भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1180
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११५१ ---|---

और सत्यसेनसे मिले। राजा सत्यसेनने नारदजीका पूजन किया। तत्पश्चात् मुनिने एकान्तमें आदरपूर्वक उनको पिताका सन्देश सुनाया। यह बात सुनकर सत्यसेनने विधिपूर्वक नारदजीकी पूजा करके उन्हें विदा किया और पिताके उद्देश्यसे प्रतिदिन सहस्रों ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक मिष्टान्न भोजन कराया। धर्मसम्बन्धी अन्य समस्त कार्योंको छोड़कर ग्रीष्मकालमें विशेषरूपसे पौंसला (प्याऊ) चलानेकी व्यवस्था की। इस प्रकार अन्न और जलके दानमें लगे हुए राजा सत्यसेनके राज्यमें भयंकर अनावृष्टि हुई, जो समस्त अन्न एवं खेती आदिको नष्ट कर देनेवाली थी। इन्द्रने बारह वर्षोंतक पृथ्वीपर जल नहीं बरसाया। इससे सब लोग क्षुधाके कष्टसे व्याकुल हो गये। उस समय राजा सत्यसेन पहलेकी भाँति ब्राह्मणोंको अन्नदान न कर सके। तब उनके पिता स्वप्नमें दर्शन देकर बोले—‘तुम पुत्रके रहते हुए मैं स्वर्गमें स्थित होकर भी भूख-प्याससे व्याकुल हूँ, अतः तुम अन्न दो, मिष्टान्न और जलका दान करो।’

यह स्वप्न देखनेसे राजाको बड़ा शोक हुआ। अन्नके अभावके सम्बन्धमें उन्होंने मन्त्रियोंके साथ बैठकर सलाह की और कहा—‘मैं अनाजके लिये भगवान् शंकरकी आराधना करूँगा। आपलोग सदा राज्यकी रक्षा करते रहें।' तब उन्होंने हाटकेश्वरक्षेत्रमें आकर भगवान् शंकरकी स्थापना की और यम-नियमसे रहते हुए वे उनकी भलीभाँति आराधना करने लगे। एक वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् शिव सन्तुष्ट हुए और राजासे इस प्रकार बोले—‘तुम इच्छानुसार वर माँगो।’

राजाने कहा—देवदेवेश्वर! मैंने अन्नकी प्राप्तिके लिये आपकी आराधना की है, अतः आप मुझे शीघ्र ही असंख्य अन्न प्रदान करें। पृथ्वीपर वर्षा हो, जिससे अनाज उत्पन्न हो और जल भी प्रचुर मात्रामें मिल सके। स्वर्गमें रहनेवाले मेरे महात्मा पिताको भी आपके प्रसादसे तृप्ति प्राप्त हो।

श्रीभगवान् बोले—राजेन्द्र! समस्त पृथ्वीपर शीघ्र ही वृष्टि होगी और पृथ्वीपर सब प्रकारके अन्न होंगे। इस समय तुम अपने घर जाओ। राजन्! तुमने यहाँ जो मेरे लिंगकी प्रतिष्ठा की है, इसका जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर दर्शन करेगा, उसे मनोवांछित वस्तुकी प्राप्ति होगी।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् राजा सत्यसेन बड़े हर्षसे अपने निवासस्थानपर आये और पृथ्वीका अकण्टक राज्य करने लगे।

सूतजी कहते हैं—आज भी भयंकर कलिकाल प्राप्त होनेपर जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक मिष्टान्नद शिवका दर्शन करता है, वह यदि चाहे तो उसे मिष्टान्नकी प्राप्ति होती है और जो निष्कामभावसे उनका दर्शन करता है, वह देवाधिदेव शूलपाणि महादेवजीके लोकको प्राप्त होता है।


## अदितिदेवीद्वारा आराधित अमरेश्वर लिंगकी महिमा

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! अमरत्व प्रदान करनेवाले जो अमरेश्वर महादेव बताये गये हैं, उनकी स्थापना किसने की है और उनका प्रभाव क्या है?

सूतजी बोले—पूर्वकालमें प्रजापति दक्षकी दो कन्याएँ दिति और अदिति महात्मा कश्यपजीके साथ ब्याही गयी थीं। अदितिसे देवताओंकी उत्पत्ति हुई और दितिसे दैत्योंकी। उनमें बड़ा भारी वैर उपस्थित हुआ। दैत्योंने देवताओंको पदभ्रष्ट कर दिया और वे सब सम्पूर्ण दिशाओंमें इधर-उधर भाग गये। तब देवमाता अदिति भगवान् शंकरके ध्यानमें तत्पर हो दिन-रात तपस्या करने लगीं। इस प्रकार व्रतमें स्थित हुई अदिति देवीके आगे धरती फोड़कर एक शिवलिंग प्रकट हुआ। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उसकी स्तुति करके