संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विश्वामित्रकी उत्पत्ति, राज्य-प्राप्ति, वसिष्ठ मुनिके आश्रमपर नन्दिनीद्वारा सेनासहित विश्वामित्रका सत्कार, नन्दिनीके कोपसे उनका पराभव तथा राज्य त्यागकर तप करनेका निश्चय
**सूतजी कहते हैं—**गाधिकी महारानीने भी मन्त्रसे सिद्ध किये हुए चरुका भक्षण करके उसी वर्षमें गर्भ धारण किया। गर्भवती होनेपर साध्वी रानी तीर्थयात्रामें तत्पर हुई और अनेक प्रकारके व्रतोंका पालन करने लगी। जहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि हो, वहाँ वे बड़े हर्षसे जातीं और सुनतीं। दसवाँ मास पूर्ण होनेपर उन्होंने भी उत्तम कान्तिसे युक्त पुत्र उत्पन्न किया, जो चराचर जगत्में विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ। जैसे शुक्ल पक्षका चन्द्रमा आकाशमें प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है, उसी प्रकार महाभाग विश्वामित्र भी नित्यप्रति बढ़ने लगे। जब वे युवावस्थासे सम्पन्न एवं राज्य करनेमें समर्थ हुए, तब उनके पिता गाधिने उन्हें राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। इसके बाद राजा गाधि अपनी पत्नीके साथ वनमें चले गये।
राज्य-संचालनमें नियुक्त होकर भी विश्वामित्रजी प्रायः ब्राह्मणोंके स्वागत-सत्कार एवं सत्संगमें ही संलग्न रहते थे। एक समय उन्होंने वनमें प्रवेश किया और बहुत-से हिंसक पशुओंको मारा। फिर जेठकी तपती हुई दुपहरीमें भूख-प्याससे पीड़ित हो वे महात्मा वसिष्ठके आश्रमपर गये। वसिष्ठजीने भी नृपश्रेष्ठ विश्वामित्रको आया देख प्रसन्नतापूर्वक उनकी अगवानी की तथा उनके लिये अर्घ्य और मधुपर्क निवेदन करके कहा—'महीपाल! आपका स्वागत है! कहिये, मेरे आश्रमपर पधारे हुए आपका मैं कौन-सा अभीष्ट कार्य पूर्ण करूँ?'
**विश्वामित्रजी बोले—**मुनीश्वर! मेरी इन्द्रियाँ प्याससे व्याकुल हो रही थीं। मैं जल पीनेके लिये आपके आश्रमपर आया था सो यहाँ शीतल जल पी लिया। मेरी प्यास बुझ गयी है। अब आज्ञा दीजिये, जिससे अपने घरको जाऊँ।
**वसिष्ठजीने कहा—**राजन्! मध्याह्नकालमें सूर्य अत्यन्त तापदायक है। अतः इस समय मेरे आश्रममें ही भोजन करके अपराह्नकालमें जाइयेगा।
**विश्वामित्रजी बोले—**मुने! मैं चतुरंगिणी सेनाके साथ यहाँ आया था। आपके आश्रमके द्वारपर मेरी सेना भी स्थित है। जो स्वामी अपने सेवकोंके भूखे रहनेपर भी भोजन कर लेता है, वह भयंकर नरकमें जाता है। इसलिये मुझे घर लौटनेकी आज्ञा दीजिये।
**वसिष्ठजीने कहा—**यदि आपके सेवक मेरे द्वारपर भूखे हैं, तो उन सबको बुलाइये; मैं सभीको भोजनसे तृप्त करूँगा।
यह सुनकर राजा विश्वामित्रने सम्पूर्ण सेनाको वहीं बुला लिया और स्नान, सन्ध्या, तर्पण तथा जप करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर वे सिंहासनपर विराजमान हुए। इसी समय वसिष्ठजीने नन्दिनी नामक धेनुका आवाहन किया और वह विश्वामित्रके आगे जाकर खड़ी हो गयी। तब वसिष्ठजीने कहा—'तुम अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य तथा पेय आदि विविध खाद्य पदार्थोंके द्वारा सेनासहित महाराज विश्वामित्रको तृप्त करो। साथ ही इनके घोड़े और हाथी आदिके लिये भी चारे-दाने आदिकी व्यवस्था करो।'
'बहुत अच्छा' कहकर नन्दिनीने क्षणभरमें दस हजार सेवकोंको उत्पन्न किया। उन सबने सब प्रकारके भोज्य पदार्थोंको लेकर विश्वामित्रकी सेनाके प्रत्येक व्यक्तिको पृथक्-पृथक् भोजन परोसा। सेना, परिवार, हाथी, ऊँट, घोड़े और बैल आदिसहित महाराज विश्वामित्र पूर्णतः तृप्त हो गये। यह कौतुक देखकर मन्त्रियोंसहित विश्वामित्रने विचार किया कि 'इस उत्तम धेनुको अपने घर ले चलना चाहिये। ये ब्राह्मणदेवता इसे