संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- प्रभासखण्ड * | १२४५
'कपर्दी' की अग्रपूजाका हेतु और महिमा
पार्वतीजीने पूछा—भगवान्! आपने जो यह कहा है कि पहले 'कपर्दी' का दर्शन करे, इसका क्या कारण है? क्योंकि वह तो आपका सेवक है। स्वामीके पश्चात् ही सेवकका पूजन हो, यह सनातन धर्म है।
महादेवजी कहते हैं—प्रभासक्षेत्रमें सोमेश्वर देवके रूपमें जो लिंगरूपधारी सदाशिव विराजमान हैं, वे इन्द्रियातीत पुरुषोंद्वारा चिन्तन करने योग्य हैं। उनके वामभागमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु और दक्षिणभागमें प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान हैं। द्वापरकी सन्धिमें कलियुग प्राप्त होनेपर स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र तथा अन्य पापाचारी मनुष्य भी भगवान् सोमनाथका दर्शन करके शीघ्र ही स्वर्गलोकको चले जाते थे। बालक और वृद्ध सभी उत्तम गतिको प्राप्त होते थे। यह देख इन्द्र आदि देवता मेरी शरणमें आये और हाथ जोड़कर बोले—'भगवान्! आपके प्रसादसे यह सम्पूर्ण स्वर्ग मनुष्योंसे भर गया है, अतः अब हमारे रहनेके लिये कोई दूसरा स्थान दीजिये। जिनके लिये भयंकर कुम्भीपाक सजाया गया, रौरव तथा शाल्मलि आदि नरकोंका निर्माण किया गया, उन्हें स्वर्गमें स्थित देखकर यमराजने अपना व्यापार ही छोड़ दिया है।'
मैंने कहा—देवताओ! मैंने चन्द्रमाकी भक्तिसे संतुष्ट होकर उनसे यह प्रतिज्ञा की है कि प्रभासक्षेत्रमें सदा मेरा निवास होगा। मैं अपनी कही हुई बात किसी प्रकार पलट नहीं सकता। जो लोग वहाँ मेरा दर्शन करेंगे, वे निश्चय ही स्वर्गलोकमें जायँगे।
पार्वती! यह सुनकर देवता भयसे व्याकुल हो गये और तुम्हें वहाँ खड़ी देख हाथ जोड़कर बोले—'माता! तुम्हीं हमें आश्रय दो।' यों कहकर वे तुम्हारी स्तुति करने लगे।
देवता बोले—देवेश्वरी! तुम्हें नमस्कार है। जगदम्बा! तुम्हें नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाली देवी! तुम्हें नमस्कार है। सुवर्णके सदृश गौर आकृति धारण करनेवाली गौरी! तुम्हें नमस्कार है। जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाली महेश्वरि! तुम्हें नमस्कार है। शंकर प्रिये! तुम्हें नमस्कार है। कालका भी नाश करनेवाली कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार है। गिरिराजकुमारी! तुम्हें नमस्कार है। आर्ये! भद्रे! विशालाक्षि! त्रिलोकसुन्दरि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हीं रति, धृति, श्री, स्वाहा, स्वधा, सती, दुर्गा, मति, मेधा, पृथ्वी तथा सर्वस्वरूपा हो। तुमने इस सम्पूर्ण चराचर त्रिलोकीको व्याप्त कर रखा है। नदियों, पर्वत-शिखरों, समुद्रों, गुफाओं, वनों, मन्दिरों तथा मुनियोंके आश्रमोंमें भी तुम विराज रही हो। देवि! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई स्थान मैं नहीं देखता, जहाँ तुम विद्यमान न हो। विशाल नेत्रोंवाली शिवे! हमारी यह प्रार्थना सुनकर महान् भयसे हमें बचाओ।
पार्वती! इन्द्र आदि देवताओंके इस प्रकार स्तवन करनेपर तुम करुणाके वशीभूत हो हाथ मलने लगीं। इससे गजराजके-से मुखवाला एक मनोहर कुमार प्रकट हुआ, जिसके चार भुजाएँ थीं। तब तुमने देवताओंसे कहा—'देवगण! मैंने तुम्हारे हितके लिये इस बालकको उत्पन्न किया है। यह मनुष्योंके समक्ष सब प्रकारके विघ्न उपस्थित करेगा, जिससे मोहग्रस्त होकर वे सोमनाथका दर्शन नहीं करेंगे और अपने पापोंके कारण नरकमें जायँगे।'
इसके बाद गजाननने तुमसे विनयपूर्वक पूछा—'माँ! मुझे आज्ञा दो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ?' तुमने कहा—'बेटा! तुम प्रभासक्षेत्रमें जाओ, जहाँ सोमेश्वरलिंगके रूपमें महादेवजी सदैव निवास करते हैं। वहाँ रहकर सोमनाथकी रक्षा करो, जिससे मनुष्योंको उनका दर्शन न होने
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पाये।' तुम्हारे इस आदेशसे गजानन वहाँ गये और सदा वहीं स्थित रहकर मनुष्योंके सम्मुख विघ्न उपस्थित करते हैं। जब किसी मनुष्यको वे सोमनाथके प्रति आते देखते हैं, तब उसके मार्गमें स्त्री, पुत्र, गृह, क्षेत्र, धन, धान्य आदिका महान् मोह लाकर रखते हैं और इस प्रकार उसके सामने बड़ा भारी विघ्न डालते हैं, जिससे वे मानव सोमेश्वर शिवका दर्शन नहीं कर पाते। अथवा गलगण्ड आदि रोग पैदा कर देते हैं, जिससे पीड़ित होकर मनुष्य सोमेश्वरके दर्शनसे वंचित रह जाता है। वे गजानन ही लोकपूजित कपर्दी हैं। अतः सोमेश्वरकी प्राप्तिके लिये प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक कपर्दीकी पूजा करनी चाहिये। उन प्रभासक्षेत्रके रक्षक गणेशका निम्नांकित स्तोत्रद्वारा स्तवन करना चाहिये। महादेवि! मैं कपर्दीका वह विघ्ननाशक स्तोत्र कहता हूँ, सावधान होकर सुनो— | करनेवाले तथा हविष्यके प्रेमी हैं एवं पूजित न होनेपर जो मनुष्योंके सब कार्योंमें विघ्न डालते हैं, उन महाभयंकर पार्वतीनन्दन गणेशको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती है, नेत्र भयंकर हैं और मुख हाथीके समान है, जिनकी कान्ति सदा एक-सी रहती है, जो ध्रुव, निश्चल और शान्त हैं, उन विनायकको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप सबसे पहले प्रकट हुए हैं, आपने प्राचीन देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये हाथीका रूप धारण करके समस्त दानवोंको भयभीत किया और अपनेको ऋषियों तथा देवताओंका स्वामी सिद्ध कर दिखाया। ॐ विघ्नराजको नमस्कार है, कपर्दीको नमस्कार है। अत्यन्त भयंकर दाढ़वाले प्रभासक्षेत्रनिवासी गणेशको नमस्कार है। सोमनाथकी यात्राके निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण होनेके लिये कपर्दीको नमस्कार करके मैं सिद्धि-बुद्धि-प्रियतम मंगलकारी विघ्नराजकी स्तुति करता हूँ। जो महागणपति शूरवीर, किसीसे भी पराजित न होनेवाले, जयकी वृद्धि करनेवाले, एक-दो तथा चार दाँतवाले, चार भुजावाले, त्रिनेत्रधारी, हाथमें त्रिशूल रखनेवाले, लाल नेत्रोंवाले, वरदायक, अजेय, शंकुकर्ण, प्रचण्ड, दण्डनायक, लोहदण्डधारी, मुखसे हविष्य ग्रहण | इस प्रकार पूर्वकालमें देवताओंने शिवपुत्र गणेशका स्तवन करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये रक्तचन्दनमिश्रित जल और लाल फूलोंसे उनका पूजन किया। जो चतुर्थीको लाल वस्त्र धारण करके एक या दोनों समय पूर्वोक्तरूपसे गणेशजीकी पूजा करता है और नियमसे रहते हुए नियमित भोजन करता है, वह सबको अपने वशमें कर लेता है। सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त यज्ञोंसे जो फल प्राप्त होता है, उसीको गणेशजीकी स्तुति करके मनुष्य पा लेता है। उसे कभी विघ्नका भय नहीं होता और वह अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह छः महीनेमें ही इसका फल पाता है। वर्षभरमें उसे सिद्धि प्राप्ति होती है और भगवान् सोमनाथ कृपापूर्वक उसे दर्शन देते हैं।
केदारलिंगकी महिमा, राजा शशिविन्दुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त
महादेवजी कहते हैं—महादेवि! कपर्दीका पूजन करनेके पश्चात् मनुष्य केदारलिंगके समीप जाय। कपर्दीसे अग्निकोणमें भीमेश्वरके समीप केदारेश्वरनामक स्वयम्भू-लिंग स्थित है। वह कल्पपर्यन्त स्थिर रहनेवाला लिंग मुझे बहुत ही प्रिय है। उस महाप्रकाशमय लिंगको वृद्धिलिंग | भी कहते हैं। देवि! स्वयं मैंने भी उनकी पूजा की है। जो चतुर्दशी (शिवरात्रि)-को वहाँ निराहार रहकर जागरण करता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं। प्राचीन युगमें केदारेश्वरका नाम रुद्रेश्वर था। इस कलियुगमें म्लेच्छोंके स्पर्शके भयसे केदारजी समुद्रके समीप इसी लिंगमें लीन
- प्रभासखण्ड * | १२४७ ---|--- हो गये, इसीलिये इसका नाम 'केदार' हो गया। जो मनुष्य आहारको जीतकर माघमासमें रुद्रेशके दक्षिणभागमें दस धनुषकी दूरीपर समुद्रमें स्थित पद्मकेतुनामक महाकुण्डमें नहाकर विधिपूर्वक रुद्रेश्वरकी पूजा करेगा, उसे केदार-यात्राका पूर्ण फल प्राप्त होगा। उनके पूजनसे ब्रह्महत्या आदि महापापोंका नाश होता है।<br><br>प्राचीन कालमें शशिविन्दु नामसे विख्यात एक चक्रवर्ती राजा थे। उनकी पतिव्रता स्त्री उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। राजाके पास एक सुन्दर सुवर्णमय आकाशगामी विमान था, जिसके द्वारा वे अपनी इच्छाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंमें घूमते रहते थे। एक समय फाल्गुन कृष्णपक्षकी चतुर्दशीका पर्व आनेपर राजा शशिविन्दु उत्तम प्रभासक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्होंने बहुतसे महर्षियोंको देखा, जो जपमें और होममें तत्पर हो रात्रिमें जागरण करनेके लिये श्रीसोमनाथजीके सम्मुख बैठे हुए थे। राजाने भी सोमनाथका दर्शन और प्रणाम करके विधिपूर्वक पूजन किया और क्रमशः भक्तिभावसे उन सभी ऋषि-मुनियोंका स्वागत-सत्कार करके वे केदारलिंगके पास चले आये। वहाँ विचित्र पुष्पमालाओं, नैवेद्यों तथा मनोहर वस्त्राभूषणोंसे केदारेश्वरकी पूजा की और वहीं एकाग्रचित्त हो जागरण किया। तब वे सब मुनि कौतूहलवश राजाके समीप गये और इस प्रकार बोले—'राजन्! तुम सोमेश्वर देवको छोड़कर केदारजीके आगे जो जागरण और पूजन करते हो, इसका क्या कारण है?'