संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय—ये चार अक्षर जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकारके जीव बताये गये हैं।^१
पिताजी! यह भावार्थ बताया गया है। अब तत्त्वार्थ सुनिये। जो पुरुष इन देवताओंका आश्रय लेकर कर्मानुष्ठानमें तत्पर होते हैं, वे ही अर्द्धमात्रास्वरूप नित्यपद (सदाशिव)-में लीन होते हैं। चार प्रकारके जीवोंमेंसे कोई भी जब मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन देवताओंका भजन करता है, तभी उसे मुक्ति प्राप्त होती है। जिस शास्त्रमें पापी मनुष्योंके द्वारा ये देवता नहीं माने गये हैं, उस शास्त्रको यदि साक्षात् ब्रह्माजी भी कहें तो नहीं मानना चाहिये। ये सब देवता वैदिक मार्गमें सर्वत्र प्रतिष्ठित हैं। अतः जो दुरात्मा इन देवताओंका उल्लंघन करके तप, दान अथवा जप करते हैं, वे वायुप्रधान मार्गमें जाकर सर्दीसे काँपते रहते हैं। अहो! अजितेन्द्रिय मनुष्योंके मोहकी महिमा तो देखो। वे पापी मातृका पढ़ते हैं, परंतु इन देवताओंको नहीं मानते।
सुतनु कहते हैं—पुत्रकी यह बात सुनकर पिताको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने और भी बहुत-से प्रश्न पूछे। पुत्रने भी उनके प्रश्नोंके अनुसार ठीक-ठीक उत्तर दिया। मुने! मैंने भी उसी प्रकार तुम्हारे मातृकासम्बन्धी उत्तम प्रश्नका समाधान किया है। (२) अब पचीस वस्तुओंसे बने हुए गृहसम्बन्धी द्वितीय प्रश्नका उत्तर सुनिये। पाँच महा^२भूत, पाँच^३ कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञा^४नेन्द्रियाँ, पाँच^५ विषय—मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष—ये पचीस तत्त्व हैं। पचीसवाँ तत्त्व पुरुष है जो सदाशिवस्वरूप है। इन पचीस तत्त्वोंसे सम्पन्न हुआ यह शरीर ही घर कहलाता है। जो इस शरीरको इस प्रकार तत्त्वतः जानता है, वह कल्याणमय परमात्माको प्राप्त होता है।^६
(३) वेदान्तवादी विद्वान् बुद्धिको ही अनेक रूपोंवाली स्त्री कहते हैं; क्योंकि वही नाना प्रकारके विषयों अथवा पदार्थोंका सेवन करनेसे अनेक रूप ग्रहण करती है। किंतु अनेकरूपा होनेपर भी वह एकमात्र धर्मके संयोगसे एकरूपा ही रहती
१- औकारान्ता अकाराद्या मनवस्ते चतुर्दश। स्वायम्भुवश्च स्वारोचिरौत्तमो रैवतस्तथा ॥
तामसश्चाक्षुषः षष्ठस्तथा वैवस्वतोऽधुना। सावर्णिर्ब्रह्मसावर्णी रुद्रसावर्णिरेव वा ॥
दक्षसावर्णिरेवापि धर्मसावर्णिरेव च। रौच्यो भौत्यस्तथैवापि मनवोऽमी चतुर्दश ॥
श्वेतः पाण्डुस्तथा रक्तस्ताम्रः पीतश्च कापिलः। कृष्णः श्यामस्तथा धूम्रः सुपिशङ्गः पिशङ्गकः ॥
त्रिवर्णः शवलो वर्णैः कर्बुरश्च इति क्रमात्। वैवस्वत ऋकारश्च तात कृष्णः प्रपद्यते ॥
ककाराद्या हकारान्तास्त्रयस्त्रिंशच्च देवताः। ककाराद्याष्ठकारान्ता आदित्या द्वादश स्मृताः ॥
डकाराद्या वकारान्ता रुद्राश्चैकादशैव ते।
भकाराद्याः षकारान्ता अष्टौ हि वसवो मताः। सहौ चेत्यश्विनौ ख्यातौ त्रयस्त्रिंशदिति स्मृताः ॥
अनुस्वारो विसर्गश्च जिह्वामूलीय एव च। उपध्मानीय इत्येते जरायुजास्तथाऽण्डजाः ॥
स्वेदजाश्चोद्भिज्जाश्चापि पितर्जीवाः प्रकीर्तिताः।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २५४-२६२)
२- पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश। ३- वाक्, हाथ, पैर, गुदा और लिंग। ४- कान, नेत्र, रसना, नासिका और त्वचा। ५- शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श।
६- पञ्चभूतानि पञ्चैव कर्मज्ञानेन्द्रियाणि च। पञ्च पञ्चापि विषया मनोबुद्ध्यहमेव च ॥
प्रकृतिः पुरुषश्चैव पञ्चविंशः सदाशिवः। पञ्चपञ्चभिरेतैस्तु निष्पन्नं गृहमुच्यते ॥
देहमेतदिदं वेद तत्त्वतो यात्यसौ शिवम्।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २७२-२७४)