संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1184, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १९५५
राजा सुरथके द्वारा भैरवजीकी स्थापना और आराधना तथा शंखतीर्थ, शिव, गणेश, गौरी और चक्रपाणि वासुदेव आदि देवविग्रहोंके दर्शनका माहात्म्य
सूतजी कहते हैं—किसी समय सूर्यवंशमें उत्पन्न सुप्रसिद्ध राजा सुरथ अपने राज्यसे भ्रष्ट होकर पुरोहित वसिष्ठजीके आश्रमपर गये और प्रणाम करके बोले—'ब्रह्मन्! इस समय शत्रुओंने मुझ मन्दभागीके राज्यका बलपूर्वक अपहरण कर लिया है। अतः मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये। मेरी दूसरी कोई गति नहीं है।'
वसिष्ठजीने कहा—महाराज! यदि ऐसी बात है, तो तुम शीघ्र ही समस्त सिद्धियोंको देनेवाले हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाओ। वहाँ भैरवरूपसे महादेवजीकी स्थापना करो, जिनके हाथमें उठे हुए त्रिशूलके अग्रभागपर अन्धकासुरका शरीर गुँथा हुआ स्थित हो। इस प्रकार भैरवरूपी शिवकी स्थापना करके नारसिंहमन्त्रसे लाल फूल, लाल चन्दन तथा धूप आदिके द्वारा उनकी पूजा करो। इससे भैरवजीकी शक्ति प्राप्त करके तुम तेज और वीर्यसे सम्पन्न हो जाओगे और उन्हींकी कृपासे सम्पूर्ण शत्रुओंका संहार कर डालोगे; परंतु बड़ी पवित्रताके साथ तुम्हें भगवान् भैरवकी पूजा करनी चाहिये, अन्यथा विघ्नकी प्राप्ति होगी।
महर्षि वसिष्ठका यह वचन सुनकर राजा सुरथ तत्काल हाटकेश्वरक्षेत्रमें गये। वहाँ उन्होंने भैरवरूपधारी महादेवजीकी स्थापना की और भक्तिपूर्वक नारसिंह-मन्त्रद्वारा उनका पूजन किया। उपासनाके समय राजा बड़े ही पवित्र, संयमशील एवं ब्रह्मचर्यपरायण रहते थे। नारसिंह-मन्त्रका दस सहस्र जप करनेके पश्चात् राजाके ऊपर भगवान् भैरव सन्तुष्ट हुए और इस प्रकार बोले—'राजन्! इस मन्त्रसे पूजित होकर मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिये तुम मनोऽभिलषित वर माँगो।'
सुरथ बोले—सुरेश्वर! शत्रुओंने मेरा राज्य छीन लिया है, वह आपके प्रसादसे पुनः शत्रुरहित होकर मुझे प्राप्त हो। दूसरा कोई भी जो पुरुष यहाँ आकर इसी प्रकार पूजन करे, उसे भी सहस्र मन्त्रोंका जप पूरा होनेपर आप मेरी ही भाँति सिद्धि प्रदान करें।
'तथास्तु' कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये। राजा सुरथने भी संग्राममें शत्रुओंका वध करके अपना राज्य प्राप्त कर लिया।
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! जो मनुष्य शंख-तीर्थमें विशेषतः एकादशी तिथिको स्नान करता है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। जो वहाँ सिद्धेश्वरसहित ग्यारह रुद्रोंका भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, उसके द्वारा माहेश्वरतीर्थोंके समस्त शिवविग्रहोंका दर्शन सम्पन्न हो जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक ग्रहोत्थादेवीका दर्शन करता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण दुर्गा-मूर्तियोंका दर्शन हो जाता है। जो मनुष्योंको स्वर्गद्वार प्रदान करनेवाले गणेशजीको देखता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण गणेश-विग्रहोंका दर्शनकार्य सम्पन्न हो जाता है। जो वहाँ बरगदके नीचे शर्मिष्ठाद्वारा स्थापित गौरीजीका दर्शन करता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण गौरीविग्रहोंका दर्शन हो जाता है। जो मानव प्रातःकाल उठकर चक्रपाणि वासुदेवका दर्शन करता है, उसने समस्त वासुदेव-विग्रहोंका दर्शन कर लिया। जो मनुष्य सोते और जागते समय तथा प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान करनेके पश्चात् भक्तिपूर्वक भगवान् चक्रपाणिका दर्शन करता है, उसके ब्रह्महत्या आदि पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।
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