<br><br>राजाने कहा—विप्रवरो! आपलोग सुनें, यह मेरे पूर्वजन्मका वृत्तान्त है। पहले जन्ममें मैं ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला शूद्र था। मेरी जन्मभूमि सौराष्ट्र देशमें थी। एक समय वहाँ भयंकर अनावृष्टि हुई। उस समय मैं भूखसे व्याकुल होकर प्रभासक्षेत्रमें चला आया। वहाँ आनेपर हरिणीके मूलभागमें स्थित एक सुन्दर सरोवरपर मेरी दृष्टि पड़ी जो रामसरोवरके नामसे प्रसिद्ध | है। वह तड़ाग कमलसमूहसे सुशोभित था। मैं थका माँदा तो था ही। उस सरोवरको देखकर मैंने उसमें स्नान किया तथा देवताओं और पितरोंका तर्पण करके उसके स्वच्छ जलको पीया। तत्पश्चात् मेरी स्त्रीने कहा—'इन कमल-पुष्पोंको ले लीजिये। यहाँसे निकट ही एक सुन्दर स्थान दिखायी देता है। वहाँ चलकर इन फूलोंको बेचेंगे, जिससे कुछ भोजनकी व्यवस्था हो सकेगी।' पत्नीके यों कहनेपर मैं जलके भीतर उतरा और बहुत-से कमलके फूल लेकर नगरकी ओर चला। वहाँ पहुँचकर सड़कों, चौराहों और तिमुहानियोंपर घूमता रहा; परंतु किसीने भी मेरे फूल नहीं लिये। इतनेमें दिन डूब गया और मैं अपनी पत्नीके साथ एक मन्दिरमें आकर सो रहा। वहाँ स्त्रीसहित मुझे भूख अधिक पीड़ा देने लगी। इतनेमें ही मैंने देखा किसी देवालयमें होम और जागरण हो रहा है। तब मैं भी उठकर वहाँ गया और रुद्रेश्वरनामक वृद्धिलिंगका दर्शन किया। उस समय वहाँ अनंगवती नामक एक वेश्या शिवरात्रि-व्रतमें संलग्न हो नृत्य, गीत और उत्सव आदिके द्वारा भगवान्के सामने जागरण कर रही थी। मैंने एक मनुष्यसे पूछा—'भाई! यहाँ रात्रिमें जागरण किसलिये होता है? यह नाच, गान और उत्सवमें लगी हुई कौन स्त्री दिखायी दे रही है?' उसने बताया—'आज शिवधर्मोत्तरपुराणमें प्रतिपादित शिवरात्रि है। यह धर्मपरायणा स्त्री अनंगवती नामकी वेश्या है, जो कल्याणमय शिवरात्रि-व्रत करके जागरण कर रही है। जो कोई मनुष्य शिवरात्रि-व्रत करता है, उसे दुःख-दारिद्र्य और बन्धनकी प्राप्ति नहीं होती। दुष्ट ग्रह, अरिष्टयोग, रोग अथवा भय भी उसके पास नहीं आता। वह उत्तम कुलमें उत्पन्न हो सुख और सौभाग्यसे युक्त होता है। तेजस्वी यशस्वी तथा पूर्णतः कल्याणका भागी होता है।'<br><br>उस मनुष्यकी बात सुनकर मेरे मनमें वह
१२४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
व्रत करनेका निश्चित विचार हुआ। मैंने सोचा 'अन्नका अभाव होनेके कारण उपवास तो मुझे विवश होकर करना ही है। अतः क्षार समुद्र पद्मकतीर्थमें स्नान करके इन कमलके फूलोंसे भगवान् महेश्वरकी पूजा करूँ।' तब मैंने स्त्रीसहित स्नान करके भक्तिभावसे कमलके फूलोंद्वारा भगवान् रुद्रेश्वरका पूजन किया। पत्नीके साथ रातभर वहाँ जागता रहा। सबेरा होनेपर वेश्याने मुझसे कहा—'अपने फूलोंका मूल्य तीन भर सोना ले लो।' परंतु मैंने सात्त्विकभावका आश्रय लेकर उसका दिया हुआ मूल्य स्वीकार नहीं किया। भिक्षा माँगकर जीवननिर्वाह करने लगा। दीर्घकालके पश्चात् मेरी मृत्यु हुई। उस समय यह मेरी प्राणप्यारी पत्नी मेरे शरीरको लेकर चिताकी आगमें प्रवेश कर गयी। उस पूजन और जागरणके प्रभावसे मैं पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाले चक्रवर्ती राजा हुआ। एक बार संयोगवश यह व्रत किया था, जिसका यह महान् फल प्राप्त हुआ। अब मैं भक्तिभावसे यथावत् सामग्रीके साथ जो इस व्रतका पालन करता हूँ, इसका भविष्यमें क्या फल होगा—यह मैं नहीं जानता।
यह सुनकर उन ब्राह्मणोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने 'साधु-साधु' कहकर राजाकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने स्वयं भी उस स्वयम्भू-लिंगका पूजन किया। राजा शशिविन्दु उस केदारलिंगके प्रसादसे देवदुर्लभ उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए। अनंगवती वेश्या शिवरात्रि-व्रत तथा केदार लिंगके प्रभावसे रम्भा नामक अप्सरा हुई। इसलिये जो विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी इच्छा रखता हो, उसे प्रयत्नपूर्वक उक्त शिवलिंगका पूजन करना चाहिये।
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श्वेतकेत्वीश्वर आदि विभिन्न शिवलिंगोंका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—महादेवि! पूर्वकालमें जब स्वायम्भुव मन्वन्तरका त्रेतायुग चल रहा था, उस समय श्वेतकेतु नामके एक राजर्षि थे। वे बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने प्रभासक्षेत्रमें आकर समुद्रके तटपर शिवलिंगकी स्थापना करके महान् तप प्रारम्भ किया। तपस्या और नियमका पालन करते हुए उनके चौदह वर्ष बीत गये। तब मैंने उन्हें दर्शन देकर कहा—'सुव्रत! वर माँगो।' श्वेतकेतु बोले—'प्रभो! मुझे अपनी अविचल भक्ति दीजिये और इस स्थानपर सदा निवास कीजिये।' 'एवमस्तु' कहकर मैं वहाँसे अन्तर्धान हो गया। कुछ कालके पश्चात् राजा श्वेतकेतुने उस लिंगकी आराधना करके महान् अभ्युदययुक्त स्थान प्राप्त किया। इसलिये उस शिवलिंगका नाम श्वेतकेत्वीश्वर हो गया। तदनन्तर कलियुग आनेपर पवनपुत्र भीमसेन अपने भाइयोंके साथ तीर्थयात्राके प्रसंगसे प्रभास-क्षेत्रमें आये। उन्होंने रात्रिमें जागरण करके समुद्रके समीप श्वेतकेत्वीश्वर लिंगका पूजन किया। तबसे उसका नाम भीमेश्वरलिंग हुआ। श्वेतकेत्वीश्वरलिंगका एक बार दर्शनमात्र कर लेनेसे अन्य जन्मोंके किये हुए तथा इस जन्मके भी बहुत-से पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। भीमेश्वरसे पूर्व और सोमनाथसे अग्निकोणमें सरस्वतीद्वारा स्थापित महाप्रभावशाली रवेश्वरलिंग है। मनुष्यको चाहिये कि वह सरस्वती देवी तथा भैरवेश्वरलिंगका विधिपूर्वक पूजन करे। जो महानवमीको विधिवत् स्नान करके सरस्वती देवीका पूजन करता वह वाणीजनित समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। जो अघोर-मन्त्रसे दूधके द्वारा उस लिंगको नहलाकर उसकी पूजा करता है, वह यात्राके उत्तम फलको पाता है।
वहाँसे चण्डीश्वरदेवके पास जाय, वह स्थान सोमनाथके दक्षिण सात धनुषकी दूरीपर स्थित है।
- प्रभासखण्ड * | १२४९ ---|---
पूर्वकालमें चण्डीदेवीने भगवान् दण्डपाणिकी स्थापना की थी। तत्पश्चात् मेरे गण चण्डने उस लिंगकी आराधना की और वहाँ बड़ी कठोर तपस्या की। इस कारण पृथ्वीपर वह चण्डेश्वर लिंगके नामसे विख्यात हुआ। चण्डेश्वरको दूध, दही, मधु, घृत तथा ईखके रससे स्नान कराये और उनके श्रीअंगमें कुंकुमका लेप करे। फिर कपूर, खस और कस्तूरी मिलाया हुआ सुगन्धित चन्दन लगाये। तदनन्तर फूलोंसे उनका पूजन करे। इसके बाद धूप तथा अगुरु निवेदन करके अपने वैभवके अनुसार वस्त्रोंसे पूजन करे। उत्तम नैवेद्य लगाके दीपमाला जलाकर रखे और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। यों करनेसे पितर कल्पपर्यन्त तृप्त रहते हैं।
पार्वती! सोमनाथसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर आदित्येश्वर नामक शिवलिंगके समीप जाय, जिसकी स्थापना साक्षात् भगवान् सूर्यने की है और जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है। त्रेतायुगमें महात्मा समुद्रने दस हजार वर्षोंतक रत्नोंद्वारा आदित्येश्वरका पूजन किया था। इससे पृथ्वीपर इनका नाम रत्नेश्वर प्रसिद्ध हुआ। रत्नेश्वरको पंचामृतसे नहलाकर पंचरत्नोंद्वारा उनकी पूजा की जाती है। इसके बाद भाँति-भाँतिके उपचारोंसे विधिपूर्वक उनकी अर्चना करनी चाहिये। यों करनेपर मनुष्य मेरुपर्वतके दानका फल पाता है। उसे सब तीर्थोंके सेवनका फल मिल जाता है और वह अपने पितृकुल और मातृकुल दोनोंका उद्धार कर देता है। रत्नेश्वरका दर्शन करके मनुष्य अपने सब पाप धो डालता है। जो विधिपूर्वक रत्नेश्वर लिंगकी पूजा करके शतरुद्रियका जप करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता।
महादेवि! वहाँसे परम उत्तम अंगारेश्वरके समीप जाय, जिसकी स्थापना भूमिपुत्र मंगलने की है। वह स्थान सोमनाथसे ईशानकोणमें है। पूर्वकालमें मंगलने प्रभासक्षेत्रमें आकर बाल्यावस्थासे ही तपस्याद्वारा मेरी आराधना की। तब मैंने सन्तुष्ट होकर उन्हें वर माँगनेके लिये कहा। मंगल बोले—'सर्वेश्वर! मुझे ग्रहका पद प्रदान कीजिये।' मैंने 'तथास्तु' कहकर मंगलको यह बताया कि 'जो मनुष्य वहाँ आकर भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेगा, उसे कभी तुम्हारे द्वारा दी हुई पीड़ा नहीं भोगनी पड़ेगी।' यों कहकर मैं वही अन्तर्हित हो गया। मंगलदेव ग्रहोंके मध्यमें विमानपर विराज रहे हैं।
अंगारेश्वरसे उत्तर दिशामें महाप्रभावशाली बुधेश्वर विद्यमान हैं। उनका स्थान वहाँसे अधिक दूर नहीं, दो ही धनुषके अन्तरपर है। वे दर्शनमात्रसे ही सब पाप हर लेते हैं। देवेश्वरि! बुधने पूर्वकालमें वहाँ बड़ी भारी तपस्या की और निर्मल शिवलिंग स्थापित किया। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने बुधको ग्रहत्व प्रदान किया है। बुधवार और अष्टमीके योगमें बुधद्वारा स्थापित शिवलिंगकी विधिवत् पूजा करके मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। बुधेश्वरके प्रसादसे उसके कुलमें दुःख और दुर्भाग्य प्रवेश नहीं करते।
उमा-मन्दिरके पूर्वभागमें सिद्धेश्वरसे आग्नेय कोणमें बृहस्पतिद्वारा स्थापित महालिंग है। बृहस्पतिजीने भक्तिभावसे उसकी आराधना करके मुझ देवेश्वर शिवको सन्तुष्ट किया। इससे उन्होंने सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्राप्त कर लिये। मुझसे ज्ञान पाकर वे देवताओंके पूजनीय गुरु हो गये और ग्रहके पदपर प्रतिष्ठित हो इस समय स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं। बृहस्पतीश्वरका भक्तिभावसे दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। उसे बृहस्पतिकी ओरसे पीड़ा नहीं प्राप्त होती। शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तथा गुरुवारके योगमें पंचोपचारसे विधिपूर्वक उक्त लिंगकी पूजा करके मानव परम पदको प्राप्त कर लेता है।
तदनन्तर विभूतिश्वरसे पश्चिम थोड़ी ही दूरपर शुक्राचार्यके द्वारा स्थापित शिवलिंग है; जहाँ शुक्रने शुक्रेश्वर शिवके प्रभावसे मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की थी। जो मनुष्य स्थिरचित्त होकर उस शिवलिंगकी आराधना करता है और एक लाख मृत्युंजय मन्त्रको जपता है, वह अपने
