संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1190, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६१
मनोवांछित वर देते हैं तो उनसे अपने लिये ब्राह्मणोचित गुणोंसे सम्पन्न एक पुत्र माँगो और मेरे लिये क्षत्रियोचित गुणोंसे युक्त एक पुत्रके लिये प्रार्थना करो।' माताकी बात सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली राजकुमारी ऋचीक मुनिके पास गयी और माताने जैसा कहा था, वह सब उनसे कहा। पत्नीका वह वचन सुनकर ऋचीक मुनिने विधिपूर्वक पुत्रेष्टि यज्ञ करके दो चरु तैयार किये। एकमें तो उन्होंने ब्राह्मणोचित तेज एवं सम्पूर्ण यशका आधान किया और दूसरेमें सम्पूर्ण क्षात्रतेज स्थापित कर दिया। तदनन्तर उन्होंने पहले अपनी पत्नीको उत्तम ब्राह्मतेजसे युक्त चरु प्रदान किया और कहा—'तुम इसे खा लो और खानेके बाद पीपलके वृक्षका आलिंगन करो। इससे तुम्हें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न उत्तम पुत्र प्राप्त होगा तथा यह जो दूसरा चरु है, इसे अपनी माताको दे दो। साथ ही उन्हें समझा दो कि वे इस चरुको खाकर बरगदके वृक्षका आलिंगन करें। ऐसा करनेसे उन्हें क्षत्रियतेजसे युक्त श्रेष्ठ पुत्रकी प्राप्ति होगी।' घरमें जाकर दोनों माँ-बेटी प्रसन्नचित्त होकर आपसमें बात करने लगीं कि मुनिका वचन अवश्य सत्य होगा।
तदनन्तर माताने पुत्रीसे कहा—संसारमें सब लोग अपने लिये उत्तम वस्तु चाहते हैं, अतः तुम्हारे लिये जो चरु है, उसमें अवश्य कोई-न-कोई विशेषता होगी, अतः अपना चरु मुझे दे दो और मेरा तुम ले लो।' माताके ऐसा कहनेपर पुत्रीने चरु और वृक्षमें अदला-बदली कर ली। तत्पश्चात् ऋतुस्नाता होनेपर दोनों स्त्रियोंने गर्भ धारण किया। त्रिभुवनसुन्दरी राजकन्या उस गर्भको प्राप्त होकर क्षत्रियतेजसे युक्त हो गयी। वह मन-ही-मन हाथी, घोड़ेपर चढ़ने तथा राज्य करनेकी बात सोचने लगी। देवताओं और असुरोंकी युद्धकथा बड़े रुचिके साथ सुनने लगी।
उसके क्षत्रियोचित कर्म देखकर मुनिने कुपित होकर पूछा—पापिनि! तुमने यह क्या किया? अवश्य ही चरु और वृक्षमें तुमने परिवर्तन कर लिया है। अतः इसमें सन्देह नहीं कि तुम्हारा पुत्र क्षत्रिय होगा और भाई ब्राह्मण। गर्भके चिह्नोंसे ऐसा ही प्रतीत होता है। शास्त्रचिन्तकोंने यह बात कही है कि गर्भिणी स्त्रीके मनमें जैसी अभिलाषा उत्पन्न होती है, वैसे ही गुणोंसे युक्त पुत्र उसके गर्भसे उत्पन्न होता है।
तब राजकुमारीने हाथ जोड़कर कहा—प्रभो! आपने जो कहा है, वह सत्य है। हमारे द्वारा चरु-परिवर्तनका अपराध हो गया है तथापि मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे मेरा पुत्र ब्राह्मणोचित गुणोंसे सम्पन्न हो।
ऋचीक बोले—जो कुछ भी ब्राह्मणोचित तेज और गुण है, वह सब मैंने तुम्हारे चरुमें स्थापित कर दिया था और तुम्हारी माताके चरुमें क्षत्रियोचित क्षत्रियतेजका आधान किया था। अतः मैं शास्त्रके विरुद्ध उसमें उलट-फेर कैसे कर सकता हूँ। तुम्हारी प्रार्थनासे इतना ही कर सकता हूँ कि तुम्हारा पुत्र क्षत्रियोचित गुणसे युक्त न होकर पौत्र वैसे गुणोंसे विभूषित होगा। वह अपने क्षात्र-तेजके कारण युद्धमें शत्रुओंके लिये दुर्धर्ष होगा।
तत्पश्चात् मुनिके इस सत्य वरदानको पाकर सती साध्वी राजकुमारीका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उसने अपनी मातासे पतिकी कही हुई सब बातें बतायीं। इसके बाद दसवें महीनेमें पुष्य नक्षत्र आनेपर राजकुमारीने बालसूर्यके समान तेजस्वी ब्रह्मतेजसे सुशोभित तपस्याके निधान और परम पवित्र पुत्रको जन्म दिया, जो तीनों लोकोंमें जमदग्निके नामसे विख्यात हुए। जमदग्निके ही पुत्र महायशस्वी परशुराम हुए, जिन्होंने पितामह ऋचीक मुनिके दिये हुए क्षात्रतेजके प्रभावसे इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य किया था।
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