोलीं—'मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। मेरे पिता विद्यमान हैं, मैं उनकी आज्ञाकारिणी पुत्री हूँ। ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाली कुमारी हूँ। पिताकी आज्ञाके बिना एक पग भी कहीं नहीं जाऊँगी।'
तब भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीके समीप जाकर कहा—'देवेश्वर! आप देवताओंका यह कार्य सिद्ध कीजिये।' उनके यों कहनेपर ब्रह्माजी अपनी कुमारी कन्यासे बोले—'देवि! तुम भयसे व्याकुल हुए उन सब देवताओंकी रक्षा करो।'
सरस्वती बोलीं—पिताजी! आपकी आज्ञासे मैं निश्चय ही वहाँ जानेके लिये उद्यत हूँ। परंतु यह भयंकर बडवानल मेरे शरीरको जला देगा। इसके सिवा इस समय भूतलपर कलियुग आया है। अतः कलियुगके पापाचारी मनुष्य मेरा स्पर्श करेंगे।
ब्रह्माजीने कहा—बेटी! यदि तुम पापी जनोंसे भरी हुई इस पृथ्वीका स्पर्श करना नहीं चाहतीं, तो पातालमें स्थित होकर इस बडवानलको समुद्रमें ले जाओ। जब बडवानलका ताप अधिक हो जाय, तब पृथ्वी फोड़कर प्रत्यक्ष हो जाना