भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1232
  • नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १२०३

देता है। जो शारीरिक क्लेशसे डरनेवाले हैं, ऐसे धनियोंके लिये यह तुलादान पुरश्चरणके समान है। राजन्! राजा दिलीप, कार्तवीर्य अर्जुन, पृथु, पुरुकुत्स तथा अन्यान्य राजाओंने भी यह तुलादान किया है। तुलापुरुषका दान पुण्यजनक, परम उत्तम, मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको देनेवाला तथा सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश करनेवाला है। जो भगवान् सिद्धेश्वरके आगे तुलापुरुषका दान देता है, उसे सहस्रगुने फलकी प्राप्ति होती है। अतः सब प्रकारसे प्रयत्न करके भगवान् सिद्धेश्वरके पास पहुँचकर विवेकी पुरुषको तुलापुरुषका दान करना चाहिये। भगवान् सिद्धेश्वरका दर्शन, स्पर्श और पूजन करनेपर मानव सब शिवलिंगोंके दर्शनका फल पा लेता है।


पृथ्वीदानकी महिमा

भर्तृयज्ञ कहते हैं—जो राजा श्रद्धापूर्वक भगवान् गौतमेश्वरके आगे सुवर्णमयी पृथ्वीका दान करता है, वह निश्चय ही चक्रवर्ती राजा होता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। मान्धाता, धुन्धुमार, हरिश्चन्द्र, पुरूरवा, भरत और कार्तवीर्य—ये छः चक्रवर्ती राजा हुए हैं। पूर्वकालमें भगवान् गौतमेश्वरके समीप स्वर्णमयी पृथ्वीका दान करनेसे ही इन्हें सार्वभौम राज्य प्राप्त हुआ था।

आनर्तने पूछा—भगवन्! किस विधिसे स्वर्णमयी भूमिका दान करना चाहिये? मैं उसका दान करूँगा। इसके लिये मेरी बड़ी श्रद्धा है।

भर्तृयज्ञने कहा—नृपश्रेष्ठ! सौ भर सोनेकी पृथ्वी बनानी चाहिये। अथवा शक्तिके अनुसार पचास भर या पचीस भर सोनेकी ही पृथ्वीका निर्माण करावे। अधिक न हो तो किसी प्रकार भी पाँच भरसे कमकी पृथ्वी तो देनी ही नहीं चाहिये। उसमें लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दही, दूध तथा जलके सात समुद्र और जम्बू, प्लक्ष, कुश, क्रौंच, शाक, शाल्मलि एवं पुष्कर—ये सात द्वीप क्रमशः एकसे दूसरे दूने बड़े बनाने चाहिये। महेन्द्र, मलय, सह्य, हिमवान्, गन्धमादन, विन्ध्य तथा शृंगी—इन सातों कुलपर्वतोंको भी अंकित करे। मध्यभागमें मेरुको और उसके चारों ओर विष्कम्भ पर्वतोंका भी उल्लेख करावे। जम्बू, न्यग्रोध (वट), नीप (कदम्ब) तथा प्लक्ष (पाकड़) आदि वृक्षों तथा गंगा आदि नदियोंका भी उस स्वर्णमयी भूमिमें मुख्यतः अंकन करे। इस प्रकार सुवर्णमयी पृथ्वीका पूर्णतः निर्माण कराकर फिर पहले बताये अनुसार मण्डप, कुण्ड और तोरण आदि बनावे। ब्राह्मणोंका पूजन करे। पूर्ववत् सब कुछ करके मध्यभागमें वेदीका निर्माण करे। उस वेदीपर हेममयी पृथ्वीको स्थापित करे और यथोक्त मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उसे पंचगव्यसे नहलावे। इसके बाद 'इमं मे गङ्गे यमुने०,' 'पञ्चनद्यः सरस्वती०' 'त्रिपुष्करम्०' श्रीसूक्त, पावमानी ऋचा, स्वर्णघर्मानुवाक तथा स्नान-कर्मोपयोगी अन्यान्य मन्त्रोंके पाठपूर्वक उस स्वर्णप्रतिमाका अभिषेक करे। इस प्रकार विधिपूर्वक स्नान कराकर 'युवा सुवासा' इत्यादि मन्त्रसे नाना प्रकारके सूक्ष्म वस्त्र पहनावे। 'ये भूतानामधी०' इत्यादि मन्त्रोंका उच्च स्वरसे उच्चारण करके पूजन करे। फिर 'धूरसि' इत्यादि मन्त्रसे धूप निवेदन करके 'अग्निर्ज्योतिः' इत्यादि मन्त्रद्वारा आरती उतारे। 'अन्नमस्मि' इस मन्त्रसे सप्तधान्य निवेदन करे। इस प्रकार उस हेममयी पृथ्वीका सब पूजन विधिपूर्वक सम्पन्न करके सामने खड़ा हो जाय और हाथ जोड़कर निम्नांकित मन्त्रोंका उच्चारण करे—

त्वया सन्धार्यते देवि जगदेतच्चराचरम्।
तव दानं करिष्यामि सान्निध्यं कुरु मेदिनि॥
शरीरेष्वपि भूतानां त्वं देवि प्रथमं स्थिता।
ततश्चान्यानि भूतानि जलादीनि वसुन्धरे॥