संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १०७
नारदजीके द्वारा कलाप-ग्रामके ब्राह्मणोंको महीसागरसंगममें ले आना और वहाँ उन्हें भूमि आदि देकर पुण्यस्थानकी स्थापना करना
नारदजी कहते हैं—अर्जुन! इस प्रकार अपने प्रश्नोंका समाधान सुनकर मेरे सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया। तब मैंने अपने स्वरूपको प्रकट करके उन ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा—'अहो!
मेरे पिता ब्रह्माजी धन्य हैं, जिनकी सृष्टिके बालक भी आप-जैसे ब्राह्मणशिरोमणिके रूपमें विद्यमान हैं। मुझे अपने जन्मका फल प्राप्त हो गया, क्योंकि आप-जैसे निष्पाप और उपद्रवशून्य महात्माओंका मैंने दर्शन किया।'
इतना सुनते ही वे शातातप आदि ब्राह्मण सहसा उठकर खड़े हो गये और अर्घ्य, पाद्य आदि पूजा-सामग्रियोंसे मेरे स्वागत-सत्कारमें लग गये। तत्पश्चात् साधुजनोचित वाणीमें वे इस प्रकार बोले—'हम धन्य हैं, क्योंकि आप साक्षात् देवर्षि नारद यहाँ हमलोगोंके समीप पधारे हैं। देवर्षे! कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है और अब कहाँ जानेका विचार है? मुनिश्रेष्ठ! इस आश्रमपर पधारनेकी क्या आवश्यकता थी, वह कार्य आप हमें बतावें।'
नारदजी बोले—मैं ब्रह्माजीके आदेशसे मही-सागरसंगम नामक महातीर्थमें ब्राह्मणोंको उत्तम स्थान दान करना चाहता हूँ। इसके लिये आपलोग मुझे आज्ञा दें।
मेरे ऐसा कहनेपर शातातपने सब ब्राह्मणोंकी ओर दृष्टि डालकर यों कहना आरम्भ किया—'नारदजी! यह सत्य है कि भारतवर्ष देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। उसमें भी महीसागरसंगमके विषयमें तो क्या कहना है, जहाँ स्नान करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण महातीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। आपके प्रस्तावमें एक ही महान् दोष है, जिससे हमलोग निरन्तर डरते रहते हैं। वहाँ बहुतसे निर्दयी और दुस्साहसपूर्ण कर्म करनेवाले चोर हैं, जो हमारे-जैसे तपस्वियोंका धन हर लेते हैं। स्पर्श वर्णोंमें जो सोलहवाँ और इक्कीसवाँ अक्षर है वही हमारा धन है। उस धनसे हीन हो जानेपर हमारा जन्म कैसा निरर्थक हो जायगा। हम चोरोंके हाथमें न पड़ें, यही हमारी अभिलाषा है।'
अर्जुनने पूछा—ब्रह्मन्! वे चोर कौन हैं और कौन-सा धन हर लेते हैं।
नारदजीने कहा—कुन्तीनन्दन! 'काम' और 'क्रोध' आदि दोष ही चोर हैं और 'तप' ही उन ब्राह्मणोंका धन है, जिसके अपहरणके भयसे उन्होंने मुझसे वैसी बात कही थी।
तब हारीत मुनि बोले—कौन अपनी मूढ़ बुद्धिके कारण महीसागरसंगम नामक तीर्थका त्याग करेगा, जहाँ स्वर्ग और मोक्ष हाथमें ही रहते हैं। हमारे हृदयमें भगवान् उमानाथका निवास है। वे दृढ़तापूर्वक हमारा पालन करते हैं। उनके रहते हुए वहाँ चोरोंका भय हमारा क्या कर लेगा। नारदजी! आपके कहनेसे मैं वहाँ चलूँगा।