संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1270, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* प्रभासखण्ड * १२४१
सरस्वती च सावित्री देवमाता विभावरी।
सन्निधाने भवत्वत्र तीर्थे पापप्रणाशने॥
जो सच्चिदानन्दस्वरूप, देवताओंके भी देवता, कण्ठमें नीला चिह्न धारण करनेवाले, दण्डधारी, सुन्दर हाथवाले, चक्रधारी तथा विश्वके उत्पादक हैं, उन भगवान् रुद्रको नमस्कार है, नमस्कार है। इस पापनाशक तीर्थमें आकर सरस्वती, सावित्री तथा देवमाता विभावरी निवास करें, हमें अपना सामीप्य दें।
सभी तीर्थोंके लिये यह मन्त्र बताया गया है। इसका उच्चारण करके विधिपूर्वक नमस्कार एवं स्नान करे। उस दिन उपवास भी करे। वर्षमें एक बार उस तिथिपर अवश्य उपवास करना चाहिये।
समुद्रमें स्नानकी विधि और महिमा
महादेवजी कहते हैं—सोमनाथके दक्षिणभागमें त्रिभुवनविख्यात पद्मक नामक तीर्थ है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। पहले सोमेश्वरके समीप क्षौर कराकर मन-ही-मन मेरा चिन्तन करते हुए उस तीर्थमें अपने केश डाल दे। उसके बाद पुनः स्नान करे। मनुष्य जो कुछ भी पाप करता है, वह सब केशोंमें स्थित होता है; अतः केशोंको अवश्य ही तीर्थमें फेंक देना चाहिये। सौभाग्यवती स्त्रियोंको चाहिये कि वे सब केशोंको हाथसे पकड़कर अग्रभागकी ओरसे दो अंगुल कटवा दें (उनके लिये मुण्डनकी विधि नहीं है)। मुण्डन और स्नानके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। सभी तीर्थोंमें मुण्डन और उपवासकी विधि है। जो पर्वका दिन छोड़कर और किसी समय प्रभासक्षेत्रमें बिना मन्त्रके स्नान करता है, वह उसका पुण्य-फल नहीं पाता। बिना मन्त्रके, बिना पर्वके और बिना क्षौरकर्म किये समुद्र-जलका स्पर्श नहीं करना चाहिये। निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करके सागरके जलका स्पर्श करना उचित है—
ॐ नमो विष्णुगुप्ताय विष्णुरूपाय ते नमः।
सान्निध्ये भव देवेश सागरे लवणाम्भसि॥
'समुद्रदेव! तुम भगवान् विष्णुसे सुरक्षित हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम साक्षात् विष्णुके स्वरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। देवेश्वर! विष्णो! आप इस क्षीरसागरके जलमें मेरे समीप स्थित हों।'
यों कहकर तीर्थसेवी मानव नदीपति समुद्रके जलमें स्नान करे। फिर श्रद्धायुक्त होकर तिलमिश्रित जलसे देवता, मनुष्य और पितरोंका तर्पण करे। सहस्रों जन्मोंमें मनुष्य जो पाप करता है, उसे एक बार समुद्रके जलमें नहाकर नष्ट कर देता है। ब्रह्माजीने समुद्रसे कहा है—'सागर! जबतक लोकमें तुम्हारी स्थिति रहेगी, जबतक आकाशमें सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र बने रहेंगे, तबतक पूर्वज तुम्हारे खारे जलके अमृतसे तृप्त होंगे। जो मनुष्य शुद्धचित्त होकर प्रतिमास तुम्हारे जलमें स्नान करेगा, उसे प्रतिदिन पुण्डरीक यज्ञका फल मिलेगा। श्रीसोमनाथ तथा समुद्रके बीचकी भूमिमें जिनकी मृत्यु होगी, वे पापी रहे हों तो भी निष्पाप होकर स्वर्गलोकमें जायँगे। महादेवि! समुद्रके भीतर पाँच करोड़ शिवलिंग हैं, जिन्हें समुद्रने इस मन्वन्तरमें अदृश्य कर दिया है। इसी प्रकार वहाँ अग्निकुण्ड तथा पद्म-सरोवर भी हैं, जो इस मन्वन्तरमें समुद्रजलसे आवृत हो गये हैं। दक्षिण ओर चक्र तथा मैनाकके मध्यभागमें सौ धनुष लंबा-चौड़ा सुवर्णमय कुण्ड है; सोमनाथसे दक्षिण सौ धनुषकी दूरीपर वह स्थान है। उत्तर मानससे पूर्व जहाँ कृतस्मरदेव हैं; वहाँतक उसकी सीमा है; यह गुप्त स्थान है।'