१२५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सभी मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। शुक्रेश्वरका दर्शन और स्पर्श करके मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युतकके सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। सुगन्धित पुष्पोंद्वारा उनकी पूजा करनेसे शुक्रकी पीड़ा नहीं प्राप्त होती।
बुधेश्वरसे पश्चिम और अजादेवीसे अग्निकोणमें समीप ही पाँच धनुषकी दूरीपर शनैश्चरेश्वरका स्थान है। छायानन्दन शनैश्चरने अत्यन्त कठिन तपस्या करके उस लिंगमें मुझ अनादि, अनन्त शिवको उतारा है। उन्होंने भक्ति तथा मेरे प्रसादसे ग्रहका पद प्राप्त किया है। शनैश्चरके दिन शमीके पत्तोंसे शनैश्चरेश्वरका पूजन करके तिल, उड़द, गुड़ और भातसे ब्राह्मणको तृप्त करे। उसे काले रंगका बैल दान करे। तत्पश्चात् सब प्रकारकी पीड़ाओंका निवारण करनेके लिये अनेकानेक स्तोत्रोंद्वारा शनैश्चरेश्वर देवकी स्तुति करनी चाहिये। जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिभावसे शनैश्चरेश्वरका स्मरण करता है, उसके ऊपर सूर्यनन्दन शनैश्चर प्रसन्न होते हैं।
शनैश्चरेश्वरसे वायव्यकोणमें राहुद्वारा स्थापित शिवलिंग है, जहाँ विप्रचित्तिके पुत्र राहुने एक सहस्र वर्षतक तपस्या की है। जो उनके द्वारा स्थापित शिवका भक्तिपूर्वक पूजन और दर्शन करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है।
राहीश्वरसे उत्तर और अंगारेश्वरसे दक्षिण एक ही धनुषके अन्तरपर महाप्रकाशमय केतुलिंग है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। केतुने मुझ शिवके प्रति भक्ति रखकर देवताओंके मानसे सौ वर्षोंतक वहाँ उग्र तपस्या की थी। इससे संतुष्ट होकर मैंने उन्हें ग्रहत्व प्रदान किया। भयंकर ग्रहपीड़ा होनेपर पुष्प, गन्ध, धूप तथा भाँति-भाँतिके शुभ नैवेद्योंद्वारा केत्वीश्वरकी पूजा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। इससे सब पीड़ा शान्त हो जाती है। जो पूर्वोक्त चौदह देवस्थानोंको भक्तिभावसे जानता है, वह क्षेत्रके फलका भागी होता है।
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प्रभासक्षेत्रकी त्रिविध शक्तियों तथा दूतीशक्तियोंके दर्शन-पूजनका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—सोमेश्वरसे ईशानकोणमें वरारोहा देवीसे पूर्वभागमें परम उत्तम सर्वेश्वर देव विराजमान हैं। उनके समीप भक्तिपूर्वक जाकर मनुष्य अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त करता है। सर्वेश्वरकी स्थापना सिद्धोंने की है। जो मानव भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो सिद्धलोकमें जाता है। काम, क्रोध, भय, लोभ, राग, मात्सर्य, ईर्ष्या, दम्भ, आलस्य, निद्रा, मोह, अहंकार—ये सिद्धिमें विघ्न डालनेवाले दोष हैं। सिद्धेश्वरके पूजनसे इन सब दोषोंका नाश हो जाता है। यों जानकर प्रयत्नपूर्वक वहाँकी यात्रा करे।
सिद्धेश्वरके पूर्वभागमें थोड़ी ही दूरपर कपिलेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है, जिसके दर्शनमात्रसे सब पापोंका नाश हो जाता है। प्राचीन कालमें कपिल नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि हो गये हैं। उन्होंने वहाँ बड़ी भारी तपस्या करके उत्तम सिद्धि प्राप्त की और शिवलिंगकी स्थापना करके मेरी समीपता पायी है। उस लिंगमें मैं सब लोगोंके हितके लिये सदा निवास करता हूँ। जो शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें सात बार सोमेश-कपिलेश्वरका दर्शन करता है, वह गोदानका फल पाता है। जो वहाँ तिलमयी धेनु दान करता है, वह एक-एक तिलकी संख्याके बराबर युगोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है।
दण्डपाणीश्वरसे निकट ही गन्धर्वेश्वर नामसे प्रसिद्ध उत्तम शिवलिंग है। गन्धर्वराज धनवाहनने वहाँ कठोर तपस्या करके उस शिवलिंगको स्थापित किया है। उसकी पुत्री गन्धर्वसेनाने भी वहाँ शिवलिंगकी स्थापना की है। जो मनुष्य
- प्रभासखण्ड * १२५१
पवित्र होकर यत्नपूर्वक गन्धर्वेश्वरका पूजन और दर्शन करता है, वह गन्धर्वलोकमें जाता है। जो उत्तरायण आनेपर अग्नितीर्थमें स्नान करके गन्धर्वपूजित उस शिवलिंगका पूजन करता है, वह मोक्षको प्राप्त होता है। इस माहात्म्यका श्रवण और अभिनन्दन करके भी मनुष्य महान् भयसे मुक्त हो जाता है।
गन्धर्वेश्वरके पूर्वभागमें गौरीजीके समीप विमलेश्वर नामक लिंग प्रतिष्ठित है। जिसका शरीर क्षयरोगसे आक्रान्त है, वह भक्तिपूर्वक विमलेश्वरका दर्शन करके सब दुःखोंका अन्त कर देता और निर्मल पदको प्राप्त होता है। वहीं रोगग्रस्त गन्धर्वसेना रोगसे मुक्त हो विमल स्वरूपको प्राप्त हुई थी, इसलिये पृथ्वीपर वह लिंग विमलेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ।
ब्रह्माजीके स्थानसे नैर्ऋत्यकोणमें सोलह धनुषकी दूरीपर धनदेश्वर लिंग है। यह राहुलिंगसे वायव्यकोणमें स्थित है। कुबेरने वहाँ बड़ी भारी तपस्या करके धनदका पद प्राप्त किया है। वे विधिपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना और पूजा करके अलकापुरीके स्वामी हुए हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक धनदेश्वरका दर्शन करके पंचोपचारसे उनकी पूजा करता है, उसके कुलमें दरिद्रताका कभी नाम भी नहीं सुना जाता।
मेरी तीन शक्तियाँ हैं—इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति। पहले जो चौदह और पाँच शिवलिंग बताये गये हैं, उनमेंसे यथाशक्ति चार, तीन या एककी पूजा करके फिर पूर्वोक्त तीन शक्तियोंका पूजन करना चाहिये। सोमेश्वरसे ईशानकोणमें जो वरारोहा देवी कही गयी हैं, वे चन्द्रमाकी अमा नामक कला हैं। वे ही भगवती उमाकी भी कला मानी गयी हैं। उन्हींको मेरी इच्छाशक्ति जानना चाहिये। वरारोहा देवी भूमण्डलके समस्त प्राणियोंका हित करनेके लिये प्रभासक्षेत्रमें विराजमान हैं।
सोमेश्वरसे वायव्यकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर क्रियाशक्तिरूपा दूसरी महादेवी स्थित हैं। वहीं योगिनीवन्दित पीठ है। उसी स्थानपर पातालको जानेवाला एक बहुत बड़ा विवर है। पहले उन महादेवीका नाम भैरवी था। फिर इस वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाईसवें चतुर्युगमें राजा आजापालके द्वारा आराधित होनेके कारण वे अजापालेश्वरीक नामसे विख्यात हुई हैं। जो मनुष्य लौकिक सुखभोगकी इच्छा रखता है, उसे गन्ध, धूप, अलंकार, वस्त्र तथा अन्य उपचारोंद्वारा उन महादेवीका पूजन करना चाहिये।
प्रभासक्षेत्रके मध्यभागमें दरिद्रताका विनाश करनेवाली तीसरी अजादेवी हैं, जिन्हें ज्ञानसक्ति माना गया है। उनका स्थान राहीश्वरसे दक्षिणभागमें है। अघासुरके साथ जब मेरा भयंकर युद्ध चल रहा था, उस समय मेरे क्रोधसे अजा नामकी देवी प्रकट हुईं। उनके साथ करोड़ों देवियाँ और थीं। वे सिंहपर सवार थीं। उनका रूप बड़ा सुन्दर था। उन्होंने ढाल और तलवार लेकर बड़े-बड़े दैत्योंका संहार किया। उनके भयसे बहुत-से दैत्य समुद्रकी ओर भागे। देवी सिंहवाहिनी और उनके गणोंने उन सबका पीछा किया। वे दैत्य इधर-उधर भागते हुए महासागरके समीप प्रभासक्षेत्रमें आ पहुँचे। वहाँ कुछ तो मार डाले गये और कुछ पातालमें समा गये। सब दैत्योंको मारा गया देख तथा इस क्षेत्रको परम पवित्र जानकर सिंहवाहिनी देवी यहीं सोमेश्वरके ईशानकोणमें और गौरीश्वरसे उत्तर दिशामें स्थित हुईं। जो स्त्री या पुरुष वहाँ उनका दर्शन करते हैं, वे सात जन्मोंतक पूर्णतः सौभाग्यशाली होते हैं। जो मानव वहाँ गीत, वाद्य तथा नृत्य करता है, उसके वंशमें देवीके प्रसादसे कोई दुर्भाग्यवान् नहीं होता। जो स्त्री वहाँ लाल रंगकी बत्तीसे युक्त, दीपकको घीसे जलाकर देवीको अर्पण करती है, उस बत्तीमें जितने सूत होते हैं, उतने जन्मोंतक वह सौभाग्य प्राप्त करती है। जो तृतीयाको इस माहात्म्यका पाठ करता है अथवा जो भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है।
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प्रभासक्षेत्रमें तीन दूती शक्तियाँ हैं—पहलीका नाम मंगला देवी है, दूसरीको विशालाक्षी देवी कहते हैं और तीसरी चत्वर देवीके नामसे प्रसिद्ध हैं। प्रभासक्षेत्रकी यात्राका पूरा-पूरा फल चाहनेवाले मनुष्यको क्रमशः इन तीनों शक्तियोंका पूजन करना चाहिये। मंगलादेवी ब्रह्माजीकी शक्ति कही गयी हैं, विशालाक्षी विष्णुशक्ति मानी गयी हैं तथा चत्वरप्रिया देवी मेरी शक्ति हैं। पहले मंगला देवीकी पूजा करनी चाहिये। वे अजादेवीके उत्तरभागमें निवास करती हैं। राह्लीशके दक्षिणभागमें थोड़ी ही दूरपर उनका स्थान है। सोमनाथकी प्रतिष्ठाके लिये जब सोमने यज्ञ प्रारम्भ किया, उस समय उसे देखनेके लिये वहाँ आये हुए ब्रह्मादि देवताओंका उसी देवीने मंगल किया था। इसीलिये उसका नाम मंगला हुआ। जो नारी तृतीयाको मंगला देवीकी पूजा करेगी, उसके अमंगल और दुःख पूर्णतः नष्ट हो जायेंगे। भगवान् दैत्यसूदनसे पूर्वभागमें वैष्णवी क्षेत्र दूती महादेवी विशालाक्षी हैं। योगेश्वरीसे ईशानकोणमें सौ धनुषकी दूरीपर उसका स्थान है। जो लोग महान् दुर्भाग्यकी आगमें जल रहे हैं, उनका दाह शान्त करनेके लिये विशालाक्षी देवी ओषधिके समान हैं। चाक्षुष मन्वन्तरमें जब सब दैत्य भगवान् विष्णुकी मार खाकर दक्षिण दिशामें भाग गये, उस समय उनको मारना दुष्कर जानकर भगवान् विष्णुने अत्यन्त प्रभावशालिनी भैरवी शक्ति महामायाका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही अत्यन्त प्रकाशमयी महामाया वहाँ आ गयी। भगवान् विष्णुके दर्शनसे उसके नेत्र आनन्दसे खिल उठे। उसने बड़ी-बड़ी आँखें करके भगवान्को देखा। इससे उसका नाम विशालाक्षी हुआ। इस कल्पमें उसे ललितोमा कहते हैं। जो माघमासमें तृतीया तिथिको विधिपूर्वक उसका पूजन करता है, उसके वंशमें कोई भी सन्तानहीन नहीं होता। जो मानव भक्तिभावसे उसका दर्शन करता है, वह दीर्घकालतक नीरोग, सुखी और सौभाग्यशाली होता है।
