भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1212, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1212
  • नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११८४

और हाथ जोड़ दीन भावसे उनके आगे बैठकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! मैं सब ओरसे शत्रुओं द्वारा सताया गया, अतः राज्य छोड़कर रैवतक पर्वतपर चला आया। वनमें आनेपर भी मुझे शान्ति नहीं मिली। पापी लुटेरोंने सब ओरसे मुझे पीड़ा दी और मेरे पास जो कुछ भी हाथी, घोड़े, रथ, खजाना आदि वस्तुएँ तथा स्त्रियाँ थीं, उन सबको लूट लिया। इन सब कष्टोंके कारण मेरे मनमें इस जीवनसे वैराग्य हो गया है। मुने! दूसरे जन्मोंमें मैंने कौन-सा ऐसा भयंकर पाप किया है, जिससे सहसा मुझे इस दुर्दशाकी प्राप्ति हुई है?'

उसका वह वचन सुनकर मुनिवर नारदजीने दिव्य दृष्टिसे सब वृत्तान्त जान लिया और इस प्रकार कहा—महाराज! पूर्व शरीरमें तुमने कोई कुकर्म नहीं किया है। मैंने दिव्य दृष्टिसे तुम्हारे पूर्व-जन्मक सब हाल जान लिया है।

दम्भ बोले—प्रभो! यदि पूर्वजन्ममें मैंने पाप नहीं किया है, तो इस जन्ममें कोई पाप किया हो, यह याद नहीं आता। फिर क्या कारण है कि सहसा मेरा राज्य छिन गया। इस समय मुझे इस बातका भलीभाँति अनुभव हो गया है कि संसारमें धन-वैभवसे रहित मनुष्यका जीवन व्यर्थ हो जाता है। जिसकी लक्ष्मी चली गयी, वह मनुष्य मानो मर गया। जहाँ कोई राजा नहीं है, वह राज्य भी मरे हुएके ही समान है। जो दान वेदके विद्वान्को नहीं दिया गया है, वह नष्टप्राय है तथा जिसमें दक्षिणा नहीं दी गयी हो, वह यज्ञ भी नष्ट ही है। जब मनुष्यका धन नष्ट हो जाता है, तब उसके भाई-बन्धु भी पराये हो जाते हैं। 'कहीं यह मुझसे द्रव्य न माँगने लगें' इस भयसे उसे देखकर दूसरी ओर मुड़ जाते हैं। जैसे इस समय लोग मुझे देखकर मुँह मोड़ लेते हैं। ब्रह्मन्! जिन्हें मैंने भलीभाँति धन देकर तृप्त किया है, वे भी मुझे देखकर बहुत दूर खिसक जाते हैं कि यह मुझसे कुछ माँग न बैठे। जैसे पक्षी सूखे वृक्षको छोड़कर चल देते हैं, उसी प्रकार निर्धन अवस्थामें उत्तम प्रकृतिके कुलीन एवं उत्तम मनुष्यको भी देखकर स्वजन भी दूसरी ओर चले जाते हैं। दरिद्र मनुष्य उस धनीका ही कार्य करनेके लिये उसके घर आता हो तो भी धनीलोग उसे फटकार देते हैं और उसके पास नहीं जाते। परंतु दूसरा धनाढ्य मनुष्य उसके समीप कुछ माँगनेके लिये आता हो, तो भी मनुष्यके चित्तमें यही भाव पैदा होता है कि 'यह मुझे कुछ देगा।' इस संसारमें धनियोंके आगे खड़े होकर लोग प्रायः यह कहते हैं कि 'हम और आप तो पहलेसे ही एक कुलके हैं, आपके पिताजी मेरे पितापर सदा ही बड़ा स्नेह रखते थे।' कुलीन मनुष्य भी धनके लोभसे पापियोंके यहाँ उपस्थित देखे जाते हैं। ये काम और क्रोध दो प्रकारके मनुष्योंके लिये अत्यन्त कड़वे और तीक्ष्ण दोष हैं, तथा शरीरके शत्रु हैं—एक तो उस मनुष्यके लिये जो निर्धन होकर भी कामना करता है और दूसरे उसके लिये जो असमर्थ होकर भी क्रोध करता है। धनके लोभी मनुष्य रातमें श्मशानका भी सेवन करते हैं और पिताको भी छोड़कर बहुत दूर चले जाते हैं। जिसके घरमें धन है, वह अत्यन्त मूर्ख हो तो भी विद्वान् माना जाता है, कुलीन न हो तो भी उत्तम कुलमें उत्पन्न कहा जाता है। इसके विपरीत धन न रहनेपर कुलीन भी अकुलीन और विद्वान् भी मूर्ख माना जाता है। इसलिये मुनिश्रेष्ठ! मुझे इस जीवनसे वैराग्य हो गया है। मैं दरिद्र हूँ, कोढ़ी हूँ और शत्रुओंसे अपमानित भी हो चुका हूँ, यदि कोई पूर्वपाप नहीं है, तो यह सब कष्ट मुझे किस कारणसे प्राप्त हुआ है? यह बताइये।

राजाका यह वचन सुनकर नारदजीने बहुत देरतक सोच-विचारकर कहा—राजन्! मैं तुम्हें पुनः राज्यकी प्राप्ति एवं आरोग्यका उपाय बताता हूँ। तुम्हारे राज्यमें अति सुन्दर हाटकेश्वर नामक पुण्यमय तीर्थ है, जहाँ सब पातकोंका नाशक शंखतीर्थ बहुत प्रसिद्ध है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक वैशाखमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको रविवारके दिन सूर्योदयके समय उसमें स्नान

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