संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करता है, वह सब प्रकारके कुष्ठरोगोंसे मुक्त हो सूर्यके समान तेजस्वी हो जाता है। जो जिस-जिस कामनाका चिन्तन करके उस तीर्थमें स्नान और शंखेश्वरका दर्शन करता है, वह अत्यन्त दुर्लभ मनोरथको भी प्राप्त कर लेता है। क्या स्वदेशमें निवास करते समय तुमने उस तीर्थका माहात्म्य नहीं सुना था, जो यहाँ आये हो? नृपश्रेष्ठ! वहीं जाकर विधिपूर्वक स्नान करके भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करो।
विश्वामित्रजी कहते हैं—देवर्षि नारदजीकी बात सुनकर राजा सिद्धसेन (दम्भ) वैशाख शुक्ला अष्टमी एवं रविवारका उत्तम योग आनेपर शंखतीर्थमें गये और सूर्योदयके समय उसमें स्नान करके ज्यों ही सूर्यदेवका पूजन करने लगे, उसी समय कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये। तब दिव्य शरीर पाकर उनके मनमें बड़ा सन्तोष हुआ। तदनन्तर उनसे पूर्वकालमें जो एक भूल हुई थी उसका प्रायश्चित्त किया। भूल यह हुई थी कि उन्होंने किसी समय चूर्णपत्र (सूरती)-के साथ ताम्बूल पान भक्षण कर लिया था, उसीका यह फल था कि उनपर कष्टपूर्ण दशा आयी थी। प्रायश्चित्त करनेपर वे उत्तम लक्ष्मीको प्राप्त हुए और पहलेकी ही भाँति पिता-पितामहोंके राज्यका शासन करने लगे।
यह सुनकर आनर्तनरेशको बड़ा आश्चर्य हुआ। तब विश्वामित्रजीने उनसे कहा—तुम्हारे मनमें यह जाननेकी उत्सुकता है कि चूर्णपत्र (सुर्ती) खानेसे दोष क्यों होता है, सो मैं तुम्हें बताता हूँ। प्राचीन कालकी बात है, देवताओंने समुद्रसे मन्थनद्वारा अमृत प्राप्त करके उसे नन्दनवनमें रखा। वहीं ऐरावत हाथीके बाँधनेका खम्भा भी था। नागराज ऐरावत रात-दिन उस अमृतकी दिव्य सुगन्ध लेता रहता था। एक समय उस अमृत-कलशसे एक लता प्रकट हुई और वह फैलती हुई नागराज ऐरावतके आलान (बाँधनेके खम्भे) पर चढ़ गयी। देवता लोग उस अपूर्व सुगन्धित लताके पत्र तोड़कर मुखशुद्धिके लिये खाते थे और खाकर बड़े प्रसन्न होते थे। तदनन्तर धन्वन्तरि वैद्यने उसे देखकर कहा—'यह नाग (हाथी)-के आलानपर फैली है, इसलिये नागवल्लीके नामसे प्रसिद्ध होगी और मेरे वचनसे यह सदा कामदेवका स्थान (उद्दीपन करनेवाली) होगी।' तत्पश्चात् उन्होंने उसके साथ सुपारी, चूना और कत्थेका संयोग करके उसके द्वारा इन्द्रदेवताको तृप्त किया।
तब इन्द्रने कहा—राजन्! वर माँगो।
धन्वन्तरिने कहा—यह नागवल्ली कृपा करके मुझे भी दीजिये, मर्त्यलोकमें इसका प्रचार हो।
'तथास्तु' कहकर इन्द्रने नागवल्ली (पानकी बेल) उन्हें दे दी। राजाने अपने नगरमें जाकर उसे उद्यानमें आरोपित किया। तदनन्तर शीघ्र ही उसका सब ओर प्रचार हो गया। उसे खा-खाकर मनुष्य काम-भोगमें आसक्त हो गये। कोई भी यज्ञ आदि सत्कर्म न तो करता था और न कराता ही था। समस्त धार्मिक क्रियाएँ लुप्त हो गयीं। देववृन्द यज्ञभागसे वंचित हो गये और क्षुधासे पीड़ित हो ब्रह्माजीके समीप जाकर बोले—'सुरश्रेष्ठ! मर्त्यलोकमें समस्त धर्मकार्य बंद हो गये। सारा जगत् ताम्बूल भक्षण करके कामासक्त होता जा रहा है। अतः हमलोगोंपर कृपा कीजिये, जिससे हमारा यज्ञकार्य नष्ट न होने पावे।'
इसी समय ब्रह्माजी यज्ञके लिये पुष्करतीर्थमें आये। उस समय दारिद्र्यने उनके पास जा प्रणाम करके विनयपूर्वक कहा—'देव! मैं तो ब्राह्मणोंके घरमें रहकर उपवास करते-करते ऊब गया हूँ, अब कोई धनवानोंका अच्छा-सा घर मेरे रहनेके लिये बताइये, जहाँ खूब पेट भरकर भोजन मिले और सदा तृप्ति बनी रहे।'
उसका वचन सुनकर ब्रह्माजीने देरतक सोच-विचारकर कहा—'दारिद्र्य! तुम्हें चूर्णपत्र (सुर्ती)-में सदा निवास करना चाहिये। ताम्बूलके पत्तेके अग्रभागमें पत्नीके साथ रहो तथा वृन्तमें पुत्रके साथ निवास करो। रात होनेपर तुम तीनों