भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1214

* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १९८५


कत्थेमें निवास करना।' इस प्रकार धनवानोंके यहाँ छिद्र उत्पन्न करनेके लिये दरिद्रताको ये चार स्थान दिये गये हैं*। राजन्! राजा दम्भने न जाननेके कारण उन सब दोषोंसे युक्त पान खा लिये थे, इसीलिये उन्हें सहसा ऐश्वर्यसे हाथ धोना पड़ा था।

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विश्वामित्रतीर्थ एवं रत्नादित्यकी महिमा, धन्वन्तरि आदिकी कुष्ठरोगसे मुक्ति

ऋषि बोले—हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो तीन पुण्य-दायक क्षेत्र हैं, उनका वर्णन हमने सुना, अब हम विश्वामित्रजीके तीर्थका माहात्म्य सुनना चाहते हैं।

सूतजीने कहा—विप्रवरो! विश्वामित्रजीके गुणोंका पार नहीं है। वे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न होकर भी अपनी तपस्याके प्रभावसे ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये। राजा त्रिशंकु अन्त्यजभावको प्राप्त थे, तो भी उनके यज्ञमें उन्होंने प्रत्यक्ष यज्ञभागभोगी देवताओंका निर्माण किया। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके साथ स्पर्धा करके विश्वामित्रजीने नूतन सृष्टि रचना प्रारम्भ की थी। उस समय देवताओंने उनके चरणोंपर गिरकर उन्हें इस कार्यसे विरत किया था। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! महात्मा विश्वामित्रने हाटकेश्वरक्षेत्रमें बिना किसी शस्त्रके केवल अपने हाथसे कुण्ड-निर्माण किया था, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। उसके भीतर ध्यान करके उन्होंने पातालगंगाको बुलाया, उनका निर्मल जल पातालसे मर्त्यलोकमें प्रकट हुआ है, जो परम स्वादिष्ट तथा स्नान करनेसे सब पातकोंका नाश करनेवाला है। उन्होंने वहाँ भगवान् सूर्यदेवको भी स्थापित किया है। जो मनुष्य सप्तमी एवं रविवारके संयोगमें माघमासके शुक्ल पक्षमें सूर्योदयके समय उस शुभ कुण्डमें स्नान करता है, वह समस्त कुष्ठ रोगों और पापोंसे मुक्त होता है। उस कुण्डके पश्चिम और उत्तर कोणमें धन्वन्तरिद्वारा निर्मित एक वापी है, जो महान् जलराशिसे परिपूर्ण है। वह सब रोगोंका नाश करनेवाली है। पूर्वकालमें वहाँ उदारबुद्धि धन्वन्तरिजीने एकाग्रतापूर्वक सूर्यदेवका ध्यान करते हुए तपस्या की। दीर्घकालके पश्चात् भगवान् सूर्य उनपर सन्तुष्ट हुए और बोले—'वर माँगो।'

धन्वन्तरिने कहा—प्रभो! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कुण्डमें स्नान करे, उसके सब रोगोंका नाश हो जाय।

श्रीभगवान् बोले—आजके उत्तम दिन रविवार एवं सप्तमीके शुभ योगमें जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो सूर्योदय कालमें स्नान करेगा, उसके सब रोग नष्ट हो जायेंगे।

ऐसा कहकर सुरश्रेष्ठ सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। ब्राह्मणो! एक समय पूर्वकर्मोंके फलस्वरूप राजा धन्वन्तरिको कोढ़का रोग हुआ, जिसकी चिकित्सा तीनों लोकोंमें असम्भव हो गयी। संसारमें कोई ऐसी दवा नहीं थी, जो उन्होंने न की हो। कोई दान नहीं, जो उन्होंने न दिया हो। वे ज्यों-ज्यों दवा करते और दान देते थे, त्यों-त्यों रोग बढ़ता ही जाता था और उससे उनका शरीर अत्यन्त दुर्बल होता जाता था। तब उन्हें इस जीवनसे वैराग्य हो गया और उन्होंने पुत्रको राज्यपर बिठाकर अग्निमें प्रवेश कर जानेकी इच्छा की। ब्राह्मणोंको दान देकर देवताओंका पूजन किया, फिर मित्रों एवं हितैषियोंसे मिल-


* इस प्रसंगसे जान पड़ता है, पान न खाना सर्वोत्तम है। दोषसे बचकर खाना हो तो, पानमें सुर्ती तो कभी डाले ही नहीं, क्योंकि उसमें सदा दारिद्रयका वास है। देखा भी जाता है गरीब लोग ही अधिक सुर्ती खानेवाले हैं। रातमें भी पान न खाये, क्योंकि कत्थेमें उस समय दरिद्रताका वास है। पानके पत्तेका अग्रभाग और डंठल तोड़कर केवल दिनमें बिना सुर्तीका पान देवताको अर्पण करके खानेमें दोष नहीं है। शायद इसीसे पानका डंठल और अगला भाग तोड़नेकी प्रथा है।