ललितासे उत्तर दिशामें दस धनुषकी दूरीपर तीसरी शक्ति चत्वरप्रियाका निवास है। मेरी प्रेरणासे वह इस क्षेत्रकी रक्षामें संलग्न रहती है। चबूतरों, चौराहों, पुराने घरों, बगीचों तथा महलोंकी अटारियोंपर एवं मार्गमें वह रातको घूमती रहती है। जो स्त्री अथवा पुरुष महानवमीके दिन नाना प्रकारके उपहारों और फूलोंसे उस कल्याणमयी देवीकी विधिपूर्वक पूजा करता है, उसके ऊपर प्रसन्न हो वह सम्पूर्ण लोक प्रदान करती है। यात्राके उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको वहाँ भोजन देना चाहिये।
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भैरवेश्वर आदि विविध लिंगोंका माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! योगेश्वरीसे दक्षिण थोड़ी ही दूरपर उत्तम भैरवेश्वरका स्थान है। प्राचीन कालमें देवीने जब दैत्योंके विनाशके लिये उद्योग किया, तब मेरे स्वरूपभूत भैरवको बुलाकर दूतके कार्यपर नियुक्त किया। इसलिये उस समय उनका नाम 'शिवदूती' हुआ। उसके बाद वे ही योगेश्वरी नामसे विख्यात हुईं। उन्होंने भैरवको दूत बनाया था, इसलिये उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका भैरवेश्वर नाम हुआ। जो मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाको उस शिवलिंगकी पूजा करता है अथवा जो छः महीनेतक निरन्तर उसकी पूजामें संलग्न रहता है, वह मनोवांछित फलको प्राप्त कर लेता है।
भैरवेश्वरसे पूर्वदिशामें पाँच धनुषकी दूरीपर लक्ष्मीश्वर नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग है, जो दरिद्रताका नाश करनेवाला है। जो श्रीपंचमीको विधिपूर्वक भक्तिभावसे लक्ष्मीश्वरका पूजन करता है, उसको लक्ष्मी कभी नहीं छोड़तीं। लक्ष्मीश्वरसे उत्तर
- प्रभासखण्ड * १२५३
और विशालाक्षीसे दक्षिण वाडवद्वारा स्थापित अत्यन्त प्रभावशाली वाडवेश्वरलिंग विराजमान है। उसको दधिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। जो मानव वहाँ वेदज्ञ ब्राह्मणको दहीका दान करता है, वह तेजस्वी लोकोंमें जाता और यात्राका उत्तम फल पाता है। विशालाक्षीसे उत्तर थोड़ी ही दूरपर देवताओं और गन्धर्वोंसे पूजित अध्यैश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। जो पंचामृतसे स्नान कराकर अध्यैश्वरका पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक विद्वान्, शास्त्रवक्ता और सब संदेहोंका निवारण करनेवाला होता है।
महादेवि! दैत्यसूदनके पश्चिमभागमें सात धनुषकी दूरीपर कामेश्वर नामक महान् लिंग है, वह सब पापोंको हरनेवाला तथा संपूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाला है। इस प्रकार पंचवक्त्रलिंग बताये गये। सोमेश्वरसे पूर्व साठ धनुषकी दूरीपर अर्थेश्वरलिंग है। जो मनुष्य उसे पंचामृतसे नहलाकर विधिपूर्वक पूजन करता है, वह सात जन्मोंतक पूर्ण विद्या पाता है और शास्त्रोंका उत्तम वक्ता होता है। जो पुत्रहीना स्त्री वहाँ नारियल चढ़ाती है, वह शीघ्र ही सबल एवं सुन्दर पुत्र पाती है। जो नारी वहाँ लाल बत्तीसे युक्त दीपकको घीसे जलाकर अर्पण करती है, उसके दीपककी बत्तीमें जितने तार होते हैं, उतने जन्मोंतक वह सदैव सौभाग्यवती होती है। जो पराभक्तिके साथ वहाँ नृत्य करती है, वह दीर्घकालतक आरोग्य, सुख और सौभाग्यसे युक्त होती है। वहाँ स्वच्छ जलसे भरा हुआ एक महान् कुण्ड है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पातकोंसे छूट जाता है। जो भक्तिपूर्वक पितरोंके उद्देश्यसे वहाँ श्राद्ध करता है, वह पुण्यात्मा अपने पितरोंके साथ परमपदको प्राप्त होता है। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके वहाँ श्राद्ध करना चाहिये। रात्रिमें गीत, वाद्य और नृत्य आदिके आयोजनद्वारा वहाँ जागरण करना उचित है। वहाँ ब्राह्मण-दम्पतिको पहननेके लिये वस्त्र और दक्षिणा देनी चाहिये।
देवि ! प्रभासक्षेत्रमें जो यह तपोवन है, यह गौरी तपोवनके नामसे विख्यात है। यह सब ओर पचास-पचास धनुषतक फैला हुआ है। इसके मध्यभागमें सतीदेवी एक पैरसे खड़ी होकर तपस्यामें लगी थीं। उस स्थानसे चार धनुष दूर ईशानकोणमें गौरीश्वरलिंग है, जो पापभयको दूर करनेवाला है। जो मनुष्य सदा ही—विशेषतः कृष्णपक्षकी अष्टमीको श्रद्धापूर्वक गौरीश्वरका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँ सब पापोंकी शान्तिके लिये गोदान और अन्नदान श्रेष्ठ कहा गया है। गौरीश्वरलिंगके दर्शनसे गोघाती, ब्रह्महत्यारे तथा अन्यान्य पापी भी सब पापोंसे छूट जाते हैं। गौरीतपोवनसे अग्निकोणमें बीस धनुष दूर वरुणजीके द्वारा स्थापित वरुणेश्वरलिंग है। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सब तीर्थोंका फल पा लेता है। अष्टमी और चतुर्दशीको यदि उन्हें दहीसे नहलाया जाय तो वह ब्राह्मण चारों वेदोंका ज्ञाता है। पार्वती ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, गूँगे, बहरे, बालक, स्त्री और नपुंसक भी वरुणेश्वरका दर्शन करके धर्मपरायण हो स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। जो उस स्थानमें स्नान, जप, होम और पूजन करता है, उसका वह सब शुभकर्म अक्षय हो जाता है।
वरुणेश्वरसे दक्षिण तीन धनुषके अन्तरपर ईषेश्वरलिंग है। पतिके दुःखसे घिरी हुई वरुणपत्नी ईषाने उस सिद्धिदायक महालिंगकी स्थापना की थी। जो मनुष्य पापनाशक ईषेश्वरका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। ईषेश्वरलिंग स्त्रियोंके लिये सौभाग्यदाता एवं दुःख दुर्भाग्यका नाशक है।
वरुणेश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें तीस धनुष दूर पश्चिम मुखवाला कुमारेश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। कुमार कार्तिकेयने बड़ी भारी तपस्या करके यहाँ उस महालिंगकी स्थापना की थी, इसीसे उसका नाम कुमारेश्वर हुआ। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक कुमारेश्वरकी पूजा करता है, उसे एक ही दिनमें छः मासकी
| १२५४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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आराधनाका फल मिल जाता है। काम, क्रोध, लोभ, राग और मात्सर्य छोड़कर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक एक बार अवश्य कुमारेश्वरका पूजन करना चाहिये।
दैत्यसूदनके स्थानसे वायव्यकोणमें तीस धनुषपर शाकल्यके द्वारा पूजित शाकल्येश्वर नामक लिंग है। राजर्षि शाकल्यने वहाँ बड़ी भारी तपस्या और आराधना करके मुझ महादेवका प्रत्यक्ष दर्शन पाया तथा प्रसन्न हुए मुझ महेश्वरको उस लिंगमें उतारा है। पार्वती! शाकल्येश्वरके दर्शनसे मानवोंके सात जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशी तिथियोंको वहाँ दूधसे शाकल्येश्वरको स्नान कराये और क्रमशः गन्ध-पुष्प आदिके द्वारा विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। तीर्थयात्राका उत्तम फल चाहनेवाले पुरुषोंको वहाँ सुवर्ण दान करना चाहिये। सत्ययुगमें उनका नाम 'भैरवेश्वर' कहा गया है। फिर त्रेतामें 'सावर्णिकेश्वर' हुआ। द्वापर आनेपर उन्हें 'गालवेश्वर' नाम प्राप्त हुआ और अब कलियुगमें उनका चौथा नाम 'शाकल्येश्वर' हुआ है। इस प्रकार उस लिंगके चारों युगोंमें प्रसिद्ध नाम बताये गये। इनका कीर्तन करनेपर ये पापोंका नाश, पुण्यकी वृद्धि तथा संपूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करते हैं। इनका मण्डल सब ओरसे अठारह धनुषका है। वह लिंग उस क्षेत्रमें निवास करनेवाले प्राणियोंके महान् पापोंको भी हर लेता है। वहाँ जो कृमि, कीट, पतंग और पशु-पक्षी हैं, उनको भी वह मोक्ष प्रदान करता है। उस स्थानपर जो कूप आदि हैं, उनमें सरस्वतीजीका जल है। उस लिंगके दर्शनसे मनुष्य सहस्र अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञोंका फल पाता है। जो बुद्धिमान् पुरुष चन्द्रग्रहणके अवसरपर घृतकी आहुति देते हुए वहाँ लिंगके समीप अघोर-मन्त्रका जप करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है। यहाँ रहनेवाले महापातकी और उपपातकी मनुष्य भी स्वर्गमें जाते और उत्तम सिद्धि पाते हैं। शाकल्येश्वर लिंग 'कामिक' कहा गया है। वह इच्छानुसार फल देनेवाला है।
कलकलेश्वर, उत्तंकेश्वर, वैश्वानरेश्वर तथा गौतमेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! शाकल्येश्वरसे नैर्ऋत्यकोणमें साठ धनुष दूर कलकलेश्वर लिंग है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। भिन्न-भिन्न युगोंमें उसके भिन्न-भिन्न नाम माने गये हैं। पहले सत्ययुगमें उसका नाम कामेश्वर था, फिर त्रेतामें पुलहेश्वर, द्वापरमें सिद्धनाथ और कलियुगमें नारदेश्वर हुआ। उसीको कलकलेश्वर भी कहते हैं। जिस समय सरस्वती नदी समुद्रमें मिलनेके लिये आयी, उस समय उसके जलके शब्दसे, महासागरकी गर्जनासे तथा देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारणोंने जो हर्ष-ध्वनि की उसके शब्दसे महान् कलकल नाद हुआ। उस कलकल ध्वनिसे मेरा लिंगमय स्वरूप प्रकट हुआ। इसीलिये उसे कलकलेश्वर कहा गया। द्वापरकी सन्धिमें जब कलियुगका प्रवेश हुआ, उस समय देवर्षि नारदने उस लिंगके समीप उग्र तपस्या की और देवाधिदेव महादेवजीकी प्रसन्नताके लिये पौण्डरीक नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञके पूर्ण होनेपर प्रभासक्षेत्रके निवासी सहस्रों ब्राह्मण दक्षिणाके लिये आये। नारदजीने वहाँ भूमिपर रत्नों और सुवर्णकी वर्षा कर दी। सब ब्राह्मण उसे लेनेके लिये महान् कोलाहल करने लगे। इस कारण भी उस शिवलिंगका नाम कलकलेश्वर हुआ। जो मनुष्य उस शिवलिंगको भक्तिपूर्वक स्नान कराकर उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे प्रसादसे निश्चय ही रुद्रलोकमें जाता है। जो मानव वहाँ ब्राह्मणोंको सुवर्णदान करके भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प और चन्दन आदिसे कलकलेश्वरकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है।
