संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1234, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १२०५
देवाधिदेव भगवान् शंकरका एक लिंगमय विग्रह है। जो मनुष्य चैत्रमासमें तीनों समय अथवा एक क्षण भी नृत्य, गीत और वाद्यके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना करता है, वह अवश्य ही उनकी कृपासे गन्धर्वोंका अधिपति होता है।
प्राचीन कालमें वैदिश नामक उत्तम नगरमें निम्बशुच नामवाले एक ब्राह्मण रहते थे। वे किसी मठके अध्यक्ष थे और प्रतिदिन शिवलिंगका पूजन किया करते थे। शिवभक्तोंसे उन्हें जो कुछ भी वस्त्र आदि वस्तुएँ प्राप्त होती थीं, उन सबको वे बेच डालते और उनके मूल्यसे सोना खरीद लेते थे। उसमेंसे थोड़ा भी खर्च नहीं करते थे। केवल संग्रह ही करते रहते थे। इससे दीर्घकालके पश्चात् उनकी छोटी-सी पेटी सुवर्णसे भर गयी। निम्बशुच बड़े कृपण थे। घड़ीभरके लिये भी उस सुवर्णकी पेटीको अलग नहीं रखते। सदा अपनी काँखमें ही दबाये रहते थे। देवताकी पूजा करते समय भी उसे नहीं छोड़ते; कभी किसीपर उन्हें विश्वास नहीं होता था।
एक समय दूसरोंका धन हड़प लेनेमें कुशल दुःशील नामक एक खोटी बुद्धिवाले ब्राह्मणने पुजारीजीकी गतिविधिको ताड़ लिया और मन-ही-मन सोचा—'इस दुरात्माको विश्वास दिलानेके लिये मैं इसका शिष्य बनूँगा। चिकनी-चुपड़ी बातें बनाकर दिन-रात इसकी सेवा-टहलमें लगा रहूँगा और कभी मौका पाकर निःसन्देह अपना काम बना लूँगा।' ऐसा निश्चय करके दूसरे दिन वह उनके समीप गया। वे बहुत लोगोंके बीचमें बैठे हुए थे। उसने विनयपूर्वक प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा—'भगवन् ! मैंने आपकी तपस्याका अद्भुत प्रभाव सुना है। इस पृथ्वीपर आपके समान दूसरा कोई महात्मा नहीं है। इसीलिये मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ। संसारकी असारता जानकर मेरे मनमें बड़ा वैराग्य हुआ है। इस लोकमें मनुष्योंका यौवन बिजलीकी चमकके समान सहसा विलुप्त हो जानेवाला है। जैसे पर्वतसे निकली हुई नदी क्षणभंगुर होती है, उसी प्रकार स्त्री-पुत्र, बन्धु-बान्धव आदि सब अनित्य हैं। नदी प्रवाहरूपसे ही सत्य प्रतीत होती है, वास्तवमें उसका जल क्षण-क्षणमें परिवर्तित होता रहता है। उसी प्रकार समस्त संसार परिवर्तनशील है। भाई-बन्धु आदि सगे-सम्बन्धियोंका संयोग भी पाप-समागमके ही तुल्य जानने योग्य है। अतः सुव्रत ! इस संसार-समुद्रसे पार होनेके लिये मुझे ऐसे किसी उपायका उपदेश दीजिये, जो मेरे लिये नौकाके समान पार लगानेवाला हो। जिसका आश्रय लेकर मैं आपकी कृपासे इस भवसागरसे पार हो जाऊँ।'
उसकी यह बात सुनकर पुजारीजीके शरीरमें हर्षके मारे रोमांच हो आया। सोचने लगे—'यह कौन शिवभक्त पुरुष परदेशसे यहाँ आया है?' फिर बोले—'तुम धन्य हो, जिसकी बुद्धि तरुणावस्थामें भी ऐसी वैराग्यपूर्ण है। जो पहली अवस्था (तरुणाई)-में शान्त है (मन और इन्द्रियोंको जीत चुका है), वही शान्त है—ऐसा मेरा विचार है। शरीरके सब धातुओंके क्षीण हो जानेपर कौन शान्त नहीं होता ? यदि तुम्हारे मनमें संसारकी ओरसे इतनी विरक्ति है, तो देवताओंके स्वामी और परम कल्याणकारी भगवान् चन्द्रशेखरकी आराधना करो। अन्यथा घोर जपसे भी भवसागरको पार करना असम्भव है। यह बात मैंने शास्त्रोंका भलीभाँति मनन करके जानी है। शूद्र हो या ब्राह्मण, म्लेच्छ हो या और कोई पापात्मा; जो मनुष्य शिवकी दीक्षा लेकर षडक्षरमन्त्रसे भक्तिपूर्वक एक फूल भी शिवलिंगपर चढ़ा देता है, वह उसी गतिको प्राप्त होता है, जिसे बड़े-बड़े यज्ञकर्ता पाते हैं। जो शिवदीक्षा लिये हुए पुरुषोंको भक्तिभावसे वस्त्र, उपानह और जलपात्र आदि समर्पण करता है, उसे बहुतेरे यज्ञोंसे क्या काम है ?'
यह सुनकर दुःशीलने निम्बशुचके चरण पकड़ लिये और उनपर अपना मस्तक रखकर