भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1268, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1268
  • प्रभासखण्ड * १२३९

तीर्थमें क्षीण हो जाता है, परन्तु तीर्थमें किया गया पाप अन्य स्थानोंमें कभी नष्ट नहीं होता है। तीर्थसेवन करनेवाला जो ब्राह्मण अत्यन्त क्लेशग्रस्त होनेपर भी किसीसे दान नहीं लेता, सत्य बोलता और चित्त-वृत्तियोंको रोककर ध्यानस्थ रहता है, उसीके लिये तीर्थ उपकारक होता है। सत्ययुगमें पुष्कर, त्रेतामें नैमिषारण्य, द्वापरमें कुरुक्षेत्र तथा कलियुगमें प्रभासक्षेत्र मुख्य माना गया है। एक मनुष्य सहस्र युगोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है और दूसरा केवल प्रभास-तीर्थकी यात्रा करता है; दोनोंका फल समान है। प्रभास-तीर्थमें पहुँचकर मनुष्य सवारी छोड़ दे और अपने ही चरणोंसे पैदल चले। नाचते, हँसते, गाते और कीर्तन करते हुए सोमेश्वरदेवके समीप जाय; वहाँ सबसे पहले जटाजूटधारी भगवान् शिवका दर्शन करे। सोमनाथके सम्मुख स्थित हुए उस पुरुषको देखकर पितर सदैव संतुष्ट होते हैं, पितामह हर्षध्वनि करते हैं और कहते हैं—'हमारे वंशका सुपुत्र हमें तारनेके लिये प्रस्थित हुआ है।' सोमनाथजीके समीप जाकर पहले क्षौर कराये, तीर्थमें उपवास करे। गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं है, कृष्णके समान दूसरी गति नहीं है, गायत्रीके सदृश दूसरा जपनीय मन्त्र नहीं है, व्याहृति-होमके समान होम नहीं है, जलके भीतर अघमर्षण-जपके समान दूसरा कोई पापनाशक कर्म नहीं है; तथा तीर्थमें उपवास करनेसे बढ़कर और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जो पापियोंके सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा सत्पुरुषोंको उनके अभीष्ट मनोरथोंको देनेवाला हो। देवस्थानमें उपवास करनेका विशेष विधान है। उपवास ही ब्राह्मणका श्रेष्ठ तप कहा गया है। छठे समय भोजन करना शूद्रोंके लिये महान् तप है। वर्णसंकरोंके लिये एक दिनका उपवास ही श्रेष्ठ तप है। यदि शूद्र छठे कालसे अधिक उपवास करे अर्थात् वह तीन दिनसे अधिक समयतक बिना भोजन किये तप करता रहे तो राष्ट्रकी हानि होती है तथा राजाके लिये महान् उपद्रव प्राप्त होता है। शूद्रको चाहिये कि वह कुशा न उखाड़े, कपिला गौका दूध न पिये, पीपलके पत्तेपर भोजन न करे, ॐकारका उच्चारण न करे, यज्ञका पुरोडाश न खाय, यज्ञोपवीत न पहने और वेद न पढ़े। शूद्रके कर्म केवल देवता-आदिको नमस्कार करनेमात्रसे सिद्ध हो जाते हैं (मन्त्रयुक्त प्रार्थनाकी आवश्यकता नहीं रहती)। शूद्रके लिये जिन कर्मोंका निषेध किया गया है, उन्हें यदि वह करता है तो वह अपने पितरोंके साथ नरकमें डूबता है। जिसने अपनी ग्यारह इन्द्रियोंको वशमें कर लिया है, वही तीर्थका फल पाता है; दूसरे अजितेन्द्रिय मनुष्य केवल क्लेशके भागी होते हैं। जो मानव तीर्थमें पितरोंका श्राद्ध और स्नान करता है तथा सब प्राणियोंके हितमें संलग्न रहता है, वह तीर्थके पूर्ण फलको पाता है। जो पाखण्डी, लोभी और परस्त्रीपरायण होकर तीर्थयात्रा करता है, वह केवल पापका भागी होता है।

महादेवि! यों जानकर मनुष्य विधिपूर्वक तीर्थयात्रा करे। पहले तीर्थमें उपवास करके श्रद्धायुक्त हो दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करे, उसके बाद वहाँ भोजन करे। ब्राह्मणको उस दिन कहीं भी पराया अन्न नहीं खाना चाहिये। भोजन देनेवालेको सौगुना पुण्य मिलता है; अतः व्रती, तीर्थयात्री एवं विशेषतः विधवाको चाहिये कि वह तीर्थमें उपवास करे और यथासंभव दूसरेको अन्न दे। पराया अन्न भोजन करनेपर जिसका अन्न खाया जाता है, उसीको पुण्य-फल प्राप्त होता है।

अब मैं विधवा स्त्रीके लिये तीर्थयात्राकी विधि बतलाता हूँ। विधवाको उचित है कि वह रोली, चन्दन, पान, पुष्पमाला, रंगीन वस्त्र, शय्या आदि बिछावन, अशिष्ट मनुष्योंसे वार्तालाप, दुबारा भोजन, पुरुषकी ओर देखना और हँसना छोड़ दे। जोर-जोरसे बोलना, जूते पहनना, नृत्य और गीतको त्याग दे। केश रखना, आँखोंमें काजल लगाना, उबटन लगवाना, कुलटा स्त्रियोंसे

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