भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1181
१९५२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया। इसी समय आकाशवाणी हुई—'कल्याणी! तुम मनोवांछित वर माँगो।'

अदिति बोलीं—सुरश्रेष्ठ! मेरे पुत्र देवता युद्धमें दैत्योंद्वारा मारे जाते हैं। अतः आप उन्हें अमर बना दें। युद्धमें दानवोंके द्वारा उन्हें अवध्य कर दें।

श्रीभगवान् बोले—शुभे! जो मेरे इस लिंगमय विग्रहका स्पर्श करके युद्धमें जायँगे, वे एक वर्षतक शत्रुओंके द्वारा अवध्य रहेंगे। दूसरे भी जो मनुष्य माघकृष्णा चतुर्दशी (फाल्गुनकी शिवरात्रि)-को एकाग्रचित्त हो यहाँ जागरण करेंगे, वे भी एक वर्षतक नीरोग रहेंगे। जो इस शुभ देवस्थानमें आयगा, उसे मृत्यु दूरसे ही छोड़ देगी।

यह सुनकर अदितिने मरनेसे बचे हुए अपने पुत्रोंको लाकर इस शिवलिंगका दर्शन कराया और उसके माहात्म्यका भी वर्णन किया। तब देवता उस शिवलिंगको प्रणाम करके प्रसन्न हो अस्त्र-शस्त्र ले-लेकर दैत्योंपर चढ़ आये। देवताओंको सहसा युद्धके लिये आया देख दैत्य भी गर्जना करते हुए उनके सामने गये। उस समय देवताओंका दानवोंके साथ भयंकर युद्ध हुआ। उस संग्राममें अनेक प्रकारके तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा देवताओंने असंख्य दैत्योंको यमलोक पहुँचाया। जो मारनेसे बच गये, वे स्वर्ग छोड़कर समुद्रमें जा छिपे। तदनन्तर इन्द्रने अपना राज्य प्राप्त किया। शेष दानवोंने उस शिवलिंगकी महिमाका पता पाकर शुक्रजीसे पूछा। तब शुक्राचार्यने उन्हें सब माहात्म्य बताया—'फाल्गुनकी शिवरात्रिको पवित्र होकर जो पुरुष उस शिवलिंगकी पूजा करता है, वह काल आ जानेपर भी प्राण-त्याग नहीं करता। दानवो! तुमलोग उस दिन रातमें जाकर उस शिवलिंगकी पूजा करो, जिससे तुम एक वर्षतक मृत्युके भयसे रहित हो जाओगे।'

इन्द्रको नारदजीसे दैत्योंकी यह मन्त्रणा ज्ञात हो गयी। तब उन्होंने सब देवताओंके साथ विचार किया कि 'जैसे भी हो सके, हमें महादेवजीकी रक्षाके लिये उत्तम-से-उत्तम उद्योग करना चाहिये।' ऐसा निश्चय करके तैंतीस कोटि देवता अस्त्र-शस्त्रोंके साथ उस शिवलिंगकी रक्षाके लिये हाटकेश्वरक्षेत्रमें आकर स्थित हुए। उन्हें देखकर दानव भयभीत होकर सब दिशाओंमें भाग गये। शिवरात्रिके दूसरे दिन पुनः सब देवताओंने आपसमें विचार किया कि 'यदि हमलोग इस क्षेत्रको छोड़कर जायँगे, तो दैत्य यहाँ आकर इस शिवलिंगकी पूजा करेंगे और वे भी हमारी ही भाँति अवध्य हो जायँगे। इसलिये हम तैंतीस देवता इस शिवलिंगकी रक्षाके लिये यहीं टिके रहें और शेष देवता इन्द्रके साथ स्वर्गमें जायँ।' ऐसा निश्चय करके आठ वसु, बारह सूर्य, ग्यारह रुद्र तथा दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस देवता उस शिव-लिंगकी रक्षाके लिये हाटकेश्वरक्षेत्रमें निवास करने लगे। शेष सब लोग इन्द्रसहित स्वर्गमें चले गये।

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार प्रभावशाली अमरेश्वरलिंग पूर्वकालमें अदितिदेवीके द्वारा स्थापित हुआ था। जिसके दर्शनमात्रसे देहधारियोंकी (एक वर्षतक) मृत्यु नहीं होती है। मृत्युका निवारण करनेके कारण ही वह अमरलिंगके नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात है। उस शिवलिंगके आगे स्वच्छ जलसे भरा हुआ एक उत्तम कुण्ड है, जिसे अदितिदेवीने अपने स्नानके लिये निर्माण कराया था। जो मनुष्य उसमें स्नान करके उस शिवलिंगका दर्शन करता है तथा उसी दिन रातमें वहाँ जागरण करता है, वह एक वर्षतक अपमृत्युको नहीं प्राप्त होता।

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