भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1235

१२०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बड़े आदरसे कहा—'प्रभो! आप मुझे शिवदीक्षा देकर अनुगृहीत कीजिये, जिससे मैं एकाग्रचित्त होकर नित्य आपकी सेवा कर सकूँ।' तब उस तापस ब्राह्मणने मनमें विचार किया—'यह कोई चतुर मनुष्य दिखायी देता है, दूसरा कोई ऐसा शिष्य नहीं आवेगा। इसलिये मैं इसे शिष्य बनाये लेता हूँ।' ऐसा निश्चय करके निम्बशुचने उसका हाथ पकड़कर कहा—'वत्स! यदि ऐसी बात है तो मेरे साथ कुछ प्रतिज्ञा या शपथ करो, जिससे मैं तुम्हें आज ही दीक्षा दे दूँ। तुम्हें इस मठसे बहुत दूर अपनी कुटी बनानी होगी। सूर्यास्त हो जानेपर तुम्हें कदापि इस मठमें प्रवेश नहीं करना चाहिये।'

दुःशीलने कहा—गुरुदेव! मेरे लिये तो आपका आदेश ही प्रमाण है। जो शिष्य गुरुकी आज्ञाका पालन नहीं करता, उसका वह व्रत व्यर्थ हो जाता है और फिर उसे नरककी प्राप्ति होती है।

दुःशीलका यह वचन सुनकर निम्बशुचको सन्तोष हो गया। तब उन्होंने उसे शिवमन्त्रकी दीक्षा दी—पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश किया। तबसे दुःशील उनकी सेवामें अत्यन्त तत्पर रहने लगा। अपनी सेवाओंसें उसने तापसके चित्तको प्रसन्न कर लिया था। वह प्रतिदिन मन-ही-मन सुवर्णकी वह पेटी हथिया लेनेकी बात सोचता था, किंतु किसी दिन मौका नहीं पाता था। तब उसने विचार किया—'क्या इसे विष दे दूँ, अथवा हथियारसे मार डालूँ या गला दबाकर इसके प्राण ले लूँ?' ऐसी ही बातें वह प्रतिदिन सोचता रहा। इतनेमें ही वर्षाका समय उपस्थित हुआ। श्रावणके कृष्णपक्षमें जब सूर्यदेव कर्कराशिपर स्थित थे, कोई धनी शिवभक्त वहाँ आया और उसने प्रणाम करके कहा—'स्वामिन्! आपकी आज्ञा हो तो मैं आगामी चतुर्दशीके दिन आपका सत्कार करना चाहता हूँ। यदि आप मेरे गाँवमें पधारनेका कष्ट करें, तो बड़ी कृपा हो।'

यह सुनकर निम्बशुच मुनि बहुत सन्तुष्ट हुए और बोले—'बहुत अच्छा, मैं नियत समयपर अपने शिष्यके साथ तुम्हारे यहाँ आऊँगा।' ऐसा कहकर उसे विदा कर दिया। जब वह समय आया, तब सबेरे ही निम्बशुच मुनि दुःशीलके साथ प्रस्थित हुए। मार्गमें मुरला नामवाली सागरगामिनी नदी मिली। उसे देखकर उन्होंने दुःशीलसे कहा—'वत्स! मैं मुरलामें तुम्हारे साथ देवपूजा करूँगा। थोड़ी देर यहीं ठहरो।' 'जो आज्ञा' कहकर दुःशील नदीके शुभ तटपर खड़ा रहा। निम्बशुच दुःशीलके गुणोंसे सर्वदा सन्तुष्ट रहते थे। उसे एक अच्छा शिष्य जानकर उनके मनमें उसके प्रति विश्वास हो गया था। उन्होंने छिपायी हुई सोनेकी पेटी और यागेश्वरकी मूर्तिके साथ अपनी गुदड़ी उतारकर धरतीपर रख दी और स्वयं थोड़ी दूरपर मलत्याग करनेके लिये चले गये। वे ज्यों ही बेतके वृक्षोंकी ओटमें पहुँचे, त्यों ही दुःशील उनकी सोनेकी पेटी लेकर प्रसन्नचित्त हो शीघ्रतापूर्वक उत्तर दिशाकी ओर चल दिया। निम्बशुच जब मैदान होकर लौटे, तब दुःशील नहीं दिखायी दिया। केवल यागेश्वरसहित गुदड़ी वहीं पड़ी हुई थी। ब्राह्मणका मन खिन्न हो गया। वे जल्दी-जल्दी हाथ-पैर धोकर कुल्ला किये बिना ही उस स्थानपर आये, जहाँ गुदड़ी रखी थी। देखा, तो वहाँ सोनेकी पेटी नहीं थी। फिर यह जानकर कि वही शिष्य उसे चुरा ले गया, वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। चेत होनेपर वहाँसे वे बड़े कष्टसे उठे और पत्थरपर अपना सिर पटकने लगे। फिर विलाप करते हुए बोले—'हाय! हाय! उस दुष्ट दुरात्माने मुझे मार डाला। मैं नष्ट हो गया। उसने मुझे लूट लिया। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? कैसे उसे देख पाऊँ?' तदनन्तर उसके पैरोंकी निशानी देखते हुए निम्बशुच मुनि उसका पीछा करने लगे। किंतु एक तो वे बूढ़े थे, दूसरे, रोगोंनें भी उन्हें और थका दिया था; इसलिये निराश होकर अपने मठपर लौट गये।