* प्रभासखण्ड * १२५५
| कलकलेश्वरके समीप ही नकुलीश तथा दो परम पुण्यमय लिंग हैं। जो मनुष्य भादोंमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको उपवास करके उनके समीप जागरण करता है और नकुलीश तथा उन दोनों लिंगोंकी पृथक्-पृथक् पूजा करता है, वह मुझ महेश्वरके परम धामको जाता है।<br><br>महादेवि ! वहाँसे दक्षिण थोड़ी ही दूरपर उतंककेश्वर लिंग है, जिसे महात्मा उतंकने स्वयं ही भक्तिपूर्वक स्थापित किया है। जो उसका दर्शन, स्पर्श और भक्तिभावसे विधिवत् पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उस स्थानसे अग्निकोणमें पाँच धनुषकी दूरीपर वैश्वानरेश्वर देव विराजमान हैं। प्राचीन कालमें वहाँ किसी तोतेने मन्दिरके भीतर सुन्दर घोंसला बना रखा था। उसमें अपनी स्त्रीके साथ रहकर उसने दीर्घकालतक तपस्या की। घोंसलेमें आने जानेके कारण वे दोनों दम्पति प्रतिदिन वैश्वानरेश्वरकी परिक्रमा कर लेते थे। दीर्घकालके पश्चात् उन दोनोंकी मृत्यु हो गयी। उसीके प्रभावसे वे दोनों इस पृथ्वीपर अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रखनेवाले ब्राह्मण-दम्पति हुए। स्त्रीका नाम लोपामुद्रा और पुरुषका नाम अगस्त्य हुआ। उन दोनोंने परम सिद्धि प्राप्त की। अपने पूर्व शरीरके वृत्तान्तको याद करके महात्मा अगस्त्यने कहा है कि 'जो मनुष्य वह्नीश्वरकी | परिक्रमा करके उनका दर्शन करता है, वह निश्चय ही सिद्धिको प्राप्त होता है। जो मानव श्रद्धापूर्वक अग्नीश्वरको घृतसे नहलाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है और श्रेष्ठ ब्राह्मणको सुवर्ण देता है, वह अग्निलोकमें जाकर अनन्त कालतक आनन्द भोगता है।'<br><br>वैश्वानरेश्वरसे पश्चिम सात धनुषकी दूरीपर लकुलीश्वर विराजमान हैं। जो मनुष्य सदा उनका पूजन करता है, विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको और उत्तरायण आरम्भ होनेके दिन उनकी आराधना करता और बुद्धिमान् ब्राह्मणको विद्यादान देता है, वह सात जन्मोंतक धनाढ्य ब्राह्मणोंके उत्तम कुलमें जन्म ले बुद्धिमान् तथा लक्ष्मीवान् होता है।<br><br>उस स्थानसे पूर्व दिशामें दैत्यसूदनके पश्चिम पाँच धनुषके अन्तरपर गौतमेश्वर लिंग प्रतिष्ठित है, जो संपूर्ण इच्छित फलोंको देनेवाला है। मद्रदेशके राजा शल्यने उसकी आराधना की थी। जो मनुष्य चैत्र शुक्ला चतुर्दशीके दिन गौतमेश्वरको दूधसे स्नान कराता है और चन्दन, जल तथा फूलोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। गौतमेश्वरके दर्शनसे मन, वाणी और क्रिया द्वारा किये हुए सब पाप नष्ट हो जाते हैं। |
$\sim\sim\sim\circ\sim\sim\sim$
वैष्णवक्षेत्रमें भगवान् दैत्यसूदनकी महिमा
| महादेवजी कहते हैं— महादेवि! गौतमेश्वरके स्थानसे देवेश्वर भगवान् दैत्यसूदनके समीप जाना चाहिये, जो प्रभासक्षेत्रमें निवास करनेवाले सब प्राणियोंके पापोंका नाश करते हैं। भगवान् दैत्यसूदन सबके कार्योंकी सिद्धि करनेवाले हैं। भयंकर भवसागरमें पड़े हुए प्राणियोंको पार उतारनेके लिये वे सुदृढ़ जहाजकी भाँति स्थित हैं। पार्वती ! वटवृक्ष, कल्पवृक्ष, वैदूर्यपर्वत, भगवान् दैत्यसूदन तथा महामुनि मार्कण्डेय—इनका सात कल्पोंतक क्षय अथवा विनाश नहीं होता। | दैत्यसूदनसे बढ़कर दूसरा कोई देवता इस पृथ्वीपर नहीं है। उनका क्षेत्र यवाकार है, वह सब पातकोंका नाश करनेवाला, ऋषि-मुनियोंसे सेवित तथा यक्ष, विद्याधर और नागगणका आश्रय है। उस वैष्णवक्षेत्रकी सीमा इस प्रकार है—पूर्वमें यमेश्वरतक, पश्चिममें सोमेश्वरतक, उत्तरमें विशालाक्षीतक और दक्षिणमें समुद्रतक वह फैला हुआ है। जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सब स्वर्गलोकमें जाते हैं। वहाँ जो कुछ दान, होम, जप और तप किया जाता |
| १२५६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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है, वह सात कल्पोंतक अक्षय बना रहता है। जो वहाँ भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये विधिपूर्वक एक ब्राह्मणको भी भोजन करायेगा, उसे एक करोड़ ब्राह्मण-भोजन करानेका फल होगा। जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक उपवास करता है, उसे एक ही उपवाससे दस हजार उपवासोंका फल मिलता है। जो मानव कार्तिकमासकी द्वादशीको चक्रतीर्थमें स्नान करके इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास एवं विधिवत् भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
पार्वतीजीने पूछा— भगवन्! श्रीविष्णुका दैत्य-सूदन नाम किस समय और किस प्रकार हुआ?
महादेवजीने कहा— देवि! भगवान् दैत्यसूदन विष्णुके नाम अनादि और अनन्त हैं। प्रत्येक कल्पमें उनके नये-नये नाम प्रसिद्ध होते हैं। पूर्वकल्पमें उनका नाम श्रियावृत था, दूसरे कल्पमें वामन हुआ, तीसरेमें वे वज्रांग कहलाये, चौथेमें कमलाप्रिय नाम हुआ, पाँचवेंमें दुःखहर्ता, छठेमें पुरुषोत्तम और सातवें कल्पमें वे दैत्यसूदन नामसे प्रसिद्ध हुए।
पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंमें बड़ा भारी युद्ध हुआ। उसमें देवकण्टक दानवोंसे पराजित होकर सब देवता क्षीरसागरमें निवास करनेवाले श्रीहरिकी शरणमें गये और प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले— देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। आप दैत्यों और असुरोंका मान मर्दन करनेवाले हैं। आपने ही वाराहरूप धारण करके इस पृथ्वीका उद्धार किया था। मत्स्यरूपसे आपने ही समुद्रके जलसे वेदोंका उद्धार किया है। जब क्षीरसागरका मन्थन हो रहा था, उस समय कूर्मरूप धारण करके आपने अपनी पीठपर मन्दराचल उठाया और लक्ष्मीजीका उद्धार किया; आपको नमस्कार है। आप लक्ष्मीपति हैं; लक्ष्मीजीने आपका आश्रय लिया है। देव! आप पीड़ितोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। आपने वामनरूप धारण करके बलिको बाँधा है और वाराहरूपसे महादैत्य हिरण्याक्षका वध किया है। आपने ही नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको आकाशमें धारण करके मारा है। आप ही सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं। प्रभो! महादेव! आपने ही समस्त संसारका उद्धार किया है।
पार्वती! यह स्तोत्र सुनकर कमलनयन भगवान् विष्णुने ब्रह्मा आदि देवताओंसे कहा—‘देवगण! तुम दानवोंका भय छोड़ दो, मैं शीघ्र ही उनका संहार करूँगा?’ यो कहकर श्रीविष्णु देवताओंके साथ वहाँ आये और चक्रद्वारा पृथक्-पृथक् सब दानवोंका संहार आरम्भ किया। यह देख सब दानव भयसे विकल हो भागने लगे। प्रभासक्षेत्रमें आकर उन्होंने समुद्रकी शरण ली। भगवान्ने अपने चक्रसे सब दैत्योंका सफाया कर डाला। उनके मारे जानेपर देवताओं, ब्राह्मणों तथा तपस्वी जनोंका कल्याण हुआ। संसारकी व्याकुलता दूर हुई और सबका चित्त स्वस्थ हुआ। तभीसे भगवान् विष्णुका नाम ‘दैत्यसूदन’ हुआ। उनका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंतक जड, अन्ध, दरिद्र और दुःखी नहीं होता। श्रवण नक्षत्रमें द्वादशीका योग पुण्यदायक है तथा रोहिणी नक्षत्रमें अष्टमीका संयोग शुभ है। उस समय भगवान् दैत्यसूदनके शयन और उत्थापनका उत्सव होता है। उस अवसरपर दैत्यसूदनके समीप एक-एक उपवासका दस-दस उपवासके बराबर फल होता है। चाण्डाल, श्वपच और पशु-पक्षी भी वहाँ प्राण त्याग करनेपर वैकुण्ठधाममें जाते हैं। कार्तिक और वैशाखमासमें वहाँ श्रद्धापूर्वक एक मासतक उपवास करे। उस समय एक-एक उपवासका कोटि-कोटि उपवासके बराबर फल होता है। विष्णुक्षेत्रका ऐसा ही प्रभाव है। जो वहाँ एक मास या एक पक्षतक दीपदान करता है, उसे कोटिगुने फलकी प्राप्ति होती है। जो आषाढ़ शुक्ला एकादशीको निराहार रहकर भगवान् दैत्यसूदनको पंचामृतसे नहलाकर पूजा करे और नियमपूर्वक उनके समीप रहकर चातुर्मास्य व्यतीत करे, उसके ऊपर भगवान् विष्णु संतुष्ट होते हैं।
* प्रभासखण्ड * १२५७
जो मनुष्य एकादशी तिथिको वहाँ गीत, नृत्य, वाद्य तथा दृश्य-अभिनय आदिके द्वारा रातमें जागरण करता है, वह भगवान् विष्णुके उस परम धाममें जाता है, जहाँसे पुनः इस संसारमें आना नहीं होता। जिनकी निद्रा दैत्यसूदनके समीप जागरणमें बीत जाती है। वे स्वप्नमें भी यममार्ग, यमपुरी, यमदूत तथा असिपत्रवन आदि नरकोंका दर्शन नहीं करते। जो एकादशीको उपवास करके द्वादशीके दिन वहाँ नैवेद्य, तुलसीपत्र भक्षण करता है, उसकी कोटि-कोटि हत्याओंका नाश हो जाता है। पार्वती! सब पातकोंका नाश करनेवाले चक्रतीर्थमें स्नान करके भगवान् दैत्यसूदनकी सेवाके लिये पीले वस्त्र, गौ तथा सुवर्णका दान करना चाहिये।
योगेश्वरी देवीकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! दैत्योंका संहार करनेके पश्चात् भगवान् विष्णुने जहाँ अपने चक्रको धोया, वहीं आठ करोड़ तीर्थोंको लाकर स्थापित किया। उसमें सुदर्शनको शुद्ध करके उन्होंने उस तीर्थका चक्रतीर्थ नाम रख दिया। चक्रतीर्थमें कुल आठ करोड़, असी हजार तीर्थ हैं। जो मानव एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान करता है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करनेका पूरा फल पा लेता है। एकादशीको या विशेषतः चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणके अवसरपर जो उसमें स्नान करता है, वह कोटि यज्ञोंका फल पाता है। पूर्व कल्पमें इसका नाम कोटितीर्थ था। दूसरे कल्पमें श्रीनिधान, तीसरेमें शतधार और चौथेमें चक्रतीर्थके नामसे इसकी प्रसिद्धि हुई। उस वैष्णव क्षेत्रका प्रमाण आधा कोस बताया गया है। उसमें ब्रह्महत्या नहीं प्रवेश कर पाती। उस क्षेत्रमें जाकर जो मासोपवासी, अग्निहोत्री, पतिव्रता स्त्री एवं स्वाध्यायपरायण तथा यज्ञशील मानव चान्द्रायण आदि तप, तिल-जलसे पितरोंका तर्पण, श्राद्ध, एकरात्रव्रत, द्विरात्रव्रत, त्रिरात्रव्रत, कृच्छ्र, सान्तपन, मासोपवास या अन्य कोई पुण्य-कर्म करते हैं, वह अन्य क्षेत्रोंकी अपेक्षा कोटिगुना पुण्यदायक होता है।
