संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सूतजीने कहा—महर्षियो! प्राचीन कालमें भृगुके पुत्र महामुनि ऋचीक प्रसिद्ध महात्मा थे। वे व्रत-स्वाध्यायमें तत्पर, तपस्वी और महायशस्वी थे। एक समय मुनीश्वर ऋचीकजी तीर्थयात्राके प्रसंगसे घूमते हुए भोजकट नामक स्थानमें गये। वहाँ राजा गाधि राज्य करते थे। त्रिभुवनविख्यात कौशिकी नदी वहीं बहती है। ऋचीकजी वहाँ कौशिकी नदीमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण कर तटपर बैठे तथा ध्यानस्थ होकर जप करने लगे। इतनेमें ही वहाँ सर्वगुणसम्पन्ना राजकन्या आयी। उसे देखकर मुनिने निकटवर्ती मनुष्योंसे पूछा—'यह साध्वी कन्या किसकी पुत्री है और किसलिये यहाँ आयी है?'
लोगोंने कहा—यह महाराज गाधिकी त्रिभुवनसुन्दरी कन्या है, जो सर्वगुणसम्पन्न उत्तम पतिकी इच्छा रखती हुई यहाँ गौरीजीकी पूजाके लिये अन्तःपुरसे आयी है। इस नदीके तटपर यह जो बहुत बड़ा मन्दिर सुशोभित है, इसमें सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित उमादेवी निवास करती हैं। यह राजकन्या मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः पूजन करके भाँति-भाँतिके नैवेद्य भोग लगावेगी और वीणा बजाकर कानोंको सुख देनेवाला मधुर संगीत सुनावेगी। तत्पश्चात् जब सूर्यका ताप कुछ कम होगा, तब यह अपने महलमें पधारेगी।
उन मनुष्योंका यह वचन सुनकर ऋचीक मुनि राजा गाधिके घर गये। उन्हें सहसा अपने घरपर आया देख नृपश्रेष्ठ गाधि शीघ्र उनके सम्मुख गये और शास्त्रोक्त विधिसे उनका पूजन करके बोले—'विप्रवर! यद्यपि आप स्वभावसे ही निःस्पृह हैं, तथापि अपने आगमनका कारण बताइये।'
ऋचीकजीने कहा—राजेन्द्र! आपके एक सुन्दरी कन्या है, जो अब वरके योग्य हो गयी है। आप ब्राह्म-विवाहकी विधिसे वह कन्या मुझे दीजिये। पार्वतीजीके पूजनके निमित्त गयी हुई उस कन्याको मैंने देखा है।
यह सुनकर नृपश्रेष्ठ गाधि भयभीत हो गये। 'एक तो मुनि अपने समान वर्णके नहीं थे, दूसरे दरिद्र और बूढ़े थे, फिर भी कन्या न देनेपर उनसे शाप मिलनेका डर था।' यह सब सोचकर राजाने कहा—'विप्रवर! हमने कन्यादानके लिये शुल्क नियत कर रखा है। यदि वह आप दे सकेंगे तब निश्चय ही आपको अपनी कन्या दूँगा।'
ऋचीकजीने पूछा—नृपश्रेष्ठ! कन्याका शुल्क क्या है, यह आप मुझे बताइये।
गाधि बोले—द्विजेन्द्र! वायुके समान वेगवाले श्वेत रंगके सात सौ घोड़े, जिनका एक-एक कान श्याम रंगका हो, मेरी कन्याके शुल्करूपमें प्राप्त होने चाहिये।
'बहुत अच्छा' कहकर मुनिश्रेष्ठ ऋचीक कान्यकुब्ज देशमें गये और गंगाके किनारे बैठकर राजा गाधिके बताये अनुसार श्यामकर्ण घोड़ोंकी प्राप्तिके लिये विनियोगपूर्वक ऋषि, छन्द और देवताका स्मरण करके 'अश्वो वोलहा' इत्यादि चौंसठ ऋचाओंवाले सूक्तका जप करने लगे। तब वे अश्व गंगाजीके जलसे प्रकट हो गये। उन सबका रंग श्वेत और एक-एक कान श्याम था। वे सभी बड़े वेगशाली अश्व थे, उनके साथ उतने ही सवार भी थे। तबसे गंगाके शुभ पुण्यतटपर वह स्थान भूतलमें अश्वतीर्थके नामसे विख्यात हुआ।
उन विश्वासपात्र पुरुषोंके साथ सात सौ घोड़ोंको पाकर ऋचीक मुनि उस स्थानपर गये, जहाँ राजा गाधि रहते थे। वहाँ पहुँचकर मुनिने कन्याके लिये वे उत्तम अश्व राजाको समर्पित किये। तब राजा गाधिने उन घोड़ोंको ग्रहण करके गृह्यसूत्रोक्त विधिसे ब्राह्मण और अग्निकी साक्षितामें वह त्रिभुवनसुन्दरी कन्या ऋचीक मुनिको ब्याह दी। विवाह हो जानेपर ऋचीक मुनि अपनी स्त्रीकी ओरसे निष्काम हो गये और बोले—'सुन्दरी! मैं तपस्याके लिये वनमें जाऊँगा, तुम कोई वर माँगो!'
उनका वह वचन सुनकर राजकुमारी दुःखी होकर अपनी माताके पास गयी और मुनिने जो कुछ कहा था, वह सब कह सुनाया। उसे सुनकर माताने कहा—'बेटी! यदि तुम्हारे पति तुम्हें