संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १२०७
दुःशील भी सोनेकी पेटी लेकर दूसरे स्थानपर चला गया। उस सुवर्णसे वह व्यापार करने लगा। विवाह करके उसने गृहस्थी बसा ली। बुढ़ापा आ गया, परंतु उसे कोई सन्तान नहीं हुई। एक समय वह अपनी स्त्रीके साथ तीर्थयात्रा करता हुआ चमत्कारपुरमें गया। सब तीर्थोंमें स्नान और सम्पूर्ण मन्दिरोंमें घूम-घूमकर देवदर्शन करते हुए उसने एक स्थानपर दुर्वासा मुनिको देखा। वे अपने इष्टदेवके सामने भक्तिपूर्वक नृत्य और गान कर रहे थे। दुःशीलने उनको प्रणाम करके पूछा—'महर्षे ! इस निर्मल शिवलिंगकी स्थापना किसने की है? आप क्यों इसके सम्मुख नृत्य और गान करते हैं? आपका यह व्यवहार मुनियोंको शोभा नहीं देता।'
दुर्वासा बोले—देवताओंके भी आराध्यदेव शूलपाणि भगवान् शंकरके इस लिंगमय विग्रहकी स्थापना मैंने ही की है। देवदेव महेश्वरको नृत्य और गान विशेष प्रिय है। अतः मैं यही करता हूँ।
दुर्वासाका वचन सुनकर दुःशीलके मनमें महादेवजीके प्रति भक्तिभावका उदय हुआ। उसने मुनिको पुनः प्रणाम करके कहा—'भगवन् ! मैं केवल जातिसे ब्राह्मण हूँ, कर्मसे नहीं। मैंने आजतक किसीको भोजन नहीं दिया। केवल ठग-ठगकर देवताओं और ब्राह्मणोंके धनका अपहरण किया है। मैं सदा जुआ खेलने और वेश्यागमनके दुर्व्यसनमें ही फँसा रहा हूँ। जातिसे ब्राह्मण होकर भी मैंने एक शैवको गुरु बनाया। फिर अनेक प्रकारकी चिकनी-चुपड़ी बातें कहकर उन्हें धोखा दिया और उनका सारा धन चुरा लिया। मेरे वे गुरु परलोकवासी हो गये हैं। मैं पश्चात्तापकी आगमें रात-दिन जलता रहता हूँ। आप मुझे कोई प्रायश्चित्त बताकर मुझे अनुगृहीत कीजिये। मुनीश्वर! मेरे पास धन बहुत है, परंतु सन्तान एक भी नहीं है। अतः ऐसा कोई उपाय बताइये, जिससे उस धनका सदुपयोग हो, इहलोक और परलोकमें भी वह हितकारक हो सके। आप जो बतावेंगे, वह सब मैं करूँगा।'
दुर्वासाने कहा—जो पुरुष सहस्रों पाप करके पीछे धर्मपरायण होता है, वह बड़ी कठिनाईसे संसार-सागरके पार होता है। तूने कुमार्गपर चलकर महापाप किया है।
दुःशील बोला—महाभाग ! मेरे पास धन बहुत है, यदि उससे कोई धर्मकार्य सिद्ध हो सके तो बताइये, मैं सब करूँगा।
दुर्वासाने कहा—तुम्हारे पापनाशका एक ही उपाय है। सत्ययुगमें तपकी, त्रेतामें ज्ञानकी, द्वापरमें तीर्थयात्राकी और कलियुगमें दानकी ही मुनिलोग प्रशंसा करते हैं*। इस समय भयंकर कलिकाल उपस्थित है। अतः समस्त पापोंकी शुद्धिके लिये दान करो। तुम्हारे मनमें गुरुके यहाँसे धनका अपहरण करनेके कारण उस धनकी ओरसे घृणा भी है ही, अतः तुम गुरुके ही नामसे भगवान् शंकरका एक मन्दिर बनवा दो। इससे गुरुके ऋणसे भी उऋण हो जाओगे। अन्यत्र भी यदि कहीं उनका धन प्राप्त हो तो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उस धनका दान किया करो। स्वयं अपने लिये भी तिलपात्र और सुवर्णका दान करो, जिससे तुम्हारे शरीरसे सब पाप दूर हो जायँ। दूसरी बात यह है कि मैं सुदूरवर्ती कल्पग्रामसे सदा चैत्रमासमें यहाँ अपने बनवाये हुए शिवमन्दिरके दर्शन-पूजनके लिये आया करता हूँ; फिर वहीं चला जाऊँगा। यह मेरा सदाका नियम है। अतः मेरे चले जानेपर तुम्हें मेरे बनवाये हुए इस मन्दिरमें भगवान् शिवके स्नान-पूजन आदिका ध्यान रखना चाहिये।
दुःशील बोला—मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपकी सब आज्ञाका पालन करूँगा, परंतु मुझे निर्वाण-दीक्षा दीजिये।
* तपः कृते प्रशंसन्ति त्रेतायां ज्ञानमेव च। द्वापरे तीर्थयात्रां च दानमेव कलौ युगे॥ (स्क० पु०, ना० उ० २२९। ९१)