भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1210, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1210
  • नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १९८१

अहल्याका शापोद्धार तथा हाटकेश्वरक्षेत्रमें अहल्या, शतानन्द और गौतमजीकी तपस्या एवं पातालवासी हाटकेश्वरका दर्शन

विश्वामित्रजी कहते हैं—पूर्वकालमें जब महर्षि गौतमके शापसे उनकी धर्मपत्नी अहल्या देवी शिलारूपा हो गयीं, तब उनके पुत्र शतानन्दजीने विनयपूर्वक प्रार्थना करते हुए कहा—'पिताजी! इतिहास, पुराण तथा समस्त उपनिषदोंका चिन्तन करके मेरी माताकी शुद्धिका कोई उपाय बताइये, मैं उसका अनुष्ठान करूँगा, अन्यथा अपने प्राणोंका त्याग कर दूँगा।' यह सुनकर गौतमजीने दीर्घकालतक ध्यान करनेके पश्चात् अपने पुत्रसे कहा—'वत्स! आत्मघात बहुत बड़ा पाप है, उसे करनेका दुःसाहस न करना। मैंने तुम्हारी माताकी शुद्धिका निमित्त जान लिया। जिस समय भगवान् विष्णु रावणका वध करनेके लिये सूर्यवंशमें मनुष्यरूपमें अवतार लेंगे, उस समय उन्हींके चरणोंका स्पर्श होनेसे तुम्हारी माताकी शुद्धि होगी। अतः बेटा! तुम उस शुभ समयकी प्रतीक्षा करो। यह सब मैंने दिव्य दृष्टिसे देखा है।'

यह सुनकर मातृवत्सल शतानन्द बड़े प्रसन्न हुए और 'बहुत अच्छा' कहकर उस शुभ अवसरकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर दीर्घकालके बाद जब श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें भगवान् विष्णुका दशरथजीके यहाँ अवतार हुआ, तब मैं अपने यज्ञकी रक्षाके लिये तथा यज्ञकर्मका विनाश करनेवाले राक्षसोंका संहार करानेके लिये उन भगवान् श्रीरामको अपने आश्रमपर ले आया। मेरे यज्ञमें वे सभी भयंकर राक्षस मारे गये। तत्पश्चात् सीताजीके स्वयंवर तथा उसमें राजाओंके शुभागमनका समाचार सुनकर मैं लक्ष्मणसहित श्रीरामको जनकपुर ले गया। मार्गमें गौतमजीका आश्रम मिला। वहाँ महती शिलारूपा अहल्याको देखकर मैंने श्रीरामसे कहा—'वत्स! इस शिलाका स्पर्श करो। ये महर्षि गौतमकी पत्नी अहल्या हैं, जो शापके कारण शिला हो गयी हैं, तुम्हारे स्पर्शसे शुद्ध होकर पुनः मानवस्वरूपको प्राप्त होंगी।' मेरे कहनेसे श्रीरामने कौतूहलवश उस शिलाका स्पर्श किया। उनके स्पर्श करते ही वह शिला दिव्य रूपधारिणी नारी हो गयी। तब उन्होंने अपने पूर्वकर्मको स्मरण करके लज्जित हो गौतमजीको प्रणाम किया और कहा—'प्राणनाथ! मुझे कोई प्रायश्चित्त बताइये, दुष्कर होनेपर भी मैं उसका अनुष्ठान करूँगी।' तब बहुत देरतक सोच-विचारकर गौतमजीने कहा—'सौ चान्द्रायण तथा एक हजार कृच्छ्रव्रत करो। फिर तीर्थयात्रामें तत्पर अड़सठ तीर्थोंमें भ्रमण करके वहाँके देवताओंका दर्शन करो। उन सबके दर्शनसे तुम पूर्णतः शुद्ध हो जाओगी।' 'बहुत अच्छा' कहकर अहल्याने मुनिकी आज्ञा शिरोधार्य की और काशी आदि अड़सठ तीर्थोंमें क्रमशः घूमती हुई वहाँके शिवलिंगोंका भक्तिपूर्वक पूजन किया। अन्तमें वह हाटकेश्वरतीर्थको गयी। वहाँ पातालवासी भगवान् हाटकेश्वरका दर्शन करनेके लिये दुष्कर तपस्या करने लगी। अपने नामसे शिवलिंगकी स्थापना करके चन्दन, फूल और अनुलेपनसे उसका त्रिकाल पूजन करती हुई अहल्याका बहुत समय व्यतीत हो गया। परंतु हाटकेश्वरका दर्शन नहीं हुआ। किसी समय अहल्यानन्दन शतानन्दजी अपनी माताको खोजते हुए हाटकेश्वरक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्हें बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न देख प्रणाम करके दुःखी होकर बोले—'माँ! कठोर तपस्यासे क्यों शरीरको कष्ट देती हो? अड़सठ तीर्थोंमें जो शिवलिंग हैं उनका दर्शन तो तुमने कर ही लिया है, यहाँ कोई भी मनुष्य पातालवासी हाटकेश्वरका दर्शन नहीं कर पाता। पिताजीने जो शुद्धि बतायी थी वह तो हो ही गयी। अतः अपने शुभ आश्रमको लौट चलो।'

अहल्या बोलीं—वत्स! जबतक हाटकेश्वर शिवका दर्शन नहीं कर लूँगी, तबतक घर नहीं चलूँगी, ऐसा निश्चय कर लिया है।