भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1178, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1178
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११४९

बचपनके समय तीखे शूलके अग्रभागसे पृथ्वीके एक जीवको बींधा था। यही एक पाप तुमसे हुआ है, इसके सिवा दूसरा कोई थोड़ा-सा भी पाप नहीं दिखायी देता। इसीलिये तुम्हें इस दशामें डाला गया है।

सूतजी कहते हैं—धर्मराजकी यह बात सुनकर माण्डव्य मुनिको बड़ा रोष हुआ। तब माण्डव्यने अपने सामने खड़े हुए धर्मराजसे कहा—'धर्म! तुमने मेरे थोड़ेसे अपराधके लिये महान् दण्ड दिया है। अतः मेरा शाप ग्रहण करो। तुम मानव-शरीर पाकर शूद्रयोनिमें स्थित हो जाति-संहारजनित महान् दुःखका उपभोग करोगे तथा आजसे मैंने समस्त देहधारियोंके लिये व्यवस्था कर दी कि आठ वर्षसे ऊपरका मनुष्य ही अपने निन्दित कर्मके कारण दण्डका भागी होगा।' ऐसा कहकर माण्डव्य मुनि शूलीकी पीड़ासे मुक्त हो अभीष्ट दिशाकी ओर चल दिये। उन्हें जाते देख सब देवताओंने कहा—'भगवन्! धर्मराज तो केवल न्याय करते हैं, अतः आप उन्हें शापके द्वारा शूद्र न बनावें। आप इनके ऊपर कृपा-प्रसाद करें।'

माण्डव्यने कहा—मैंने जो बात कह दी, वह मिथ्या नहीं हो सकती। निश्चय ही ये धर्मराज शूद्रयोनिमें पड़ेंगे तथापि शूद्रयोनिमें रहते हुए भी इन्हें उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होगी और ये पुनः परम उत्तम धर्मराज-पदको प्राप्त कर लेंगे। इन्हें इसी क्षेत्रमें रहकर शान्तभावसे भगवान् शंकरकी आराधना करनी चाहिये। महादेवजीके प्रसादसे इन्हें शीघ्र मोक्ष प्राप्त होगा और यदि आपलोग मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यह शूली आज मेरे स्पर्शसे धर्मदायक तीर्थ बन जाय।

देवता बोले—जो प्रातःकाल उठकर इस शूलीका स्पर्श करेगा, वह इस लोकमें पातकसे मुक्त हो जायगा।

माण्डव्य मुनिसे ऐसा कहकर इन्द्र आदि देवता पतिसहित उस पतिव्रतासे आदरपूर्वक बोले—पतिव्रते! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।

पतिव्रता बोली—देवेश्वरो! इस स्थानमें मेरे द्वारा जो गड्डा बनाया गया है, वह तीनों लोकोंमें दीर्घिकातीर्थके नामसे विख्यात हो।

देवताओंने कहा—आजसे लेकर तुम्हारे कथनानुसार यह गड्डा तीनों लोकोंमें दीर्घिकातीर्थके नामसे विख्यात होगा। जो मनुष्य इसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करेंगे, वे यदि अपुत्र होंगे तो पुत्रवान् हो जायेंगे और अपने वंशकी वृद्धि करेंगे।

पतिव्रतासे ऐसा कहकर सब देवता स्वर्गलोकको चले गये। सुन्दरी पतिव्रता भी अपने उसी प्रियतम पतिके साथ रहकर सुख भोगने लगी। अन्तिम अवस्था आनेपर उसने हाटकेश्वरक्षेत्रमें अपने दीर्घिकातीर्थका सेवन किया। तदनन्तर कालवश अपने पतिकी मृत्यु हुई देख उसने भी शरीर त्याग दिया और पतिके साथ वह भी ब्रह्मलोकको चली गयी। इस प्रकार मैंने यह दीर्घिकातीर्थका वर्णन किया है।

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! परमतपस्वी मुनिश्रेष्ठ माण्डव्यको किसने और किस कारणसे शूलीपर चढ़ाया था?

सूतजीने कहा—महर्षियो! पूर्वकालमें माण्डव्य मुनि बड़ी श्रद्धाके साथ तीर्थयात्रा करते हुए इस क्षेत्रमें आये थे। यहाँ विश्वामित्रसम्बन्धी पावन तीर्थमें जाकर उन्होंने पितरोंका तर्पण किया और सूर्योपस्थान करते हुए विभ्रादित्यादि सूर्यदेवतासम्बन्धी सूक्तका पाठ करने लगे। इसी समय कोई चोर किसीका धन चुराकर भागा और उसी ओर आ निकला। उस चोरका पीछा करते हुए कोई दूसरा मनुष्य भी उसके पीछे ही लगा हुआ वहाँ आया। तब चोरने मुनीश्वरको मौन देखकर वह धन उनके आगे रख दिया और स्वयं किसी गुफाके भीतर जा छिपा। इतनेमें ही उस धनको वापस लेनेके लिये बहुत-से मनुष्य वहाँ एकत्र हो गये। उन्होंने मुनिके आगे धनका वह गट्ठर देखकर पूछा—'महाभाग! इस मार्गसे कोई चोर यह धन लेकर आया है, बताइये वह किस मार्गसे निकला है?' माण्डव्यजी यह जानते हुए भी कि चोर

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