भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1267

१२३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


समुद्रके समान दूसरा कोई जलाशय नहीं है, उसी प्रकार प्रभासक्षेत्रके सदृश अन्य कोई तीर्थ नहीं है। जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति वशमें हों, जो विद्या, तप और कीर्तिसे युक्त हो, वह तीर्थके फलका भागी होता है। जो नियमसे रहे, नियमित भोजन करे, स्नान और जपमें तत्पर रहे तथा व्रत एवं उपवास करे, वह तीर्थके फलका पूर्णतः भागी होता है। जो क्रोधरहित, सत्यवादी, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाला तथा संपूर्ण प्राणियोंके प्रति आत्मभाव रखनेवाला है, वह तीर्थके फलका भागी होता है। जो दरिद्र एवं धनहीन मनुष्य तीर्थयात्रामें तत्पर होते हैं, उन्हें विशेष नियमोंके बिना ही यज्ञफलकी प्राप्ति होती है। सभी वर्णों और आश्रमोंके लोगोंको तीर्थयात्रा फल देनेवाली है। जो दूसरे किसी कार्यसे तीर्थमें जाता है और वहाँ स्नान करता है, उसके लिये मुनियोंने स्नानके आधे फलकी प्राप्ति बतायी है। इस लोकमें पैदल तीर्थयात्रा करनेको उत्तम तप बताया गया है। किसी सवारीसे यात्रा करनेपर तीर्थमें स्नान-मात्रका ही फल मिलता है, यात्राका नहीं। देवि! जो मनुष्य अपने ही धन और अपने ही पैरोंसे तीर्थयात्रा सम्पन्न करते हैं, उन्हें चौगुने पुण्यकी प्राप्ति होती है। १ इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए भिक्षान्न-भोजनपूर्वक जो तीर्थयात्रा करते हैं, वे दसगुना पुण्य-फल पाते हैं। छाता और जूता धारण न करके भिक्षान्न-भोजन एवं इन्द्रियसंयमपूर्वक तीर्थयात्रा करनेवाला ब्राह्मण भयंकर पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्रतिग्रह (दान-ग्रहण) न करनेवाले मनुष्यकी यात्रा दसगुना पुण्य देनेवाली होती है। जो ब्राह्मण लोभवश क्षेत्रमें दानकी रुचि रखता है, उस दूषित हृदयवालेके लिये न तो यह लोक सुखद होता है न परलोक ही। यदि शूद्र ब्राह्मणका वेष धारण करके तीर्थमें दान ग्रहण करता है तो वह तत्काल तृण और काष्ठके समान भस्म हो जाता है और नरकमें गिरता है। अतः औरोंकी तो बात ही क्या है, ब्राह्मणोंको भी थोड़ा भी प्रतिग्रह नहीं स्वीकार करना चाहिये।

तीर्थ दो प्रकारके होते हैं—कृत और अकृत। जो स्वकीयभावसे युक्त है अर्थात् जो अपने ही धन एवं पैरोंसे यात्रा करता और अपने हृदयमें उत्तम भाव रखता है, वही इन दोनों प्रकारके तीर्थोंका संपूर्ण फल पाता है। जो मनुष्य दूसरेके अन्नसे जीविका चलाते हुए यात्रा करता है, वह उस तीर्थ-यात्राके संपूर्ण फलका सोलहवाँ भाग पाता है। असमर्थ, अन्ध, पंगु तथा यायावर, २ जो दूसरोंसे अन्न लेनेके लिये विवश हैं, उनका प्रतिग्रह दोषरहित माना गया है। जो तीर्थसेवी मनुष्य ब्राह्मणोंको स्नानकी सुविधा (व्यय आदि) तथा खान-पान आदि देता है, वह तीर्थजनित संपूर्ण फलको पाता है। इष्ट देव, गुरु और माता-पिताको स्वेच्छानुसार पुण्य प्रदान करनेवाला पुरुष आठगुने फलका भागी होता है। स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, देवपूजा आदि पुण्य-कर्मका ही सर्वत्र दान होता है; पाप कर्मका नहीं। तीर्थमें जाकर पिता, माता, भाई, सुहृद् तथा गुरु—जिसके उद्देश्यसे भी मनुष्य गोता लगाता है, वह उस तीर्थ-स्नानके पुण्यका द्वादशांश प्राप्त कर लेता है। अतः वेदके बलका भरोसा करके प्रतिग्रह (दान लेने)-में रुचि न रखे। वेद बेचनेवाले पुरुषका स्पर्श कर लेनेपर स्नान करनेका ही विधान है। राजाके दरबारमें तथा विशेषतः तीर्थ और महातीर्थमें रहनेवाले विद्वान्‌को वेद-विक्रय कदापि नहीं करना चाहिये। जो तीर्थसेवी ब्राह्मण देनेपर भी दान न ले, वही वास्तवमें तीर्थ करता और अपने पूर्वजोंको भी पवित्र कर देता है। अन्यत्र किया हुआ पाप


१- तीर्थानुगमनं पद्भ्यां तपः परमिहोच्यते। तदेव कृत्वा यानेन स्नानमात्रं फलं लभेत् ॥
ये चान्ये कुर्वते शक्त्या तीर्थयात्रां तथेश्वरि। स्वकीयद्रव्यपादाभ्यां तेषां पुण्यं चतुर्गुणम् ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २६। २४-२५)

२- जो एक-एक गाँवमें एक रात डेरा डालते हुए सदा विचरता रहता है, उस साधु अथवा मुनिको 'यायावर' कहते हैं।