भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 133
९०४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विप्रवर ! अब आप ब्राह्मणके आठ भेदोंका वर्णन सुनें—मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनूचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि—ये आठ प्रकारके ब्राह्मण श्रुतिमें पहले बताये गये हैं। इनमें विद्या और सदाचारकी विशेषतासे पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। जिसका जन्म-मात्र ब्राह्मण-कुलमें हुआ है, वह जब जातिमात्रसे ब्राह्मण होकर ब्राह्मणोचित उपनयन-संस्कार तथा वैदिक कर्मोंसे हीन रह जाता है, तब उसको ‘मात्र’ ऐसा कहते हैं। जो एक उद्देश्यको त्यागकर—व्यक्तिगत स्वार्थकी उपेक्षा करके वैदिक आचारका पालन करता है, सरल, एकान्तप्रिय, सत्यवादी तथा दयालु है, उसे ‘ब्राह्मण’ कहा गया है। जो वेदकी किसी एक शाखाको कल्प और छहों अंगोंसहित पढ़कर ब्राह्मणोचित छः कर्मोंमें संलग्न रहता है, वह धर्मज्ञ विप्र ‘श्रोत्रिय’ कहलाता है। जो वेदों और वेदांगोंका तत्त्वज्ञ, पापरहित, शुद्धचित्त, श्रेष्ठ, श्रोत्रिय विद्यार्थियोंको पढ़ानेवाला और विद्वान् है, वह ‘अनूचान’ माना गया है। जो अनूचानके समस्त गुणोंसे युक्त होकर केवल यज्ञ और स्वाध्यायमें ही संलग्न रहता है, यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करता है और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखता है, ऐसे ब्राह्मणको श्रेष्ठ पुरुष ‘भ्रूण’ कहते हैं। जो सम्पूर्ण वैदिक और लौकिक विषयोंका ज्ञान प्राप्त करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सदा आश्रममें निवास करता है, वह ‘ऋषिकल्प’ माना गया है। जो पहले ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होकर नियमित भोजन करता है, जिसको किसी भी विषयमें कोई सन्देह नहीं है तथा जो शाप और अनुग्रहमें समर्थ और सत्यप्रतिज्ञ है; ऐसा ब्राह्मण ‘ऋषि’ माना गया है। जो निवृत्तिमार्गमें स्थित, सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञाता, काम-क्रोधसे रहित, ध्याननिष्ठ, निष्क्रिय, जितेन्द्रिय तथा मिट्टी और सुवर्णको समान समझनेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको ‘मुनि’ कहते हैं। इस प्रकार वंश, विद्या और वृत्त (सदाचार)—से ऊँचे उठे हुए ब्राह्मण ‘त्रिशुक्ल’ कहलाते हैं। वे ही यज्ञ आदिमें पूजे जाते हैं।*

इस प्रकार आठ भेदोंवाले ब्राह्मणत्वका वर्णन


जनको युवनाश्वश्च वृषदर्थिः प्रसेनजित् । लोभक्षयाद्दिवं प्राप्तास्तथैवान्ये जनाधिपाः ॥
तस्मात्त्यजन्ति ये लोभं तेऽतिक्रामन्ति सागरम् । संसाराख्यमतोऽन्ये ये ग्राहग्रस्ता न संशयः ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २७७-२८७)

* अथ ब्राह्मणभेदांस्त्वमष्टौ विप्रावधारय ॥
मात्रश्च ब्राह्मणश्चैव श्रोत्रियश्च ततः परम् । अनूचानस्तथा भ्रूणो ऋषिकल्प ऋषिर्मुनिः ॥
इत्येतेऽष्टौ समुद्दिष्टा ब्राह्मणाः प्रथमं श्रुतौ । तेषां परः परः श्रेष्ठो विद्यावृत्तविशेषतः ॥
ब्राह्मणानां कुले जातो जातिमात्रो यदा भवेत् । अनुपेताक्रियाहीनो मात्र इत्यभिधीयते ॥
एकोद्देश्यमतिक्रम्य वेदस्याचारवानृजुः । स ब्राह्मण इति प्रोक्तो निभृतः सत्यवाग्घृणी ॥
एकां शाखां सकल्पां च षड्भिरङ्गैरधीत्य च । षट्कर्मनिरतो विप्रः श्रोत्रियो नाम धर्मवित् ॥
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः शुद्धात्मा पापवर्जितः । श्रेष्ठः श्रोत्रियवान् प्राज्ञः सोऽनूचान इति स्मृतः ॥
अनूचानगुणोपेतो यज्ञस्वाध्याय यन्त्रितः । भ्रूण इत्युच्यते शिष्टैः शेषभोजी जितेन्द्रियः ॥
वैदिकं लौकिकं चैव सर्वज्ञानमवाप्य यः । आश्रमस्थो वशी नित्यमृषिकल्प इति स्मृतः ॥
ऊर्ध्वरेता भवत्यग्रे नियताशी न संशयी । शापानुग्रहयोः शक्तः सत्यसन्धो भवेदृषिः ॥
निवृत्तः सर्वतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः । ध्यानस्थो निष्क्रियो दान्तस्तुल्यमृत्काञ्चनो मुनिः ॥
एवमन्वयविद्याभ्यां वृत्तेन च समुच्छ्रिताः । त्रिशुक्ला नाम विप्रेन्द्राः पूज्यन्ते सवनादिषु ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २८७-२९८)