भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1238
* नागरखण्ड-उत्तरार्ध *१२०९

भक्तवत्सल देवदेव महादेवजी पहले मेरी दृष्टिमें आये हैं। दूसरा समझता था, पहले मुझे ही भगवान्‌का दर्शन हुआ है। ऐसा जानते हुए उन श्रेष्ठ तापसोंने भगवान्‌का इस प्रकार स्तवन किया—

तापस बोले—जो देवताओंके भी अधिदेवता तथा सर्वदेवस्वरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। शान्त, सूक्ष्म तथा अन्धकासुरका नाश करनेवाले शिवको नमस्कार है। जो सदा द्युलोकके आश्रित रहकर विभिन्न वायुओंके द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌को जीवन प्रदान करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रोंको नमस्कार है। जो पूर्व दिशामें रहकर सब लोकोंकी भूतोंके महान् भयसे रक्षा करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रोंको नमस्कार है। जो पश्चिम दिशामें रहकर दुरात्मा पिशाचोंके भयसे समस्त जगत्‌की रक्षा करते हैं, उन सम्पूर्ण रुद्रोंको नमस्कार है। जो ऊपरके लोकोंमें रहकर जम्भके महान् भयसे सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करते हैं, उन सब रुद्रोंको नमस्कार है। जो नीचे-ऊपर दोनों जगह रहकर सम्पूर्ण लोकोंकी कूष्माण्डोंके भयसे रक्षा करते हैं, उन सब रुद्रोंको नमस्कार है। जो सहस्रोंकी संख्यावाले अथवा असंख्य रुद्र, पृथ्वीपर रहकर रोगोंसे जगत्‌को बचाते हैं, उन सबको भी नमस्कार है।

इस प्रकार ग्यारह तपस्वियोंद्वारा स्तुति की जानेपर वे ग्यारहों रुद्र भक्तिसे नतमस्तक हुए उन तपस्वी मुनियोंसे बोले।

रुद्र बोले—श्रेष्ठ तापसो ! मैं तुम्हारी बड़ी भारी भक्ति देखकर सन्तुष्ट हूँ और ग्यारह स्वरूपोंमें प्रकट हुआ हूँ, तुम सब लोग मनोवांछित वर माँगो।

तापसोंने कहा—देव ! यदि आप हमपर सन्तुष्ट हैं, तो कृपा करके इन ग्यारह स्वरूपोंमें सदा यहीं रहें, जिससे हम आपकी आराधना करते हुए हाटकेश्वरक्षेत्रमें सदैव निवास करें।

भगवान् श्रीशिव बोले—मैंने इस क्षेत्रमें जिन ग्यारह मूर्तियोंको प्रकट किया है, इन सबके साथ यहाँ सदैव निवास करूँगा। मेरी जो आद्या मूर्ति है, वह तो कैलासपर रहती है। इस क्षेत्रमें भी जो उत्तम कैलासपर्वत है, वहाँ सदा उसकी स्थिति बनी हुई है। ये मेरी ग्यारह मूर्तियाँ सम्पूर्ण जगत्की रक्षाके लिये यहाँ सदा उपस्थित रहेंगी। तुम्हारे ही नामोंसे इन सबकी प्रसिद्धि होगी। जो मनुष्य विश्वामित्र-कुण्डमें स्नान करके मेरी इन मूर्तियोंकी पूजा करेंगे, वे परम गतिको प्राप्त होंगे। मेरे वचनसे उन्हें ग्यारहगुने पुण्यफलकी प्राप्ति होगी; इसमें संशय नहीं है।

ऐसा कहकर भगवान् त्रिलोचन वहीं अन्तर्धान हो गये। वे मुनि भी वहाँ आश्रम बनाकर बड़ी श्रद्धासे उन मूर्तियोंकी आराधना करते हुए परम पदको प्राप्त हो गये। दूसरा कोई मनुष्य भी यदि इन ग्यारह विग्रहोंका दर्शन और पूजन करेगा, वह उस परमधाममें जायगा, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं। जो मानव चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीके दिन उन सबका भक्तिपूर्वक पूजन करेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा। षडक्षर मन्त्रके द्वारा भगवान् शिवको एक फूल चढ़ानेसे जो फल मिलता है, उससे सौ गुना फल उस मनुष्यको प्राप्त होता है, जिसने शिवकी दीक्षा ली है। उसकी अपेक्षा भी सौगुना फल उसे मिलता है, जिसने भगवान् शिवकी शरण ले रखी है। जो लोग भक्ति एवं विनयपूर्वक उन विग्रहोंका पूजन करते हैं, वे पूर्वोक्त सभी लोगोंसे सौगुना पुण्यफल प्राप्त करते हैं।

ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! काशीसे आये हुए उन मुनियोंके नाम क्या थे, जिनकी भक्तिके कारण भगवान् शिव ग्यारह स्वरूपोंमें अभिव्यक्त हुए?

सूतजीने कहा—उनमेंसे प्रथमका नाम त्रिभुवन-प्रसिद्ध मृगव्याध था, दूसरेका शर्व, तीसरेका निन्दित, चौथेका महायशा, पाँचवेंका अजैकपाद, छठेका अहिर्बुध्न्य, सातवेंका पिनाकी, आठवेंका परन्तप, नवेंका दहन, दसवेंका ईश्वर तथा