भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1248, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1248

* प्रभासखण्ड * १२१९


स्थान अगम्य है। मेरे लोकमें जो पातालवासी सिद्ध हैं, वे कालभैरव सोमनाथकी प्रदक्षिणा करते हैं। पृथ्वीमें जो पुण्यतीर्थ, मन्दिर और देवता हैं, वे सभी सोमेश्वर देवकी परिक्रमा करते हैं।

शाकुनि, भारभूति, आषाढि, दण्ड, पुष्कर, नैमिष, अमरेश्वर, भैरव, मध्यम, काल, केदार, कणवीरक, अट्टहास, महेन्द्र, श्रीशैल तथा गया आदि सभी तीर्थ भगवान् सोमनाथकी प्रदक्षिणा तथा उनके लिंगकी स्तुति करते हैं। जहाँ प्राची सरस्वती है, वहाँ दस सहस्र अरब तथा तीन करोड़ ऋषि निवास करते हैं। जो मनुष्य यहाँ अपने पापनाशके लिये स्नान करेंगे, उन्हें दस गोदानका पुण्य प्राप्त होगा। वहाँपर शूलभेद आदि लिंग पूजन करने योग्य हैं। महापापाचारी मनुष्य भी प्राची सरस्वतीमें प्राणत्याग करके साक्षात् शिवको प्राप्त होता है। विप्रवरो! वहाँ दही और कम्बल दान करने चाहिये। यह दान सब पापोंका नाश करनेवाला तथा सारसे भी सार पुण्य है। ब्राह्मस्थानमें एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटिगुना फल मिलता है। यह जानकर मैं वहाँ प्रसन्नतापूर्वक स्थित रहता हूँ। कलियुगमें वहाँ सभी तीर्थ अदृश्य होकर रहते हैं। मनोहर प्रभासक्षेत्रमें जहाँ सोमनाथजी स्थित हैं, वहाँ मेरे दो गण उद्भ्रम और संभ्रम रहते हैं। वे वहाँ रहनेवाले दुष्ट लोगोंके मनमें भ्रम एवं विभ्रम उत्पन्न कर देते हैं। इस प्रकार वे दुष्ट चित्तवाले प्राणियोंसे उस क्षेत्रकी रक्षा करते हैं।

जो श्रेष्ठ मानव इस तीर्थमें भक्तिपूर्वक दण्डपाणिका दर्शन करते हैं, उन्हें किसी प्रकारका विघ्न नहीं प्राप्त होता। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा वर्णसंकर इच्छा या अनिच्छासे उस शुभ क्षेत्रके भीतर मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सभी मेरा सारूप्य प्राप्त करके मेरे दिव्यधाममें चले जाते हैं। मेरु, सातों द्वीप तथा सातों समुद्रोंके गुणोंका वर्णन किया जा सकता है; परंतु आदिदेव सोमेश्वर शिवके गुणोंका वर्णन सौ कोटि वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है।

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सोमनाथके दिव्य स्वरूपका दिग्दर्शन

महादेवजी कहते हैं—देवि! जो निर्भय, निर्मल, नित्य, निरपेक्ष, निराश्रय, निरंजन, निष्प्रपंच, निःसंग तथा निरुपद्रव तत्त्व है, वही प्रभासतीर्थमें सोमेश्वर लिंगके रूपमें स्थित है—यह समझो। जो मोक्षदायक, अज्ञेय, अनुपम, अनामय, नित्य, कारणरूप, दिव्य, निर्लेप, विश्वतोमुख, शिव, सर्वात्मक, सूक्ष्म, अनादि, दैवतरूप, आत्मस्वरूपसे जाननेयोग्य, चित्तके चिन्तनसे परे, गमनागमनसे मुक्त, बाहर-भीतर व्याप्त, केवल (अद्वितीय), निष्कल, निर्मल एवं ज्ञानका प्रकाशक है, वही प्रभासतीर्थमें प्रणवमय सोमेश्वर लिंगके रूपमें स्थित है—यह जानो। स्पन्दरहित, महात्मा, भावातीत, लक्षणरहित, वाक्प्रपंच आदिसे शून्य, निष्प्रपंच, शिव, ज्ञान और ज्ञेयकी दृष्टिमें स्थित, हेत्वाभासशून्य, अनाहत, शब्दगत तथा शब्दादि गुणोंको प्रकट करनेवाले—ऐसे विशेषणोंसे युक्त मुझ शिवको ही प्रभासक्षेत्रमें सोमनाथ लिंगके रूपमें प्रकट मानो।

प्रभासक्षेत्रमें शिवलिंगरूपी सोमनाथको शब्द-ब्रह्ममय, शान्त, अशान्त, निरास्पद, सबसे दूर, सबके ध्यानमें स्थित, अनादि, अच्युत, दिव्य, प्रमाणातीत, प्रमाणगोचर, अधोगत, ऊर्ध्वगत, नित्य, देहस्थित जीवरूप, हृदय आदि बारह अंगोंमें स्थित, प्राण और अपानके उदय-अस्तमें व्याप्त, अग्राह्य, इन्द्रियरूप, निष्कलंक, सूक्ष्म, स्वरका आदि, व्यंजनसे अतीत, वर्ण आदिसे रहित, निःशब्द, निष्कल, सौम्य, देहातीत, परात्पर, समस्त भूतोंके लिये अगम्य, भावाभावसे रहित,

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