संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११५३ ---|---
शुकदेवजीका जन्म, वैराग्य, व्यासजीके साथ उनका संवाद और वनगमन
सूतजी कहते हैं—वहाँपर चटकेश्वर नामक महादेवजी हैं, जो मनुष्योंको पुत्र प्रदान करनेवाले हैं। पूर्वकालमें चेटिकाने वहाँ तप किया था, उसने व्याससे कपिंजल नामक पुत्र पाया था। एक समयकी बात है, शान्तचित्त महात्मा व्यासजीके मनमें पत्नीके लिये अभिलाषा हुई। तब उन्होंने जाबालि मुनिसे उनकी सुन्दरी कन्या माँगी। जाबालिने चेटिका नामकी कन्या व्यासजीके साथ ब्याह दी। तब व्यासजी उसके साथ वनमें रहते हुए मैथुनमें प्रवृत्त हुए। ऋतुकालमें सत्यवतीनन्दन व्याससे मैथुन प्राप्त करके चेटिका गर्भवती हुई। उसका दूसरा नाम पिंगला भी था। उसके उदरमें वह गर्भ दिन-दिन पुष्ट होने लगा। बारह वर्ष बीत गये, किंतु वह गर्भ उत्पन्न नहीं हुआ। वह भीतर ही रहकर जो कुछ सुनता उसे याद कर लेता था, उसकी बुद्धि बड़ी प्रखर थी। उसने गर्भमें रहते हुए ही अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद पढ़ लिये। स्मृति, पुराण तथा मोक्षशास्त्रका वह दिन-रात पूर्णरूपेण पाठ करता था। वह गर्भमें ज्यों-ज्यों वृद्धिको प्राप्त होता त्यों-ही-त्यों उसकी माता अत्यन्त पीड़ाको प्राप्त होकर व्याकुल होती जाती थी। तब विस्मयमें पड़े हुए व्यासजीने उस गर्भस्थ बालकसे पूछा—‘तुम कौन हो, गर्भका रूप धारण करके मेरी धर्मपत्नीकी कुक्षिमें आ बैठे हो? बाहर क्यों नहीं निकलते?’
गर्भ बोला—जो चौरासी लाख योनियाँ बतायी गयी हैं, उन सबमें मैंने भ्रमण किया है। अतः मैं क्या बताऊँ कि कौन हूँ। भयंकर संसारमें भ्रमण करते-करते मुझे बड़ा निर्वेद (वैराग्य) हुआ है। इस समय मनुष्य होकर इस उदरमें आया हूँ। अब मेरा विचार किसी प्रकार मनुष्यलोकमें निकलनेका नहीं है। यहीं रहकर योगाभ्यासमें तत्पर हो मोक्षमार्गको प्राप्त होऊँगा।
व्यासजीने कहा—वत्स! यदि तुम्हारी ऐसी अभिलाषा है, तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा। इस गर्भवासरूपी घृणित एवं घोर नरकसे निकल आओ और योगका आश्रय लेकर कल्याणको प्राप्त होओ।
गर्भ बोला—विप्रवर! जबतक जीव गर्भमें रहता है, तभीतक उसे ज्ञान, वैराग्य तथा पूर्वजन्मका स्मरण बना रहता है। जब वह गर्भसे निकलता है और भगवान् विष्णुकी माया उसे स्पर्श करती है, तब सारा ज्ञान भूल जाता है। इसलिये मैं इस गर्भसे किसी तरह बाहर नहीं निकलूँगा।
व्यासजीने कहा—वैष्णवी माया तुमपर किसी प्रकार भी प्रभाव नहीं डालेगी। अतः तुम मुझे अपना मुख दिखाओ।
तदनन्तर बारह वर्षके कुमार शुक जो यौवनके समीप पहुँच चुके थे, गर्भसे बाहर निकले और व्यास तथा माताको प्रणाम करके उसी क्षण वनवासके लिये प्रस्थित हुए। तब मुनिवर व्यासने कहा—‘बेटा! मेरे घरमें ठहरो; जिससे तुम्हारे जातकर्म आदि संस्कार तो कर दूँ।’
शुकदेव बोले—मेरे जन्म-जन्ममें सैकड़ों संस्कार हो चुके हैं। उन्हीं बन्धनात्मक संस्कारोंने मुझे भवसागरमें डाल रखा है।
व्यासजीने कहा—द्विजके बालकको पहले ब्रह्मचारी, फिर गृहस्थ, तत्पश्चात् वानप्रस्थी और अन्तमें संन्यासी होना चाहिये। इसके बाद वह मोक्षको प्राप्त होता है।
शुकदेवजी बोले—यदि ब्रह्मचर्यसे ही मोक्ष होता है, तब तो नपुंसकोंको वह सदा ही प्राप्त होना चाहिये। यदि गृहस्थाश्रमियोंकी मुक्ति होती है, तब तो सम्पूर्ण जगत्को ही मुक्त हो जाना चाहिये। यदि कहें, वनवासमें अनुरक्त रहनेवालोंकी मुक्ति होती है तब तो मृगोंकी मुक्ति अवश्य हो जानी चाहिये। यदि आपका यह विचार हो कि संन्यास-धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंका मोक्ष होता है तब तो जितने दरिद्र मनुष्य हैं, उन सबकी मुक्ति पहले हो जानी चाहिये।
व्यासजीने कहा—मनुजीका कथन है कि गृहस्थधर्ममें अनुरक्त हो सन्मार्गपर चलनेवाले