भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1269

१२४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बात करना और पण्डिताई दिखाना छोड़ दे।* यति, ब्रह्मचारी और विधवा-ये नित्य स्नान और श्वेत वस्त्र धारण करें।

सत्ययुगमें तप उत्तम है, त्रेतामें ध्यान, द्वापरमें यज्ञ और कलियुगमें केवल दान श्रेष्ठ धर्म है। मुनिलोग प्रभासमें पहुँचकर कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि तप करते हैं और दूसरे लोग कलियुगमें प्रभासक्षेत्रमें जाकर ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देते हैं; किंतु वे उस दानसे ही तपस्याका फल पा लेते हैं। धान्य, रत्न, गुड, सुवर्ण, तिल, रुई, शक्कर, घी, नमक और चाँदी - ये दस पर्वत कहे गये हैं (अर्थात् धान्य-पर्वत, रत्नमय पर्वत आदि रूपसे इन वस्तुओंके पर्वत (ढेरी)-का दान करना चाहिये)। गुड़, घी, दही, मधु, जल, रुई, तिल, कम्बल, रत्न तथा नमक-ये दस प्रकारकी वस्तुएँ धेनु मानी गयी हैं (इनकी धेनुका दान किया जाता है) इन दानोंमेंसे कोई-न-कोई एक दान विभिन्न तीर्थोंमें अवश्य करना चाहिये। महादेवि ! सरस्वती समुद्रसंगममें विद्वान् ब्राह्मणके लिये गृहस्थोपयोगी वस्तु एवं सर्वस्व दान करना चाहिये। बहुत हो या थोड़ा, ब्राह्मणोंको प्रिय वस्तुओंका ही दान करना चाहिये। जिस तीर्थमें शिवलिंग तथा निर्मल जलवाला जलाशय हो, वहाँ पहले अग्निहोत्र करके विशिष्ट दान देना चाहिये। प्रत्येक तीर्थमें देवताओं और पितरोंका तर्पण, श्राद्ध, दक्षिणासहित दान तथा गोदान करना चाहिये। यह आवश्यक विधि है। देवताओंको स्नान कराकर चन्दन लगाये और उनकी पूजा करे। पृथ्वीका भी भक्तिपूर्वक पूजन और लेपन करे। देवमन्दिरमें चूना लगाकर उसे सफेद करे। यदि मन्दिर पुराना हो गया हो तो उसका जीर्णोद्धार करे। देवसेवाके लिये फुलवाड़ी लगाये। निर्मल जलका कुआँ बनवाये तथा वन-उपवनका निर्माण कराये। ब्राह्मणोंको प्रचुर दान दे और देव-पूजन करे। सर्वत्र देवयात्राके लिये यह विधि नियत की गयी है। प्रसिद्ध तीर्थमें महादान और मध्यममें मध्यम श्रेणीका दान करे। गोदान तो सभी तीर्थोंमें करनेयोग्य है। इस प्रकार भक्तिपूर्वक दान करके मनुष्य अपने जन्मका फल पा लेता है।

पार्वतीजीने पूछा- प्रभो! जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें आकर भी भक्ति, दान, स्नान और मन्त्रसे विहीन हैं, उन्हें क्या फल मिलता है? यह बतायें।

महादेवजीने कहा- देवि ! धनी हों या निर्धन, मन्त्रज्ञ हों या मन्त्ररहित, जो प्रभासमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सभी शिवलोकको जाते हैं। प्रिये ! जो मन्त्रहीन और निर्धन मनुष्य वहाँ देह-त्याग करते हैं, उन्हें मैं एक बड़ा भारी विमान देता हूँ। वे स्नान-दानके अनुरूप परम पदको प्राप्त होते हैं। कोई स्नानके प्रभावसे, कोई दानसे, कोई सोमेश्वरलिंगके प्रभावसे, कोई लिंगपूजासे, कोई ध्यानके प्रभावसे, कोई योगकी महिमासे, कोई मन्त्र-जपसे, कोई तपसे, कोई तीर्थसंन्याससे तथा कोई भक्तिभावके अनुसार वहाँ परमपदको प्राप्त होते हैं। ये तथा और भी बहुत-से उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीके लोग सूर्यसदृश तेजस्वी विमानोंद्वारा शिवलोकमें जाते हैं।

पहले प्रणवका उच्चारण करके तीर्थके पवित्र जलका स्पर्श करे। तदनन्तर भीतर प्रवेश करके मन्त्रपाठपूर्वक स्नान करे। मन्त्र इस प्रकार है-

ॐ नमो देवदेवाय शितिकण्ठाय दण्डिने।
रुद्राय वामहस्ताय चक्रिणे वेधसे नमः ॥


* विधवा चैव या नारी तस्या यात्राविधिं ब्रुवे। कुंकुमं चन्दनं चैव ताम्बूलं च रजस्तथा ॥
रक्तवस्त्राणि सर्वाणि शय्याद्यास्तरणानि च। अशिष्टैः सह संभाशां द्विवारं भोजनं तथा ॥
पुंसां प्रदर्शनं चैव हासं चैव विवर्जयेत्। सशब्दोपानहौ चैव नृत्यगीतं च वर्जयेत् ॥
धारणं चैव केशानामञ्जनं च विलेपनम्। असतीजनसंसर्गं पाण्डित्यं च परित्यजेत् ॥
(स्क० पु०, प्रभा० ख० २६। ७८-८१)