चक्रतीर्थसे पूर्व दिशामें महादेवी योगेश्वरीका स्थान है। पूर्वकालमें महिषासुर नामक एक बड़ा भयंकर दैत्य हो गया है। वह इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला था और तीनों लोकोंको अपने वशमें करके सुखसे रहता था। एक समय ब्रह्माजीने एक मनोमयी कन्या उत्पन्न की। वह पृथ्वीपर अप्रतिम सुन्दरी थी। उस रूपवती कन्याने बड़ी घोर तपस्या की। एक दिन देवर्षि नारदजीने उस कन्याको देखा और महिषासुरके समीप गये। महिषासुरने मुनिका बड़ा स्वागत-सत्कार किया और कुशल-मंगल पूछते हुए कहा—'नारदजी! यहाँ पधारनेका क्या कारण है? बताइये।' मुनि बोले—'महादैत्य ! जम्बूद्वीपमें एक अनुपम सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई है। उसके जैसा रूप मैंने स्वर्ग, मर्त्यलोक और पातालमें भी न तो देखा है और न सुना ही है।'
मुनिकी यह बात सुनकर महिषासुर बड़ी भारी सेनाके साथ प्रभासक्षेत्रमें गया, जहाँ वह कन्या तप करती थी। वहाँ उस असुरने उससे इस प्रकार प्रार्थना की—'भीरु ! तुम मेरी स्त्री हो जाओ। यह तपस्या तुम्हारी जवानीके विरुद्ध है।' उसकी बात सुनकर वह तपस्विनी हँस पड़ी। हँसते समय उसके मुखसे सहस्रों भयंकर स्त्रियाँ हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये निकलीं। उन सबने महिषासुरकी सारी सेनाका संहार कर डाला। यह देख वह दैत्य कुपित हो अपने तीखे सींग हिलाता हुआ शीघ्र ही उस देवीके सम्मुख गया। उसके साथ बड़ा
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भारी युद्ध करके अन्तमें वह महिष पकड़ा गया। देवी सींग पकड़कर उसके ऊपर चढ़ गयी और पैरोंसे दबाकर उसे त्रिशूलसे मार डाला। फिर तलवारसे उसका मस्तक काट लिया। महिषासुरको मारा गया देख इन्द्र आदि देवताओंने प्रसन्नचित्त होकर देवीका स्तवन किया।
देवता बोले— महान् सौभाग्यशालिनी देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम गम्भीर स्वभाववाली हो। तुम्हारी दृष्टि बड़ी भयंकर है। तुम सदा न्यायके पथपर स्थित रहती हो, उत्तम सिद्धोंकी अधीश्वरी हो; तुम्हारे तीन नेत्र हैं और सब ओर मुख हैं। विद्या और अविद्या तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जया (विजयशक्ति) और जपनीय मन्त्रस्वरूपा हो। महिषासुरका मर्दन करनेवाली देवि! तुम सर्वत्र व्यापक, समस्त विद्याओंकी स्वामिनी और विश्वरूपा हो। तुम्हें नमस्कार है। तुम शोकसे परे और ध्रुवस्वरूपा हो। पद्मपत्रके समान विशाल नेत्रोंवाली देवि! तुम शुद्ध सत्त्वगुणोंमें स्थित हो, व्रतपरायण हो; तुम्हीं प्रचण्ड रूप धारण करनेवाली विभावरी (रात्रि) हो, तुम्हें नमस्कार है। ऋद्धि-सिद्धि देनेवाली देवि! तुम कालमृत्यु (प्रलयताण्डव) करनेवाली हो। धृति (धैर्य) तुम्हें विशेष प्रिय है। तुम्हीं शांकरी, ब्राह्मणी और ब्राह्मी हो। सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे हाथोंमें घण्टा और शूल शोभा पाते हैं। तुम महामहिष दानवका मर्दन करनेवाली हो, तुम्हारा रूप बड़ा भयंकर और नेत्र भयानक हैं। महामाये! तुम अमृतस्वरूपा और कल्याणमयी हो, तुम्हें नमस्कार है। सर्वत्र व्याप्त रहकर सब कुछ देनेवाली देवि! समस्त सात्त्विक वस्तुओंका उदय तुम्हींसे होता है। तुम्हीं विद्या, पुराण और शिल्पकलाकी जननी हो। सब भूतोंको धारण करनेवाली हो। सम्पूर्ण देव-रहस्योंका आश्रय तथा समस्त सत्त्वगुणी प्राणियोंको शरण देनेवाली हो। शुभे! तुम्हीं विद्या-अविद्या, प्रिया तथा अप्रिया हो।
देवताओंके इस प्रकार स्तवन करनेपर देवीने मुसकराते हुए कहा—'उत्तम वर माँगो।'
देवता बोले— देवि! जो श्रेष्ठ मानव यहाँ इस स्तोत्रके द्वारा तुम्हारा स्तवन करें, वे पूर्णकाम हों। इस क्षेत्रमें तुम सदा निवास करो।
'एवमस्तु' कहकर देवीने देवताओं और महर्षियोंको विदा किया और स्वयं वहीं रहने लगीं। जो मनुष्य आश्विन शुक्ला नवमीको उपवास करके भक्ति-भावसे योगेश्वरीदेवीका दर्शन करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है। जो मानव प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्रको पढ़ता है, उसे जीवनभर भयका सामना नहीं करना पड़ता। आश्विन शुक्ला अष्टमी यदि मूल नक्षत्रसे युक्त हो तो महाष्टमी मानी गयी है। वह तीनों लोकोंमें अत्यन्त दुर्लभ है। उस दिन जगदम्बाका पूजन करके मनुष्य अपने शत्रुओंपर विजय पाता है।
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आदिनारायणका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! योगेश्वरीसे पूर्व दिशामें आदिनारायण भगवान् विष्णु विराजमान हैं। ये पादुकापर खड़े हैं तथा सब दैत्योंका विनाश करनेवाले हैं। पहले सत्ययुगमें मेघवाहन नामसे प्रसिद्ध एक दैत्य हो गया है; उसे ब्रह्माजीने वरदान दिया था कि 'जब भगवान् विष्णु युद्धभूमिमें तुम्हें पादुकासे मारेंगे, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा नहीं।' इस प्रकार वर पाकर वह दैत्य देवता, असुर और मनुष्योंसहित समस्त भूमण्डलको संताप देने लगा। कोटि युगोंतक सबको नाना प्रकारके कष्ट देकर वह दक्षिण समुद्रके तटपर आया और वहाँ ऋषियोंके आश्रमोंका विध्वंस करने लगा। तब ऋषियोंने उसे अजेय समझकर
- प्रभासखण्ड * १२५९
भगवान् गरुडध्वजका स्तवन किया।
ऋषि बोले— परमकल्याण ! आपको नमस्कार है। आप कल्याणस्वरूप आत्मयोगीको नमस्कार है। आप जनार्दन, श्रीधर और वेधा (सृष्टिकर्ता) हैं। देव! आपको नमस्कार है। कमल-केसरके समान सुवर्णमय मुकुट धारण करनेवाले केशवको नमस्कार है। आप अत्यन्त सूक्ष्म तथा अतिशय महान् शरीरवाले हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, आपको नमस्कार है। आप ही श्रीहरि तथा हरिवेधा हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत हिरण्यगर्भ हैं, आपको नमस्कार है। आप अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले तथा उन्नत (सर्वोच्च पदमें स्थित) हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। मायाके परदेसे ढके हुए आप जगदाधार परमात्माको नमस्कार है। संसारसागरसे पार उतारनेवाले प्रभो! आप ज्ञाननौका प्रदान करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है। आपकी बुद्धि कभी कुण्ठित नहीं होती, आप धाता एवं संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आपका वासुदेव नाम सब पातकोंका नाश करनेवाला है, इस सत्यके प्रभावसे यह मेघवाहन दैत्य नष्ट हो जाय। भगवान् विष्णुके भक्तोंमें पाप नहीं ठहरता, भगवान् विष्णु स्मरण करते ही सब पापोंका नाश कर देते हैं—यह सत्य है तो यह पापात्मा मेघवाहन दैत्य नष्ट हो जाय। परमेश्वरके जगदाधार वासुदेव नामका भक्तिपूर्वक स्मरण करनेसे सबका कल्याण हो और समस्त संसारके सभी दोष नष्ट हो जायँ।
ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर आदिनारायण भगवान् श्रीहरिने पादुकापर आरूढ़ हो उन सबको दर्शन दिया और कहा—'आपलोगोंके मनमें कौन-सा कार्य उपस्थित हुआ है? बताइये, मैं उसे पूर्ण करूँगा। आपके द्वारा की हुई इस स्तुतिसे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ।'
ऋषि बोले— देव! आप सब कुछ जानते हैं, आपसे कुछ भी छिपा नहीं है। इस महाबली दैत्य मेघवाहनका संहार कीजिये, जिससे सारा विश्व निर्भय हो।
उनके यों कहनेपर भगवान् विष्णुने उस दैत्यको युद्धके लिये ललकारा और अपनी पादुकासे उसकी छातीमें प्रहार किया। उसकी चोट खाकर दैत्यके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह समुद्रमें गिर पड़ा। उस श्रेष्ठ दैत्यका वध करके भगवान् विष्णु उसी स्थानपर स्थित हो गये। आज भी वे वहीं पादुकाके आसनपर खड़े हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य एकादशी तिथिको भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाकर स्वर्गमें आनन्दित होता है। जिनके हृदयमें भगवान् आदिनारायण विराजमान हैं, उनके लिये कलियुगमें भी सत्ययुग है।
# पाण्डवेश्वरलिंग तथा ग्यारह रुद्रोंका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—** आदिनारायणसे तीन धनुष पश्चिम महानदी सन्निहिता विराज रही है। जब जरासन्धके आक्रमणके भयसे बाल, वृद्ध, वणिग्जन तथा अपने परिजनोंसहित सब यादवोंको साथ ले भगवान् श्रीकृष्ण मथुराको सूनी करके चले, तब प्रभासक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्होंने रहनेके लिये समुद्रसे स्थान माँगा। इसी समय सूर्यग्रहण लगा। तब भगवान् जनार्दनने यादवोंसे कहा—'मैं परम पवित्र सन्निहित नामक सरोवरको यहाँ लाऊँगा।' उनके इतना कहते ही धरती फोड़कर शुभ जलका प्रवाह प्रकट हुआ। यह देख बलरामजी तथा साम्ब आदि सभी यादवोंने उसमें ग्रहणस्नान किया। उसमें स्नान करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। वहाँ एक-एक आहुति देनेसे कोटि होमका फल होता है। उस स्थानमें रहकर यदि
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कोई मन्त्रजप करता है तो उसे एक-एक जपका कोटि-कोटिगुना फल मिलता है।
