संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1176, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११४७
कुमारीने घोर तपस्या की। इस प्रकार तपमें लगी हुई उस कन्याके समीप राजसम्पदा उपस्थित हुई। उस समय इन्द्रने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'शुभे! तुम कन्यावस्थामें ऋतुकालको प्राप्त हुई हो, इस कारण सदोष हो गयी हो। अतः किसी पतिका वरण करो, जिससे पवित्रताको प्राप्त होओगी।' यह सुनकर उस कन्याको बड़ी लज्जा हुई। उसने वर्धमानपुरमें जाकर हाथ उठाकर कहा—'यदि कोई कुलीन ब्राह्मण मेरा पाणिग्रहण करे, तो मेरी आधी तपस्या उसकी हो जायगी और मैं उसका कल्याण करूँगी।'
यह सुनकर किसी कोढ़ी ब्राह्मणने उसे बुलाकर कहा—यदि तू सदा मेरे कहे अनुसार चले, तो मैं तेरा पाणिग्रहण करके तेरे साथ विवाह करूँगा।
कुमारी बोली—द्विजश्रेष्ठ ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे मेरा पाणिग्रहण करो, मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगी। तदनन्तर ब्राह्मणने गृह्यसूत्रोक्त विधानसे देवता, अग्नि तथा गुरुके समीप उस कुमारीका पाणिग्रहण किया। विवाहके पश्चात् दीर्घिका ब्राह्मणी पतिसे बोली—'नाथ! आज्ञा दीजिये मैं इस समय आपकी क्या सेवा करूँ?'
पति बोले—सुन्दरि ! मैं तुम्हारी सहायतासे अड़सठ तीर्थोंमें स्नान करना चाहता हूँ। यदि यह कार्य कर सको तो करो।
तब उस पतिव्रताने 'बहुत अच्छा' कहकर पतिकी आज्ञा शिरोधार्य की और पतिके बराबर बाँसकी एक मजबूत खाट बनाकर उसपर कोमल रूई भरा हुआ बिछावन डाल दिया और हाथ जोड़कर कहा—'प्राणनाथ ! इसपर बैठिये; जिससे आपको मस्तकपर लेकर समस्त शुभ तीर्थोंकी यात्रा करा सकूँ।' तब कोढ़ी ब्राह्मण प्रसन्न हो पृथ्वीसे शनैः-शनैः उठकर बाँसके उस खटोलेपर बैठा और वह उसे माथेपर लेकर सब तीर्थोंमें घूम-घूमकर अपने पतिको तीर्थस्नान कराने लगी। क्रमशः समूची पृथ्वीपर घूमती हुई एक दिन सन्ध्या होते-होते वह हाटकेश्वरक्षेत्रमें पहुँची। उस समय वह थक गयी थी, पैर लड़खड़ा रहे थे। उसी प्रदेशमें उस दिन मुनिवर माण्डव्यको शूलीपर चढ़ाया गया था। वे अत्यन्त दुःख सहन करते हुए शूलीपर बैठे हुए थे। पतिव्रता दीर्घिका माथेपर भार लेकर उसी मार्गसे निकली। उसके धक्केसे वह शूल हिल गया और मुनिवर माण्डव्यका शरीर भी विचलित हो गया। इससे उन्हें बड़ी भारी पीड़ा हुई और वे दुःखी होकर बोले—'किस पापीने मेरे इस शूलको हिला दिया, जिससे मुझ दुःखीका दुःख और भी बढ़ गया।'
दीर्घिका बोली—महाभाग! मैंने आपको देखा नहीं, भूलसे आपका स्पर्श हो गया।
माण्डव्य बोले—निष्ठुरे! तुमने मुझे प्राणान्तकारिणी पीड़ा दी है, इसलिये तुम्हारा अभीष्ट पति सूर्यकी किरणोंका स्पर्श होते ही मेरे शापसे निश्चय ही अपने प्राणोंको त्याग देगा।
दीर्घिका बोली—यदि प्रातःकाल मेरे पतिकी मृत्यु होगी तो अब प्रातःकाल या सूर्योदय होगा ही नहीं।
ऐसा कहकर दीर्घिका धरतीपर बैठ गयी और बाँसके खटोलेमें बैठे पतिको उसने माथेपरसे उतार दिया। उस समय कोढ़ीने कहा—'प्रिये ! मुझे प्यास लग रही है; अतः पीनेके योग्य शीतल जल ले आओ।' इतना सुनते ही वह पतिकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उत्सुक हो पानी लानेके लिये इधर-उधर घूमने लगी, किंतु अन्धकारमें उसे कहीं भी जल नहीं दिखायी दिया। तब उसने पृथ्वीपर आघात किया और माण्डव्य मुनिके देखते-देखते निर्मल एवं स्वादिष्ट जल निकल आया। फिर परिश्रमसे कष्ट पाते हुए अपने पतिको उस जलसे स्नान कराया और उन्हें जल पिलाकर स्वयं भी पीया। उस समय पतिव्रताके भयसे सूर्यदेव उदित नहीं हुए। इससे प्रातःकाल आनेमें बहुत विलम्ब हुआ। रात्रिको बहुत बड़ी होती देख यज्ञकर्म करनेवाले शान्तचित्त ब्राह्मण बहुत दुःखी हो गये। देवता यज्ञभागसे वंचित होकर बड़े कष्टमें पड़ गये और सूर्यनारायणके