संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1233, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२०४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
ये त्वां वाञ्छन्ति ते भूयस्त्वां लभन्ते न संशयः।
इह लोके परे चैव पार्थिवं रूपमाश्रिता ॥
‘पृथ्वी देवि! आप इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती हैं। मैं आपका दान करूँगा, आप मेरे समीप पधारें। देवि वसुन्धरे! समस्त प्राणियोंके शरीरोंमें भी प्रधानतया आपकी स्थिति है। उसके बाद जल आदि दूसरे भूत स्थित हैं। जो आपको चाहते हैं, वे पाते हैं, इसमें संशय नहीं है। इहलोक और परलोकमें सर्वत्र आप पार्थिव रूप धारण करके स्थित हैं।’
इस प्रकार सुवर्णमयी धरादेवीका स्तवन करके उसे जलसहित हाथमें ले और भगवान् वासुदेवका मन-ही-मन ध्यान करते हुए इस मन्त्रद्वारा संकल्प करे—
पातालादुद्धृता येन पृथ्वी सा लोककारिणा।
अस्या दानेन च सदा प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
‘जिन लोकस्रष्टा भगवान्ने वाराहरूप धारणकर पातालसे इस पृथ्वीका उद्धार किया था, वे ही जनार्दन इस स्वर्णमयी भूमिके दानसे मुझपर सदा सन्तुष्ट रहें।’
ऐसा कहकर उस जलको जलमें ही गिरावे। न तो भूमिपर उसे गिराना चाहिये और न ब्राह्मणके हाथमें ही देना चाहिये। तदनन्तर पृथ्वीदेवीका इस प्रकार विसर्जन करे—
आगता च यथान्यायं पूजिता च यथाविधि।
अस्माकं त्वं हितार्थाय यत्रेष्टं तत्र गम्यताम्॥
‘देवि! तुम हमारे हितके लिये यहाँ आयीं, न्यायोचित ढंगसे विधिपूर्वक तुम्हारी पूजा की गयी। अब हमारे हितके लिये ही तुम अभीष्ट स्थानको पधारो।’
‘उस्रा वेद’ इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके उस स्वर्णमयी भू-प्रतिमाको वेदीपरसे उतारे और ब्राह्मणको बाँट दे। जो राजा इस विधिसे भूमिदान करता है, उसके वंशमें भी कभी किसीका राज्य भ्रष्ट नहीं होता है। यह पृथ्वीदान सब दानोंसे उत्तम, पुण्यजनक एवं प्रशंसनीय है। जो इसकी महिमा सुनते हैं, उनकी भी समस्त जड़ताका यह विनाश करनेवाला है। इस प्रकार भूमिदान करनेवाले लोग अकण्टक राज्यका उपभोग करके प्रसन्नचित्त हो भगवान् विष्णुके अविनाशी सनातन पदको प्राप्त होते हैं। अन्यत्र किया हुआ भूमिदान भी एक जन्मतक अवश्य चक्रवर्ती बनाता है, परंतु जो भगवान् गौतमेश्वरके आगे भूमिदान किया जाता है, वह सात जन्मोंतक मनुष्यको चक्रवर्ती राजा बनाता है, इसमें संदेह नहीं है। अतः सब प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक वहाँ भूमिदान करना चाहिये।
चार प्रकारके कालमानका वर्णन, दुःशील नामक ब्राह्मणका चरित्र तथा दुःशीलेश्वरकी महिमा
सूतजी कहते हैं— ब्राह्मणो! भूमण्डलमें सबका समय सौर, सावन, चान्द्र तथा नाक्षत्र— इन चार प्रकारके मानोंसे व्यतीत होता है। सौरमानसे तीन सौ पैंसठ दिनोंका एक वर्ष होता है। सावनमानसे तीन सौ साठ दिनोंका, चान्द्रमानसे तीन सौ चौवन दिनोंका और नाक्षत्रमानसे तीन सौ पैंतीस दिनोंका वर्ष होता है। सर्दी, गरमी और वर्षा सौरमानसे होती है। अग्निष्टोम आदि यज्ञ, उत्सव और विवाह— ये सावनमानसे किये जाते हैं। व्याज आदि व्यवहार मलमासयुक्त चान्द्रमानसे होता है। नाक्षत्रमानसे ग्रहोंकी चाल होती है। पृथ्वीपर इन चारोंके सिवा दूसरा कोई मान नहीं है। इसी मानसे देवता, दैत्य और मनुष्य सबका व्यवहार चलता है। जो मनुष्य हाटकेश्वरक्षेत्रके सप्त शिवलिंगोंके आगे इस प्रसंगका भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, उनकी किसी प्रकार भी अपमृत्यु नहीं होती है।
हाटकेश्वरक्षेत्रमें महर्षि दुर्वासाद्वारा स्थापित