सन्निहिताके दक्षिण तटपर पाण्डवेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना पाँचों पाण्डवोंने की है। वनवासी पाण्डव जब अज्ञातवासमें थे, तब तीर्थयात्राके प्रसंगसे प्रभासक्षेत्रमें आये। उस समय चन्द्रग्रहणका पर्व था। उसी अवसरपर उन सबने सन्निहिताके किनारे पाण्डवेश्वरकी स्थापना की। मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको ऋत्विज् बनाकर उन्होंने वैदिक मन्त्रोंसे मुझ शिवका अभिषेक कराया। ऋषियोंने उस लिंगका माहात्म्य बताते हुए कहा—'जो लोग इस पाण्डव-पूजित लिंगकी अर्चना करेंगे, वे देवता, दानव तथा राक्षसोंके लिये भी पूजनीय होंगे। श्रद्धापूर्वक इसका पूजन करनेसे उन्हें अश्वमेध यज्ञका फल होगा। जो पूरे माघभर सन्निहिता कुण्डमें नहाकर पाण्डवेश्वरकी पूजा करता है, वह साक्षात् पुरुषोत्तम होता है। इस लिंगके दर्शनसे भी पापके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं।'
पार्वती! इस प्रकार श्रद्धापूर्वक यात्रा करके मनुष्य प्रभासक्षेत्रके ग्यारह रुद्रोंके समीप जाय। मनुष्योंसे जो ग्यारह इन्द्रियोंद्वारा ग्यारह प्रकारके पाप बन जाते हैं, उन सबका यहाँ ग्यारह रुद्रोंके पूजनसे नाश हो जाता है। संक्रान्ति, अयन, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा अन्यान्य पुण्य तिथियोंमें भक्तिभावसे क्रमशः ग्यारह रुद्रोंका पूजन करना चाहिये। कलिमें इन ग्यारह रुद्रोंके नाम इस प्रकार हैं— भूतेश, नीलरुद्र, कपाली, वृषवाहन, त्र्यम्बक, घोरनामा, महाकाल, भैरव, मृत्युंजय, कामेश और योगेश। पार्वती! ये जो ग्यारह रुद्र बताये गये हैं, इनका रहस्य सुनो। इनमें दस तो दस प्राणवायु हैं और एक आत्मा है। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय—ये ही दस प्राणवायु कहे गये हैं।
रुद्रोंमें आदिदेव सोमेश्वर भी हैं, उनकी भूतेश्वर नामसे विधिवत् पूजा करनी चाहिये। उन्हें पंचामृतसे स्नान कराकर 'सद्योजात' मन्त्रसे मनोहर पुष्पोंद्वारा पूजन करना चाहिये। भक्तिपूर्वक सदाशिवका ध्यान करते हुए तीन बार प्रदक्षिणा और साष्टांग प्रणाम करे। महत्तत्त्वसे लेकर विशेषपर्यन्त जो पचीस भूतगण बताये गये हैं, उन सबके ईश्वर होनेसे इन शिवको 'भूतेश्वर' कहते हैं। भूतेश्वरका पूजन करके मनुष्य अविनाशी मोक्षको प्राप्त होता है।
भूतेश्वरसे उत्तरभागमें सोलह धनुषपर द्वितीय रुद्र नीलरुद्रके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनको विधिपूर्वक स्नान कराकर ईश-मन्त्रद्वारा पूजा करे। कुमुद, उत्पल और कह्लार (लाल कमल) चढ़ाये। प्रदक्षिणा और नमस्कार करे। यों करनेसे मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। पूर्वकालमें नीले अंजनके समान रंगवाला अन्धकासुर उनके द्वारा मारा गया था, इसलिये वे नीलरुद्र कहलाये।
नीलरुद्रसे पूर्व और बुधेश्वरसे पश्चिम सात धनुष दूर कपालेश्वर विराजमान हैं। 'तत्पुरुष' मन्त्रद्वारा उनकी पूजा करे। उनके दर्शनसे जन्मभरका पाप नष्ट हो जाता है।
बालरूपधारी ब्रह्माजीसे उत्तर तीन धनुषपर वृषभेश्वर नामक चौथे रुद्र हैं। वे आदिलिंग हैं। पुण्यहीन मनुष्य उनको नहीं जानता। जो उन वृषभवाहन शिवका पूजन करता है, वह सात जन्मोंके पातकोंसे मुक्त हो जाता है। उनके चारों ओर तीस-तीस धनुषतक उन्हींका क्षेत्र है। जो उस तीर्थमें स्नान, जप, बलि, होम, पूजा, स्तोत्रपाठ आदि करता है, उसका वह सब कर्म अक्षय हो जाता है। जो एक रात उपवास करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वृषभेश्वरदेवके समीप जागरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो वहाँ भाँति-भाँतिके भोज्य पदार्थोंसे ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, उसे एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर कोटि ब्राह्मणोंके भोजन करानेका फल होता है। भैरव, केदार, पुष्कर, कुरुजांगल, कुरुक्षेत्र, काशी, महाकाल और नैमिष—ये आठ तीर्थ वृषभेश्वरलिंगमें प्रतिष्ठित हैं। जो माघकृष्णा चतुर्दशीकी रात्रिमें वहाँ जागता है, वह विधिपूर्वक उस लिंगकी
- प्रभासखण्ड * १२६१
पूजा करके उक्त आठों तीर्थोंके सेवनका फल पाता है। जो मनुष्य अमावास्याको वहाँ रुद्रके समीप पिण्डदान करता है, उसके पितर ब्रह्माजीके दिन (एक कल्प)-तक तृप्त रहते हैं। दही, दूध, घी, पंचगव्य, कुशोदक, कुंकुम, अगुरु तथा कपूर—इन सबको अघोरमन्त्रसे अभिमन्त्रित करके रातमें इनके द्वारा मेरा ध्यान करते हुए वृषभेश्वरका पूजन करे। यों करनेसे मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है। यदि उन्हें दूधसे नहलाये तो पूर्वजन्म और इस जन्मके पापका नाश हो जाता है। जो मनुष्य पंचगव्यसे वृषभेश्वरको स्नान कराता है, वह अपने सब पातकोंको जला देता है। उस लिंगकी पूजाके लिये उद्यत होते ही मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। जो मानव पूरे कार्तिकभर ब्रह्मेश्वर महालिंगका पूजन करता है, उसे सब प्रकारके पातकोंसे छुटकारा मिल जाता है। इस प्रकार वृषभेश्वर शिवका देवपूजित माहात्म्य बताया गया।
वहाँसे अविनाशी त्र्यम्बकेश्वरलिंगके समीप जाय। त्र्यम्बकेश्वरजी पाँचवें रुद्र माने गये हैं। इनका स्थान कपिलेश्वर लिंगसे ईशानकोणमें सोलह धनुषकी दूरीपर है। ये सबके ऊपर दया करनेवाले तथा सब वांछित फलोंको देनेवाले हैं। इनके दर्शनसे भी पातकोंके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं। जो भक्तिभावसे कामदेव मन्त्रद्वारा इनका विधिवत् पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो चैत्र शुक्ला चतुर्दशीकी रातमें वहाँ जागरण करता है और पूजा, स्तुति एवं कथा-वार्तामें समय बिताता है, वह मनोवांछित फल पाता है।
इसके बाद छठे रुद्र अघोरेश्वरलिंगके समीप जाय। इनका स्थान त्र्यम्बकेश्वरसे वायव्यकोणमें पाँच धनुषके अन्तरपर है। ये सम्पूर्ण अभीष्टफलोंके दाता तथा कलियुगके पापोंका नाश करनेवाले हैं। जो मानव स्नान-पूजन आदिके क्रममें इनकी आराधना करता है, उसे सुवर्णमय मेरुगिरिके दानका फल प्राप्त होता है। अघोरेश्वरदेवके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है। जो मनुष्य अघोरेश्वरके दक्षिण भागमें श्राद्ध करता है, उसके पितर कल्पपर्यन्त तृप्त रहते हैं।
अघोरेश्वरसे उत्तर कुछ-कुछ वायव्यकोणकी ओर तीस धनुषकी दूरीपर महाकालेश्वरका स्थान है। वह लिंग सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसके भीतर मैं कालरूपसे प्रतिष्ठित हूँ। वह कल्पपर्यन्त स्थिर रहनेवाला और मेरा विशेष प्रिय है। जो षडक्षर मन्त्रद्वारा उसकी पूजा करता है, वह उसी क्षण मृत्युको जीत लेता है। जो कृष्णपक्षकी अष्टमीमें रातके समय विधिपूर्वक पूजा करके घृतमिश्रित गुग्गुलका धूप देता है, उसके सहस्रों अपराध भैरवजी क्षमा कर देते हैं। महर्षिलोग उस स्थानपर गोदानकी महिमा बतलाते हैं। वहाँ गोदान करनेवाले पुरुष अपने आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं। जो महाकालेश्वरके दक्षिणभागमें रुद्रियका जप करता है, वह मातृकुल और पितृकुल दोनोंको तारता है।
महाकालेश्वरसे अग्निकोणमें बीस धनुष दूर भैरवेश्वरका स्थान है। भैरवेश्वरलिंग सब वांछित फलोंका देनेवाला तथा दरिद्रताका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें चण्ड नामक मेरे पार्षदने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक उसकी आराधना की थी, इससे उसका नाम चण्डेश्वर हुआ। जो एकाग्रचित्त हो देवाधिदेव चण्डेश्वरका दर्शन और स्पर्श करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। भाद्रपदमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके जो भैरवेश्वरके समीप जागरण करता है, वह मेरे परम धामको जाता है। भैरवेश्वरके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यात्राके उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अपने सब पापोंका नाश करनेके लिये वहाँ तिल, सुवर्ण और वस्त्रका दान करना चाहिये। कल्पके अन्तमें वे रुद्रदेव भैरव (भयानक)
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आकार धारण करके सम्पूर्ण विश्वका संहार करते हैं, इसलिये भैरव कहलाते हैं।
भैरवेश्वरसे अग्निकोणमें दस धनुषकी दूरीपर मृत्युंजयेश्वरलिंग स्थित है। सागरादित्यसे पश्चिम चार धनुषपर वह स्थान है। वह लिंग दर्शन और स्पर्श करनेपर सब प्राणियोंके पापोंका नाश करनेवाला है। मेरे पार्षद नन्दीने उस महालिंगकी स्थापना करके नित्य पूजनमें तत्पर हो लाख करोड़ महामृत्युंजयका जप किया है। इससे प्रसन्न होकर मैंने उसे अपने गणोंका आधिपत्य और सामीप्य मुक्ति प्रदान की है। मृत्युंजयमन्त्रसे प्रसन्न होकर वहाँ मेरे स्वरूपभूत रुद्र प्रकट हुए, इसलिये उनका नाम मृत्युंजयेश्वर हुआ। जो मनुष्य भक्तिभावसे मृत्युंजयेश्वरका पूजन अथवा दर्शन करता है, उसके सात जन्मोंका पाप वे नष्ट कर देते हैं।
मृत्युंजयेश्वरसे उत्तर दिशामें तीन धनुषपर कामेश्वरलिंग स्थित है, जिसके दर्शन और पूजनसे सात जन्मोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है और सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। जो मानव कामेश्वरलिंगका पूजन करेंगे, वे उत्तम गतिको प्राप्त होंगे। इस लिंगके प्रसादसे उनके सब मनोरथोंकी सिद्धि होगी। जो चैत्र शुक्ला त्रयोदशीको कामेश्वरजीका पूजन करता है, वह मनुष्योंमें पुत्र और सौभाग्यसे सम्पन्न एवं पूर्णकाम होता है।
