संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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निकट जाकर बोले—'दिवाकर! आपका उदय क्यों नहीं होता? देखिये आपके बिना सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो रहा है।'
सूर्यदेवने कहा—देवताओ! मैंने पतिव्रताके आदेशसे अपना उदय रोक रखा है। अतः आप सब लोग उसके पास जाकर मेरे उदयके लिये अनुरोध करें। उसकी आज्ञा होनेपर मैं सुख-पूर्वक उदय हो जाऊँगा। एक लक्ष अश्वमेध यज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त होता है, उसीको स्त्री केवल पातिव्रत्यधर्मके पालनसे प्राप्त कर लेती है।
यह सुनकर सब देवता उस उत्तम क्षेत्रको गये और दीर्घिकाके सम्मुख खड़े हो कोमल वचनोंमें बोले—पतिव्रते! तुमने जो सूर्यका उदय रोक दिया, सो अच्छा नहीं किया। क्योंकि इससे पृथ्वीपर शुभ कर्मोंका अनुष्ठान रुक गया है। अतः शुभे! तुम आज्ञा दे दो, जिससे सूर्यदेव उदित हों।
दीर्घिका बोली—माण्डव्य मुनिने अकारण मेरे पतिको शाप दिया है। जब मेरे पति ही नहीं रहेंगे, तब मुझे सूर्योदयसे, यज्ञसे, श्राद्धसे और दान आदिसे क्या प्रयोजन है।
तब सब देवता एक-दूसरेकी ओर देखकर दीर्घिकासे बोले—'भद्रे! सूर्यका उदय होने दो, तुम्हारे प्रिय पतिकी भी मृत्यु हो जाय और ये मुनीश्वर माण्डव्य भी सत्यवादी हो जायें। इसके बाद हम शीघ्र ही मृत्युके मार्गमें गये हुए तुम्हारे पतिको पुनः जीवित कर देंगे। उस समय तुम्हारे पतिकी अवस्था पच्चीस वर्षकी-सी हो जायगी और तुम बड़े सुन्दररूपमें अपने पतिका दर्शन करोगी तथा तुम भी पंद्रह वर्षकी-सी अवस्थासे युक्त एवं कमलके समान नेत्रोंवाली होकर स्वेच्छानुसार मर्त्यलोकमें सुखका उपभोग करोगी और ये पापरहित मुनिवर माण्डव्य भी शूलभेदकी पीड़ासे मुक्त होकर सुखके भागी होंगे।'
तब दीर्घिकाने 'बहुत अच्छा' कहकर देवताओंकी बात मान ली। उसके 'हाँ' कहते ही भगवान् सूर्य बड़े वेगसे उदित हुए। सूर्यकी किरणोंका स्पर्श होते ही कोढ़ी ब्राह्मणकी मृत्यु हो गयी; किंतु देवताओंके हाथोंका स्पर्श पाकर पुनः वह उठ खड़ा हुआ। उसकी अवस्था पच्चीस वर्षकी-सी दिखायी दे रही थी। जान पड़ता था, दूसरे कामदेव ही आ गये हैं। उसे अपने पूर्वजन्मकी सब बातोंका स्मरण था, अतः इस नूतन जन्मसे उसे बड़ा हर्ष हो रहा था। दीर्घिका भी भगवान् शंकरका स्पर्श पाकर दिव्य लक्षणोंसे लक्षित युवती हो गयी। उसके नेत्र कमलदलके समान शोभा पा रहे थे और मुख चन्द्रमाके समान मनोहर प्रतीत होता था। तदनन्तर देवताओंने माण्डव्य मुनिको शूलीसे उतारकर कहा—'मुने! आपने जो शाप दिया था, वह आपका वचन सत्य किया गया। सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे वह कोढ़ी ब्राह्मण मर गया। तत्पश्चात् पुनः हमने इस स्त्रीके साथ उसे तरुण जीवन प्रदान किया है; अतः अब आप अपने आश्रमको पधारें और हमसे वर माँगें।'
## शूलीतीर्थ और दीर्घिकातीर्थका प्राकट्य, माण्डव्य मुनिका धर्मराजको शाप देना और उनके शूलीपर चढ़नेका कारण
माण्डव्यजीने कहा—सुरश्रेष्ठगण! मैं आपलोगोंसे वर ग्रहण करूँगा; परंतु ये धर्मराज मेरे एक प्रश्नका निर्णय करें। संसारमें समस्त प्राणियोंके लिये सुख और दुःखके रूपमें उनके पूर्वजन्मका शुभाशुभ कर्म ही उपस्थित होता है। यह सर्वथा सत्य सिद्धान्त है। मैंने इस लोक या परलोकमें कौन-सा पातक किया है, जिससे मुझे ऐसी वेदना प्राप्त हुई और किसी प्रकार भी मृत्यु नहीं हुई।
धर्मराजने कहा—विप्रवर! तुमने दूसरे शरीरमें