संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1188, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११५९
चण्डशर्माके द्वारा सत्ताईस शिवलिंगोंका पूजन, शिवकृपाप्राप्ति, ऋचीक मुनिका गाधिपुत्रीके साथ विवाह और जमदग्निका जन्म
सूतजी कहते हैं—चण्डशर्मा नामक एक ब्राह्मण था, जिसे नागर ब्राह्मणोंने किसी कारणसे जातिच्युत घोषित करके चमत्कारपुरसे बाहर कर दिया था। चण्डशर्मा नगरसे बाहर सरस्वती नदीके तटपर कुटिया बनाकर रहने लगा। वह सरस्वतीमें स्नान करके पवित्र और एकाग्रचित्त हो षडक्षरमन्त्रका जप करता और सत्ताईस लिंगोंके पृथक्-पृथक् नामका नमस्कारान्त उच्चारण करके जपता था। पंककी मिट्टी लेकर पाँच अँगुलके सत्ताईस शिवलिंग बनाकर उनकी स्थापना करता और पुष्प-धूप एवं चन्दन आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक उन सबकी पूजा करता था। फिर परम श्रद्धापूर्वक प्राणरुद्रसम्बन्धी मन्त्रोंको जपता था। 'शिवलिंग अच्छी स्थितिमें हो या बुरी स्थितिमें, किसी भी दशामें उसको अपने स्थानसे विचलित न करे।' ऐसा मानकर द्विजश्रेष्ठ चण्डशर्मा उन शिवलिंगोंका कभी विसर्जन नहीं करता था। उनके ऊपर-ऊपर वह प्रतिदिन पंकमय सत्ताईस शिवलिंगोंको स्थापित करता जाता था। इस प्रकार दीर्घकालमें वहाँ पंकका पर्वत-सा खड़ा हो गया। तब उसकी भक्तिकी अधिकता देखकर महादेवजी बहुत सन्तुष्ट हुए और धरतीको भेदकर उसे अपने दिव्यलिंगका दर्शन कराया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा—'चण्डशर्मन्! मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे सिवा और दूसरा भी जो कोई इन सत्ताईस लिंगोंका इस प्रकार पूजन करेगा, वह भी कल्याणका भागी होगा।'
ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। चण्डशर्माने भी उनके प्रत्यक्ष प्रकट हुए दिव्य लिंगमय स्वरूपका यथावत् पूजन किया और उसके लिये उत्तम मन्दिरका निर्माण कराया। उसीसे वह शिवलिंग नगरेश्वरके नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार शिवलिंगकी स्थापना करके विप्रवर चण्डशर्माने पुष्प, धूप और चन्दन आदिके द्वारा भगवान् शिवकी पूजा की। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् नगरेश्वरके प्रसादसे वह साक्षात् शिवधाममें चला गया। चण्डशर्माकी पत्नी शाकम्भरीने सरस्वती नदीके तटपर श्रीदुर्गादेवीको स्थापित किया तथा उत्तम भक्ति से दिन-रात उनकी आराधना की। तब उसपर प्रसन्न होकर दुर्गादेवीने कहा—'बेटी शाकम्भरी! मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'
शाकम्भरी बोली—देवि! चमत्कारपुरमें जो प्रसिद्ध चौंसठ मातृकागण हैं, वे सब सन्तुष्ट हों।
देवीने कहा—जो आश्विन शुक्ला महानवमीके दिन मेरे आगे आकर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, उसे पूर्ण फलकी प्राप्ति होगी। विशेषतः नागर ब्राह्मणकी की हुई पूजा अवश्य सफल होगी। यह सब मैंने सत्य कहा है।
ऐसा कहकर देवी दुर्गा अदृश्य हो गयीं। शाकम्भरीद्वारा स्थापित देवी दुर्गा उसीके नामसे प्रसिद्ध हुईं।
तबसे लेकर सरस्वतीके पुण्यतटपर बाह्य नागर ब्राह्मणोंका एक महान् स्थान बन गया। पुत्र-पौत्र तथा दौहित्र आदिसे युक्त होकर उन सबकी संख्या बहुत बढ़ गयी और विद्या तथा महान् वैभवकी दृष्टिसे वह स्थान चमत्कारपुरसे भी अधिक विख्यात हुआ। तदनन्तर किसी समय विश्वामित्रजीने क्रोध करके सरस्वतीको शाप दे रक्त बहानेवाली कर दिया। तब वे बाह्य नागर सरस्वती नदीको छोड़कर वहाँसे दूर चले गये और नर्मदाके पावन तटपर मार्कण्डेय मुनिके आश्रमके समीप निवास करने लगे।
ऋषियोंने पूछा—बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने सरस्वतीको किस कारण शाप दिया?