संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मुनि दुर्वासाके आज्ञानुसार तिलपात्रादिके दानसे जब उसके पाप दूर हो गये, तब दुर्वासाजीने उसे निर्वाणदीक्षा दी। दीक्षा देनेके बाद मधुर वाणीमें कहा—'अब मुझे गुरुदक्षिणा दो।'
दुःशील बोला—प्रभो! आप दक्षिणामें क्या लेना चाहते हैं? शीघ्र बताइये।
दुर्वासाने कहा—देखो, इस समय कलियुग आ गया है। अब मैं कल्पग्रामको चला जाऊँगा और चैत्रमासमें जो मेरी यात्रा यहाँ होती थी, वह अब नहीं होगी। जबतक सत्ययुग नहीं आ जायगा, तबतक मैं यहाँ नहीं आऊँगा। यह मन्दिर जो मैंने बनवाना प्रारम्भ किया था, अबतक आधा ही बन पाया है, अब तुम इसे पूरा कर देना, यही मेरी गुरुदक्षिणा है। अपनी शक्तिके अनुसार यहाँ नृत्य-गीत आदि करते रहना। फूल आदि भी चढ़ाना चाहिये।
ऐसा कहकर मुनीश्वर दुर्वासा कल्पग्रामको चले गये। दुःशीलने भी जैसा दुर्वासाजीने कहा था, सब कुछ उसी प्रकार किया। इसी प्रकार भक्तिभावसे पूजन आदि करते हुए दुःशीलके ही नामपर उस शिवलिंगकी प्रसिद्धि हुई; उसकी संज्ञा 'दुःशीलेश्वर' हो गयी। जो चैत्रमासमें प्रतिदिन दुःशीलेश्वर देवका दर्शन करता है, वह क्षणभरमें वर्षभरके पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो उनको नहलाता है, उसके शरीरसे तीस वर्षका पाप नष्ट हो जाता है। जो उनके आगे नृत्य-गीत आदिका आयोजन करता है, उसके शरीरसे तीस वर्षका पाप नष्ट हो जाता है। जो उनके आगे नृत्य-गीत आदि करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
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निम्बेश्वरकी स्थापना तथा ग्यारह रुद्रोंका प्राकट्य एवं उनके दर्शन-पूजनकी महिमा
सूतजी कहते हैं—दुःशीलने दक्षिण दिशामें अपने गुरुके नामसे भी शिवालय बनवाया, जो निम्बेश्वरके नामसे विख्यात हुआ। वह बड़े भक्तिभावसे उनके चरणारविन्दोंका चिन्तन करने लगा। उसकी स्त्रीका नाम शाकम्भरी था। उसने अपने नामवाली श्रीदुर्गादेवीकी वहाँ स्थापना की। उनके पास जो शेष धन था, उसे उन दोनों पति-पत्नीने देव-पूजनके लिये ब्राह्मणोंको अर्पित कर दिया और स्वयं भिक्षान्न भोजन करने लगे। कुछ कालके अनन्तर दुःशीलकी मृत्यु हो गयी। उस समय शाकम्भरीने दृढ़चित्त होकर पतिके साथ चिताकी आगमें प्रवेश किया। फिर वे दोनों पति-पत्नी विमानमें बैठकर स्वर्गको चले गये। जो दुःशीलका यह उत्तम उपाख्यान पढ़ेगा, वह अज्ञानजनित सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा।
पूर्वकालकी बात है, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले काशीनिवासी मुनि हाटकेश्वरदेवके दर्शनके लिये उत्सुक होकर चले। उनमें परस्पर होड़ लग गयी थी कि 'पहले मैं, पहले मैं, भगवान् हाटकेश्वरका दर्शन करूँगा। जो सबके आगे वहाँ जाकर भी पहले हाटकेश्वर शिवका दर्शन नहीं कर लेगा, वह अकेला सबको कष्ट देनेके पापका भागी होगा।' ऐसा कहकर वे सब काशीपुरीसे अत्यन्त वेगपूर्वक दौड़ते हुए चले। इसी समय भगवान् हाटकेश्वर उन सब मुनियोंका स्पर्धाजनित अभिप्राय जानकर उन सबको दर्शन देनेके लिये पातालसे नागच्छिद्रके द्वारा निकले और ग्यारह स्वरूपोंमें स्थित हो गये। त्रिशूल, तीन नेत्र, जटाजूट, अर्धचन्द्र तथा मुण्डमालासे विभूषित हो, वे एक ही साथ सबकी दृष्टिमें आये। उन मुनियोंने अपने समक्ष खड़े हुए भगवान् वृषभध्वजका दर्शन करके धरतीपर घुटने टेक उन्हें प्रणाम किया और पृथक्-पृथक् उनकी स्तुति की। उनमेंसे एक जानता था,