भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1183, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1183
१९५४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मानवोंके लिये यह लोक और परलोक दोनों सुखद होते हैं। गृहस्थाश्रमी पुरुषोंके द्वारा गृहस्थ-धर्मका पालन करनेके लिये जो संग्रह किया जाता है, वह इहलोक और परलोकमें भी सनातन सुख प्रदान करता है।

शुकदेवजी बोले—दैवयोगसे कभी अग्निसे भी शीतलता प्राप्त हो सकती है, चन्द्रमासे भी ताप हो सकता है; परंतु इस मर्त्यलोकमें परिग्रहसे भी सुखकी उत्पत्ति हो, ऐसा न तो कभी हुआ है, न होता है और न आगे कभी होगा ही।

व्यासजीने कहा—बहुत पुण्य होनेसे किसी प्रकार इस पृथ्वीपर अत्यन्त दुर्लभ मानवजन्मकी प्राप्ति होती है। उसे पाकर यदि मनुष्य गृहस्थधर्मका तत्त्व जाननेवाला हो तो उसे क्या नहीं मिल जाता ?

शुकदेवजी बोले—यदि मनुष्य जन्मकालमें अपनी अवस्थाको देखकर ज्ञानयुक्त होता है तो जन्म लेनेके पश्चात् वह सारा ज्ञान भूल जाता है।

व्यासजीने कहा—मनुष्यका पुत्र हो अथवा गदहेका बच्चा, जब वह शरीरमें धूल लपेटे, चंचल गतिसे चलता और तोतली वाणी बोलता है, तब उसका वह शब्द भी लोगोंके लिये बड़ा आनन्ददायक होता है।

शुकदेवजी बोले—मुने! धूलमें रेंगते और लोटते हुए अपवित्र शिशुसे जो यहाँ सन्तुष्ट होते या सुखका अनुभव करते हैं, वे अज्ञानी हैं।

व्यासजीने कहा—यमलोकमें पुं नामक महाभयंकर नरक है, पुत्रहीन मनुष्य ही उसमें जाता है। इसलिये पुत्रकी प्रशंसा की जाती है।

शुकदेवजी बोले—महामुने ! यदि पुत्रसे ही सब लोगोंको स्वर्गकी प्राप्ति होती, तब तो सूअरों, कुत्तों और टिड्डियोंको विशेषरूपसे उसकी प्राप्ति होनी चाहिये ?

व्यासजीने कहा—पुत्रके दर्शनसे मनुष्य पितृ-ऋणसे मुक्त होता है, पौत्रके दर्शनसे वह देव-ऋणसे मुक्त होता है और प्रपौत्रको भी देख ले, तब तो वह स्वर्गका निवासी होता है।

शुकदेवजी बोले—गीध दीर्घजीवी होता है, वह सदा अपनी कई पीढ़ीकी सन्तानोंको क्रमशः देखता है; किंतु क्या वह मोक्षको प्राप्त हो जाता है?

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार कहकर शुकदेवजी वनमें चले गये।

अपने पुत्र शुकको गृहस्थीकी ओरसे निःस्पृह देख चेटिकाने दुःखी होकर व्यासजीसे कहा—द्विजश्रेष्ठ ! मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे मैं पुत्रके लिये तपस्या करूँ और उसके द्वारा महादेवजीको सन्तुष्ट करूँ, जिससे मुझे वंशकी वृद्धि करनेवाला श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो। ऐसा निश्चय करके व्यासजीकी आज्ञा पाकर पतिव्रता चेटिकाने हाटकेश्वरक्षेत्रमें जा तपस्या प्रारम्भ की। उसने भगवान् शंकरकी स्थापना करके उनके आगे निर्मल जलसे भरी हुई एक विशाल वापी निर्माण करायी, जो स्नान करनेमात्रसे समस्त पातकोंका नाश करनेवाली है। तदनन्तर उसकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर त्रिपुरारि महादेवजीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'सुव्रते ! वरदान माँगो।'

चेटिका बोली—सुरश्रेष्ठ ! मुझे ऐसा पुत्र दीजिये, जो मेरे वंशकी वृद्धि करनेवाला, सदा ही मित्रोंको आनन्द देनेवाला, सुशील तथा विनयी हो।

श्रीमहादेवजीने कहा—शोभने ! तुमने जैसे पुत्रके लिये प्रार्थना की है, वैसा ही पुत्र तुम्हें प्राप्त होगा, इसमें सन्देह नहीं है। दूसरी कोई भी जो स्त्री यहाँ वापीमें स्नान करके एकाग्रचित्त हो एक वर्षतक प्रत्येक शुक्ला पंचमीको तुम्हारे द्वारा स्थापित मेरे इस लिंगका पूजन करेगी, वह वर्षके अन्तमें सौभाग्यसे सम्पन्न होगी। इसी प्रकार जो पुरुष यहाँ स्नान करके सकाम भावसे मेरी पूजा करेगा, वह मनोवांछित कामना प्राप्त कर लेगा और जो निष्काम भावसे मेरा पूजन करेगा, वह मोक्षको प्राप्त होगा।

ऐसा कहकर महादेवजी अन्तर्धान हो गये और चेटिकाने व्यासजीसे कपिंजल नामक पुत्र प्राप्त किया। (चेटिकाद्वारा स्थापित होनेसे वह शिवलिंग 'चटकेश्वर' नामसे विख्यात हुआ।)

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