कामेश्वरसे वायव्यकोणमें सात धनुष दूर योगेश्वरलिंग है। वहाँ मेरे असंख्य पार्षदोंने योगनिष्ठ होकर सहस्रों वर्षोंतक घोर तपस्या की थी। तब मैंने प्रसन्न होकर उन्हें सालोक्य मुक्ति प्रदान की थी। उनके षडंगयोगसे सन्तुष्ट होकर शिवलिंगका प्रादुर्भाव हुआ था। इसलिये उसका नाम योगेश्वर हुआ। जो मानव विधिपूर्वक भक्तिभावसे उसकी पूजा करता है, उसे योगसिद्धि प्राप्त होती है। जो प्रभासक्षेत्रमें स्थित इन ग्यारह रुद्रोंको नहीं जानता, वह उस क्षेत्रके बीचमें रहकर भी नहींके समान है। उसे पशु माना गया है। इन ग्यारह रुद्रोंमेंसे सबका अथवा एकमात्र सोमेश्वरका पूजन करके जो शतरुद्रियका जप करता है, उसे सब रुद्रोंके पूजनका फल प्राप्त हो जाता है। पार्वती! ग्यारह रुद्रोंका यह गुप्त माहात्म्य तुम्हें बताया गया।
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चन्द्रेश्वर, चक्रपाणि, दण्डपाणि तथा साम्बादित्यकी महिमा
**महादेवजी कहते हैं—**सोमेश्वरसे वायव्यकोणमें साठ धनुषकी दूरीपर चन्द्रेश्वरलिंग है। वह दिव्य लिंग सब पातकोंका नाश करनेवाला है। चन्द्रेश्वरका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंके समस्त पापोंसे मुक्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। प्राचीन कालमें यह पृथ्वी दैत्योंके भारसे पीड़ित हो गौका रूप धारण करके प्रभासक्षेत्रमें आयी और उसने भक्तिभावसे उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। इससे मैं प्रसन्न हुआ और उससे बोला—'भूदेवी! भगवान् विष्णुके हाथसे मारे जाकर सब दैत्य नष्ट हो जायेंगे और तुम्हारा भार उतर जायगा। तुमने जो यह परम सुन्दर शिवलिंग स्थापित किया है, यह संसारमें धरित्रीश्वरके नामसे विख्यात होगा। मैं इस लिंगमें सदैव निवास करूँगा। भादोंके कृष्णपक्षकी तृतीयाको जो मनुष्य इस शिवलिंगका पूजन करेगा, वह निश्चय ही अश्वमेध यज्ञका फल पायेगा। केवल इस लिंगके पूजनसे सब तीर्थोंमें स्नानका और सब प्रकारके दानोंका फल मिल जायगा। इसके चारों ओर सोलह धनुषतक इसीका क्षेत्र होगा और यह क्षेत्र समस्त प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करेगा। इस क्षेत्रमें मरनेवाले प्राणी उत्तम गतिको प्राप्त होंगे।'
यों कहकर मैं वहाँसे अन्तर्धान हो गया। तदनन्तर वाराहकल्पमें किसी समय दक्षके शापसे चन्द्रमा राजयक्ष्मासे पीड़ित हो क्षीण होने लगे। तब वे समुद्रके निकट प्रभासक्षेत्रमें आये और इस पृथ्वीश्वरलिंगका दर्शन करके इसके प्रभावको
- प्रभासखण्ड * | १२६३ ---|---
जानकर इसीकी आराधनामें तत्पर हो गये। इसके माहात्म्यसे चन्द्रमाका पापजनित रोग दूर हुआ। तबसे इसका नाम 'चन्द्रेश्वर' हो गया।
तदनन्तर जहाँ चक्रधर विष्णु तथा दण्डपाणि गणेश दोनों एक स्थानपर स्थित हैं, वहाँकी यात्रा करे। जो मानव भक्तिभावसे क्रमशः उन दोनोंका पूजन करता है, वह पापसे मुक्त हो मेरे लोकमें जाता है। जो माघमासकी चतुर्दशी और कृष्णपक्षकी अष्टमीको गन्ध, पुष्प, धूप आदि उपचारोंसे दण्डनायककी पूजा करता है, उसे कभी विघ्न नहीं प्राप्त होता। जो एकादशी तिथिको निराहार रहकर चक्रपाणिका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।
इस प्रकार यहाँ संक्षेपसे चक्रपाणि और दण्डपाणिका माहात्म्य बताया गया।
इन दोनोंके उत्तर और बालरूपधारी ब्रह्मासे वायव्यकोणमें साम्बके द्वारा स्थापित देवश्रेष्ठ साम्बादित्यका स्थान है। प्रभासक्षेत्रमें जो साम्बनामक पुर है, वही सूर्यनारायणका द्वितीय स्थान है। वहाँ भगवान् सूर्य बारह स्वरूपोंमें विभक्त हो सदा सबके कल्याणके लिये निवास करते हैं और भक्तोंद्वारा दी हुई पूजाको ग्रहण करते हैं। जो मनुष्य वहाँ बारह नामोंवाले सूर्यदेवकी स्तुति करेगा, उसकी सात जन्मोंकी दरिद्रता नष्ट हो जायगी। आदित्य, सविता, सूर्य, मिहिर, अर्क, प्रतापन, मार्तण्ड, भास्कर, भानु, चित्रभानु, दिवाकर तथा रवि—ये सूर्यदेवके सामान्य नाम हैं। विष्णु, धाता, भग, पूषा, मैत्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा तथा पर्जन्य—ये बारह स्वरूपोंके विशेष नाम हैं। ये सभी क्रमशः बारह महीनोंमें सूर्यमण्डलमें तपते हैं। चैत्रमें विष्णु, वैशाखमें अर्यमा, ज्येष्ठमें विवस्वान्, आषाढ़में अंशुमान्, श्रावणमें पर्जन्य, भाद्रपदमें वरुण, आश्विनमें इन्द्र, कार्तिकमें धाता, अगहनमें मित्र, पौषमें पूषा, माघमें भग और फाल्गुनमें त्वष्टा तपते हैं। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें द्वादश मूर्तिवाले सूर्यदेव विराजमान हैं। माघशुक्ला पंचमीको एकभक्तव्रत, षष्ठीको नक्तव्रत और सप्तमीको साम्बादित्यके समीप उपवास-व्रत करके व्रती मनुष्य लाल-चन्दन मिश्रित कनेरके फूलोंसे सूर्यनारायणके लिये अर्घ्य और धूप देकर पूजा करे। शक्तिके अनुसार ब्राह्मण-भोजन भी कराये। जो इस प्रकार साम्बादित्यका पूजन करता है, वह उस लोकमें समस्त मनोवांछित फलोंको पा लेता है।
बालरूपधारी ब्रह्माकी महिमा, ब्रह्माजीकी आयुका मान तथा त्रिदेवोंकी एकता
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! साम्बादित्यसे उत्तर दिशामें कपालेश्वर विराजमान हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है और पूर्वजन्मके पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
उससे उत्तर कोटीश्वरलिंग है, जो सबके पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ कोटि ऋषियोंने सिद्धि प्राप्त की है, इसलिये उनका नाम कोटीश्वर है। जो मानव भक्तिभावसे कोटीश्वरका पूजन करता है, उसे एक करोड़ मन्त्र-जपका फल प्राप्त होता है। कोटीश्वरके निकट वेदवेत्ता ब्राह्मणको सुवर्ण देना चाहिये।
सोमेश्वर, दैत्यसूदन, बालरूपधारी ब्रह्मा, अर्कस्थल, सूर्य तथा शशिभूषण—ये छः प्रभासक्षेत्रके श्रेष्ठ देवता हैं। इनके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है और जन्मसे लेकर मृत्युतकके भयंकर पापोंसे छूट जाता है।
पार्वतीजीने पूछा—भगवन्! अन्य सब स्थानोंमें तो वृद्धरूपी ब्रह्मा हैं, यहाँ वे बालरूपी कैसे हुए?
महादेवजीने कहा—देवि! मनुष्य इस संसारमें
१२६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
तभीतक दुःख, शोक और भयके समुद्रमें डूबे रहते हैं, जबतक कि ब्रह्माजीके प्रति उनकी भक्ति नहीं होती। जीवका चित्त जैसे विषयोंमें लगा है, यदि उसी प्रकार ब्रह्माजीमें भी लग जाय, तो कौन बन्धनसे मुक्त न होगा। सोमनाथसे ईशानकोणमें और साम्बादित्यसे अग्निकोणमें ब्रह्माजीका उत्तम स्थान है। वहाँ बालरूपधारी ब्रह्माजी विराजमान हैं। जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, सब लोकोंके स्रष्टा और महान् तेजस्वी हैं, वे ही इस प्रभासक्षेत्रमें आठ वर्षकी आयुमें आये हैं। उन्होंने ही सोमनाथ-लिंगकी स्थापना करके ब्राह्मणोंको बहुत-सी दक्षिणा दी। प्रभासक्षेत्रमें रहते हुए बालरूपधारी ब्रह्माजीके बयालीस वर्ष बीत गये हैं। इस प्रकार उनकी आयुका एक परार्ध व्यतीत हो गया।
पार्वतीजीने कहा— प्रभो! ब्रह्माजीके दिन, मास और वर्षका परिमाण बताइये।
महादेवजीने कहा— देवि! ब्रह्माजीकी जो परम आयु है, उसका एक परार्ध बीत गया है। अब दूसरा परार्ध चल रहा है। आठ वर्षकी आयुमें यहाँ आये थे, इसीलिये उन्हें बालरूपी कहते हैं। प्रभासक्षेत्रको छोड़कर अन्य सब तीर्थोंमें वे वृद्धरूपी ही हैं। प्रथम कल्पमें इनका नाम स्वयम्भू था। दूसरेमें पद्मभू, तीसरेमें विश्वकर्ता और चौथेमें बालरूपी कहे गये हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन इन नामोंको स्मरण करता है, वह दीर्घायु होता है। चन्द्र, सूर्य आदि सभी ग्रह, देवता, असुर, दानव तथा समस्त त्रिलोकी—ये सब ब्रह्माजीकी रात आनेपर नष्ट हो जाते हैं। फिर दिन आनेपर जब ब्रह्माजी जगते हैं, तब पूर्ववत् सृष्टि करने लगते हैं।
पलक गिरनेमें जितना समय लगता है, उसके एक चौथाई भागको त्रुटि कहते हैं। दो त्रुटिका एक निमेष होता है। पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है। तीस काष्ठाओंकी एक कला, तीस कलाओंका मुहूर्त और पंद्रह मुहूर्तोंका एक दिन होता है। दिनके बराबर ही रातका भी मान है। दिन तथा रात दोनोंको एक 'अहोरात्र' कहते हैं। पंद्रह दिन-रातोंका पक्ष और दो पक्षोंका मास होता है। छः मासोंका एक अयन और दो अयनोंका एक वर्ष होता है। तैंतालीस लाख बीस हजार सौर वर्षोंका एक चतुर्युग होता है। इकहत्तर चतुर्युगोंका मन्वन्तर कहा गया है। यही संक्षेपसे इन्द्र देवताकी आयु बतायी गयी है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु और चौदह इन्द्र नष्ट होते हैं। विश्ववक्ता, विपश्चित्, स्वचिति, शिवि, विभु, मनोभुव, ओजस्वी, बलि, अद्भुत, शान्ति, वृषा, शतधामा, दिवस्पति, शुचि—ये चौदह इन्द्र हैं। ब्रह्माजीका दिन जितना बड़ा होता है, उनकी रात भी उतनी ही होती है। यह कल्पका मान बताया गया। पहला श्वेत कल्प है। दूसरे कल्पका नाम नीललोहित, तीसरेका वामदेव, चौथेका रथन्तर, पाँचवेंका रौरव, छठेका प्राण, सातवेंका बृहत्कल्प, आठवेंका कन्दर्प, नवेंका सद्यःकल्प, दसवेंका ईशान, ग्यारहवेंका ध्यान, बारहवेंका शाश्वत, तेरहवेंका उदान, चौदहवेंका गरुड, पंद्रहवेंका कूर्म, सोलहवेंका नारसिंह, सत्रहवेंका समाधि, अठारहवेंका आत्रेय, उन्नीसवेंका सोम, बीसवेंका भावन, इक्कीसवेंका तत्पुरुष, बाइसवेंका वैकुण्ठ, तेइसवेंका अर्चित, चौबीसवेंका रुद्र, पचीसवेंका लक्ष्मी, छब्बीसवेंका सारस्वत, सत्ताईसवेंका वैराज, अट्ठाइसवेंका गौरी-कल्प, उन्तीसवेंका माहेश्वरकल्प और तीसवेंका नाम पितृकल्प है। यही ब्रह्माजीकी अमावास्या है। ब्रह्माजीके महीनेके ये तीस कल्प बताये गये। व्यतीत हुए सभी कल्पोंके नाम बताये जा चुके हैं। इस समय वाराहकल्प चल रहा है। यही ब्रह्माजीकी प्रतिपदा है, जिसमें भगवान् वाराहने रसातलसे पृथ्वीका उद्धार किया। तीस कल्पोंका ब्रह्माजीका एक मास माना गया है। ऐसे बारह मासोंका एक वर्ष होता है। ऐसे वर्षमानसे जब ब्रह्माजी आठ वर्षके थे, तब सोमदेव उन्हें प्रभासक्षेत्रमें ले आये और उन्हींके द्वारा सोमनाथकी प्रतिष्ठाका कार्य सम्पन्न हुआ। इस प्रकार प्रभासक्षेत्रमें