भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1211

११८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

यह सुनकर शतानन्दने कहा—यदि ऐसी बात है तो मुझे पिताके पास लौटकरं नहीं जाना है। ऐसा कहकर उन्होंने भी शिवलिंगकी स्थापना की और छः-छः दिनोंपर भोजन करते हुए व्रतचर्यामें लग गये। उनका भी बहुत समय बीत गया। परंतु उन दोनोंपर भगवान् शिव सन्तुष्ट नहीं हुए। तदनन्तर दीर्घकालके बाद महामुनि गौतमजी भी पुत्रको देखनेकी इच्छासे वहाँ आ गये। पत्नी और पुत्रको तपस्या करते देख पहले तो वे बड़े प्रसन्न हुए। फिर दुःखी होकर बोले—'अहो! मेरा बेटा बहुत दुर्बल हो गया, अब इसे तपस्यासे निवृत्त करके ले चलूँ।' उनकी बात सुनकर शतानन्दजीने कहा—'तात! मैंने माताजीको तपस्या छोड़कर घर लौटनेके लिये कहा; परंतु ये हाटकेश्वरका दर्शन किये बिना घर लौटनेको राजी नहीं हुईं। अतः मैं भी माताके बिना नहीं लौटूँगा, यह मेरा निश्चय है।'

गौतमजीने कहा—बेटा! यदि तुम्हारा और तुम्हारी माताका यही निश्चय है तो मैं भी तपस्या करता हूँ। मैं अपने तपसे तुम्हारी माँको हाटकेश्वरका दर्शन कराऊँगा।

ऐसा कहकर वे भी तपस्यामें लग गये। सौ वर्षोंतक एक दिनका अन्तर देकर भोजन करते रहे, तदनन्तर छः-छः दिनपर भोजन करने लगे। फिर उतने-उतने ही समयतक क्रमशः फल और जलपर रहे। इसके बाद सौ वर्षोंतक वे केवल वायु पीकर रहे। तब पृथ्वी फोड़कर बारह सूर्योंके समान तेजस्वी शिवलिंग प्रकट हुआ। इसी समय भगवान् चन्द्रशेखरने मुनि गौतमको प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'सुव्रत! मैं तुम्हारी तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ। महामुने! यही मेरा हाटकेश्वर लिंग है, जो तुम्हारी भक्ति देखकर पातालसे प्रकट हुआ है। इसीके दर्शनके लिये तुमने पुत्र और पत्नीसहित यहाँ तप किया है। तुम सब लोगोंका मनोरथ सफल हुआ। अब तुम्हारी देवरूपिणी पत्नी इस हाटकेश्वरलिंगका दर्शन करें; जिससे इन्हें अड़सठ क्षेत्रोंकी यात्राका फल प्राप्त हो। तुम भी कोई अभीष्ट वर माँगो।'

गौतमजीने कहा—पातालवासी हाटकेश्वर शिवका एक बार दर्शन करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही पुण्य इस शिवलिंगके दर्शनसे भी प्राप्त हो। जो मनुष्य भक्तिभावसे चैत्र शुक्ला चतुर्दशीमें इसका पूजन करें, वे सब स्वर्गलोकको जायें। इस लिंगके प्रभाव तथा अहल्येश्वरजीके दर्शनसे सबके परस्त्रीसंसर्गजनित पाप दूर हो जायँ। शतानन्देश्वरके दर्शनसे भी सब मनुष्य शुद्ध हों।


शंखतीर्थकी महिमा, राजा दम्भका चरित्र तथा ताम्बूलके दोष, सुर्ती खानेका निषेध

आनर्तनरेश बोले—मुनिश्रेष्ठ! इस समय मुझे शंखतीर्थका माहात्म्य बताइये। उसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा है।

विश्वामित्रजीने कहा—राजन्! जैसे आजकल तुम आनर्त देशके स्वामी हो, इसी प्रकार पूर्वकालमें 'दम्भ' नामसे प्रसिद्ध राजा इस देशके शासक थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। एक दिन ऐसा आया, जब वे सहसा कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गये। इसी समय अनेक शत्रुओंने भी उनपर धावा कर दिया। उनका राज्य छिन गया और वे रैवतक पर्वतपर चले गये। वहाँ जानेपर भी चोर और बटमार उन्हें सदा सब ओरसे पीड़ा देने लगे। जब हाथी, घोड़े, रथ और खजाने सभी लुट गये, तब वे मन-ही-मन इस चिन्तामें पड़े कि 'अब मैं क्या करूँ?' यही सब सोचते-विचारते हुए वे देवर्षि नारदजीका दर्शन करनेके लिये गये। उस दिन एकादशी तिथि थी। नारदजी तीर्थयात्राके प्रसंगसे भगवान् दामोदरका दर्शन करनेके निमित्त वहाँ आये थे। राजा दम्भने उनके समीप जा चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम किया

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