भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1175

११४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गये और उस ब्राह्मणसे बोले—विप्रवर! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। इस भयंकर रोगसे तुम्हारी रक्षा मैं करूँगा। ऐसा कहकर राजाने बड़ी भारी तपस्या की। वे भक्तिपूर्वक दिन-रात उस क्षेत्रकी देवीकी आराधना करने लगे। मुण्ड, अथर्वशीर्ष, क्षेत्रपाल-सूक्त तथा वास्तुसूक्तके मन्त्रोंद्वारा देवीकी स्तुति करते हुए सरसों, लाल फूल, गुग्गुल और धूपकी आहुति देते थे। तत्पश्चात् नीलरुद्रका विशेषरूपसे जप करते थे। एक समय जब रात्रि व्यतीत हो रही थी, उनके होमकुण्डसे मन्त्रोंद्वारा आकृष्ट हुई उस क्षेत्रकी देवी धरती फोड़कर प्रकट हुई और बोली—'राजन्! मैं इस क्षेत्रकी अधिष्ठात्री देवी हूँ। इस होमके प्रभावसे तुमपर प्रसन्न हो पृथ्वीसे निकली हूँ। महाभाग! तुम्हारा जो कार्य हो उसे बताओ, मैं पूर्ण करूँगी।'

राजाने कहा—देवि! तुम सदा इसी स्थानपर निवास करो, जिससे रोगोंके संसर्गजनित दोष इस भूमिसे विदा हो जायँ तथा ये ब्राह्मणदेवता जैसे भी रोगमुक्त हों, वैसा उपाय करो।

क्षेत्रदेवी बोली—राजन्! इस स्थानको मैंने सब व्याधियोंके दोषोंसे रहित कर दिया। आजसे मैं सदा यहीं निवास करूँगी। इस समयसे जो भी व्याधिग्रस्त पुरुष इस स्थानपर आवेगा और भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, वह पूर्णतः नीरोग हो जायगा। अतः आज ये द्विजश्रेष्ठ आदर और भक्तिके साथ पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर मेरी पूजा करें। इस क्षेत्रमें एक दूसरा प्रसिद्ध तीर्थ है—चन्द्रकूपिका। उसमें ये ब्राह्मणदेवता प्रतिदिन स्नान करें। पूर्वकालमें दक्षके शापसे क्षयरोगसे ग्रस्त हुए महात्मा चन्द्रदेवने अपने स्नानके लिये उस कूपका निर्माण किया था। इसके सिवा यहाँ 'खण्डशिला' नामसे प्रसिद्ध एक देवी रहती हैं, वहीं सौभाग्यकूपिका नामक तीर्थ है। उस कूपमें स्नान करके ये खण्डशिला देवीका दर्शन करें। पूर्वकालमें कुष्ठरोगसे पीड़ित कामदेवने अपने स्नान तथा कुष्ठरोगके निवारणके लिये उस सौभाग्यकूपिकाका निर्माण किया था। इसी प्रकार यहाँ आप्सरसकुण्ड है, जिसमें रविवारके दिन स्नान करनेसे खुजली मिट जाती है।

तदनन्तर ब्राह्मणदेवताने परम पवित्र चन्द्रकूपिकामें स्नान करके भक्तिभावसे देवीका पूजन किया। एक मासतक पूजा करनेके बाद वे राजयक्ष्मासे मुक्त हो गये। तत्पश्चात् कामदेवनिर्मित सौभाग्यकूपिकाका दर्शन और उसमें स्नान करके वे खण्डशिला देवीका दर्शन प्रतिदिन करने लगे। एक मासतक ऐसा करनेसे उन्हें कुष्ठरोगसे भी छुटकारा मिल गया। उसके बाद रविवारको अप्सराओंके कुण्डमें स्नान करनेसे उनकी खुजली भी जाती रही। रोगमुक्त होकर ब्राह्मण अत्यन्त तेजस्वी दिखायी देने लगे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर राजाको आशीर्वाद दिया और उनसे विदा लेकर वे अभीष्ट स्थानको चले गये। इसके बाद राजा अज पुनः अपनी स्त्रीके साथ पाताललोकमें हाटकेश्वरजीके समीप चले गये। अजागृहमें स्थित होनेके कारण उस क्षेत्रकी देवी सब ओर अजागृहाके नामसे विख्यात हुई। आज भी राजयक्ष्मासे ग्रस्त हुआ जो मनुष्य उसी विधिसे देवीका पूजन करता है, वह शीघ्र ही नीरोग हो जाता है।

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पतिव्रताकी शक्तिसे उसके मरे हुए पतिको पुनः नवजीवनकी प्राप्ति

सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें श्रेष्ठ नगर वर्धमानपुरमें वीरशान्त नामसे विख्यात एक ब्राह्मण रहते थे, वे वेद-विद्यामें प्रवीण थे। उनके एक कन्या उत्पन्न हुई, जो प्रमाणसे बहुत बड़ी थी। वह कुमारी धीरे-धीरे युवावस्थाको प्राप्त हुई; परंतु किसी भी पुरुषने उसका वरण नहीं किया, क्योंकि जो काममोहित पुरुष अत्यन्त थोड़े केशवाली, अत्यन्त बड़ी तथा अधिक नाटी कन्याओंसे विवाह करता है, वह छः महीनेके भीतर मृत्युको प्राप्त होता है। इसी कारण सब लोग उस कुमारीको बहुत बड़ी बताकर त्याग देते थे। इससे वैराग्यको प्राप्त होकर उस