भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 132

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १०३


है। जो इस तत्त्वार्थको जानता है, वह (धर्मका आश्रय लेनेके कारण) कभी नरकमें नहीं पड़ता। (४) मुनियोंने जिसे नहीं कहा है तथा जो वचन देवताओंकी मान्यता नहीं स्वीकार करता, उसे विद्वानोंने विचित्र कथासे मुक्त बन्ध (वाक्यविन्यास) कहा है, तथा जो कामयुक्त वचन है वह भी इसी श्रेणीमें है।^१ (ऐसा वचन सुनने और मानने योग्य नहीं है। वास्तवमें वह बन्धन ही है।)

(५) अब पाँचवें प्रश्नका समाधान सुनिये। एकमात्र लोभ ही इस संसार-समुद्रके भीतर महान् ग्राह है। लोभसे पापमें प्रवृत्ति होती है, लोभसे क्रोध प्रकट होता है, लोभसे कामना होती है, लोभसे ही मोह, माया (शठता), अभिमान, स्तम्भ (जडता), दूसरेके धनकी स्पृहा, अविद्या और मूर्खता होती है। यह सब कुछ लोभसे ही उत्पन्न होता है। दूसरेके धनका अपहरण, परायी स्त्रीके साथ बलात्कार, सब प्रकारके दुस्साहसमें प्रवृत्ति तथा न करने योग्य कार्योंका अनुष्ठान भी लोभकी ही प्रेरणासे होता है। अपने मनको जीतनेवाले संयमी पुरुषको उचित है कि वह उस लोभको मोहसहित जीते। जो लोभी और अजितात्मा हैं, उन्हींमें दम्भ, द्रोह, निन्दा, चुगली और दूसरोंसे डाह—ये सब दुर्गुण प्रकट होते हैं। जो बड़े-बड़े शास्त्रोंको याद रखते हैं और दूसरोंकी शंकाओंका निवारण करते हैं, ऐसे बहुज्ञ विद्वान् भी लोभके वशीभूत होकर नीचे गिर जाते हैं। लोभ और क्रोधमें आसक्त मनुष्य सदाचारसे दूर हो जाते हैं। उनका अन्तःकरण छुरेके समान तीखा होता है। परंतु ऊपरसे वे मीठी बातें करते हैं। ऐसे लोग तिनकोंसे ढके हुए कुएँके समान भयंकर होते हैं। वे ही लोग केवल युक्तिवादका सहारा लेकर अनेकों पन्थ चलाते हैं। लोभवश मनुष्य समस्त धर्ममार्गोंका लोप कर देते हैं। लोभसे ही कुटुम्बीजनोंके प्रति निष्ठुरतापूर्ण बर्ताव करते हैं। कितने ही नीच मनुष्य लोभवश धर्मको अपना बाह्य आभूषण बना धर्मध्वजी होकर जगत्‌को लूटते हैं। वे सदा लोभमें डूबे रहनेवाले महान् पापी हैं। राजा जनक, युवनाश्व, वृषादर्भि, प्रसेनजित् तथा और भी बहुत-से राजा लोभका नाश करके स्वर्गलोकमें गये हैं। इसलिये जो लोग लोभका परित्याग करते हैं, वे ही इस संसार-समुद्रके पार जाते हैं। इनसे भिन्न लोभी मनुष्य ग्राहके चंगुलमें ही फँसे हुए हैं। इसमें संशय नहीं है।^२


१- बहुरूपं स्त्रियं प्राहुर्बुद्धिं वेदान्तवादिनः । सा हि नानार्थभजनान्नानारूपं प्रपद्यते ॥
धर्मस्यैकस्य संयोगाद्बहुधाप्येकिकैव सा । इति यो वेद तत्त्वार्थं नासौ नरकमाप्नुयात् ॥
मुनिभिर्यच्च न प्रोक्तं यन्न मन्येत देवताम् । वचनं तद् बुधाः प्राहुर्बन्धं चित्रकथं त्विति ॥
यच्च कामान्वितं वाक्यं......................।
(स्क० पु० मा० कुमा० ३। २७४-२७७)

२- .............पञ्चमं चाप्यतः शृणु । एको लोभो महान् ग्राहो लोभात्पापं प्रवर्तते ॥
लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रवर्तते । लोभान्मोहश्च माया च मानः स्तंभः परेप्सुता ॥
अविद्याऽप्रज्ञता चैव सर्वं लोभात् प्रवर्तते । हरणं परवित्तानां परदाराभिमर्शनम् ॥
साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रियास्तथा । स लोभः सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना ॥
दम्भो द्रोहश्च निन्दा च पैशुन्यं मत्सरस्तथा । भवन्त्येतानि सर्वाणि लुब्धानामकृतात्मनाम् ॥
सुमहन्त्यपि शास्त्राणि धारयन्ति बहुश्रुताः । छेत्तारः संशयानां च लोभग्रस्ता व्रजन्त्यधः ॥
लोभक्रोधप्रसक्ताश्च शिष्टाचारबहिष्कृताः । अन्तःक्षुरा वाङ्‌मधुराः कूपाश्छन्नास्तृणैरिव ॥
कुर्वते ये बहून् मार्गान्स्तांस्तान् हेतुबलान्विताः । सर्वं मार्गं विलोपयन्ति लोभाज्ज्ञातिषु निष्ठुराः ॥
धर्मावतंसकाः क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् । एतेऽतिपापिनः सन्ति नित्यं लोभसमन्विताः ॥

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