संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११५७
नागरखण्ड ( उत्तरार्ध )
सब पापोंकी शुद्धिके लिये पुरश्चरणसप्तमी व्रतकी विधि एवं महिमा
ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! किस समय और किस विधिसे पुरश्चरण करना चाहिये?
सूतजीने कहा—पूर्वकालमें महामुनि मार्कण्डेयजीने हरिश्चन्द्र-पुत्र राजा रोहिताश्वके पूछनेपर जो कुछ कहा है, वही प्रसंग मैं सुनाता हूँ।
रोहिताश्व बोले—मुने! मनुष्य ज्ञानसे अथवा अज्ञानसे जो पाप करता है, उसके नाशका कोई उपाय मुझे बताइये।
मार्कण्डेयजी बोले—संसारमें मनुष्योंको मानसिक, वाचिक और शारीरिक तीन प्रकारका पाप लगता है। इनमेंसे मनुष्योंको जो मानस पाप लगता है, वह पश्चात्ताप करनेसे तत्क्षण नष्ट हो जाता है; परंतु जो वाचिक और कायिक पाप हैं, वे बिना भोगे नष्ट नहीं होते अथवा पुरश्चरणद्वारा उन्हें दूर किया जा सकता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे अपना पाप निवेदन करके उनके बताये अनुसार शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त करे। इससे मनुष्य शुद्ध होता है अथवा राजा जब उस पापको जानकर तदनुकूल दण्ड देता है, तब वह मनुष्य उस पापसे शुद्ध हो जाता है। जो लज्जावश श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे अपना पाप नहीं कहता तथा राजा भी जिसके पापको नहीं जान पाता, जो शरीरमें ही उस पापको लिये जाता है, उसको दण्ड देनेवाले साक्षात् वैवस्वत यम हैं। इसलिये विज्ञपुरुषको पूर्ण प्रयत्न करके ब्राह्मणोंके बताये अनुसार प्रायश्चित्त करना चाहिये।
रोहिताश्व बोले—मुनीश्वर! मनुष्य नित्य ही सब ओर सूक्ष्म पाप करता है, उन सबके लिये प्रायश्चित्त करनेकी शक्ति कैसे हो सकती है?
मार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! एक पुरश्चरण-सप्तमी नामक पुण्यदायक व्रत है, जिसका अनुष्ठान करनेसे यमराजके पिता भगवान् सूर्य जन्मभरके संचित पापोंका नाश कर देते हैं। महाराज! तुम भी उसी व्रतको करो, जिससे समस्त शारीरिक पापोंसे मुक्त हो जाओगे।
रोहिताश्व बोले—मुनिश्रेष्ठ! पुरश्चरण-सप्तमी व्रतका अनुष्ठान किस समय किस विधिसे करना चाहिये?
मार्कण्डेयजी बोले—माघ मासके शुक्ल पक्षमें जब सूर्य मकर राशिपर स्थित हों, तब रविवार-युक्त सप्तमीको इस व्रतका आचरण करना चाहिये। उस दिन पाखण्डी और पतित मनुष्योंसे बात नहीं करनी चाहिये। प्रातःकाल दातुन करके निम्नांकित मन्त्रसे व्रतका नियम ग्रहण करना चाहिये—
पुरश्चरणकृत्यायां सप्तम्यां दिवसाधिप।
उपवासं करिष्यामि अद्य त्वं शरणं मम॥
'दिनेश! आज पुरश्चरणसप्तमीको मैं उपवास करूँगा, आप मुझे शरण दें, सहायक हों।'
तदनन्तर अपराह्नकालमें स्नान करके धुला हुआ वस्त्र पहनकर पवित्र हो भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका लाल रंगके फूलोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करे। उसके बाद पाद्यार्घ्यपूजन करे, फिर 'पतङ्गाय नमः' इस मन्त्रसे पैरोंकी, 'मार्तण्डाय नमः' से दोनों घुटनोंकी, 'दिवसनाथाय नमः' से गुह्यभागकी, 'द्वादशमूर्तये नमः' से नाभिकी, 'पद्महस्ताय नमः' से दोनों बाहुओंकी, 'तीक्ष्णदीधितये नमः' से हृदयकी, 'पद्मदलाभाय नमः' से कण्ठकी तथा 'तेजोमयाय नमः' से मस्तककी विधिवत् पूजा सम्पन्न करके कपूरका धूप निवेदन करे। तत्पश्चात् गुड़-भातका नैवेद्य अर्पण करे। उस नैवेद्यको लाल वस्त्रसे ढका हुआ रखे। इसी प्रकार लालरंगके सूत्रसे आवेष्टित दीप और आरती निवेदन करे। तदनन्तर शंखमें रक्तचन्दन-मिश्रित जल और फल लेकर अर्घ्य दे—