संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मेरे परिवारमें छब्बीस हजार ब्राह्मण हैं, वे सब-के-सब अध्ययन, अध्यापन आदि छः कर्मोंमें तत्पर, बाहर-भीतरसे शुद्ध तथा लोभ और दम्भसे रहित हैं। उन सबके साथ मैं वहाँ चल सकता हूँ। यह मेरा उत्तम निश्चय है।
उनके ऐसा कहनेपर मैंने उन सब ब्राह्मणोंको अपने दण्डके ऊपर चढ़ा लिया और बड़ी प्रसन्नताके साथ सहसा आकाशमार्गसे लौट पड़ा। बीचमें सौ योजनतक हिमका मार्ग है। उसे लाँघकर उन ब्राह्मणोंके साथ मैं केदारक्षेत्रमें आ पहुँचा। वह हिम-प्रदेश आकाशमार्गसे या बिलके मार्गसे तथा भगवान् कार्तिकेयके प्रसादसे लाँघा जा सकता है। इसके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है।
अर्जुनने पूछा—नारदजी! कलाप-ग्राम कहाँ है? उसका मार्ग बिलके द्वारा किस प्रकार लाँघा जा सकता है तथा स्वामिकार्तिकेयका कृपा-प्रसाद कैसे प्राप्त होगा? ये सब बातें मुझे बताइये।
नारदजी बोले—केदारक्षेत्रसे आगे सौ योजनतक हिमसंयुक्त प्रदेश माना गया है। उसके अन्तमें सौ योजन विस्तारवाला कलाप-ग्राम है, उसके अन्तमें सौ योजनतक बालूका समुद्र बताया जाता है। उसके बाद सौ योजन विस्तारवाला वह प्रदेश है, जिसे भूमिसवर्ग कहते हैं। बिलके मार्गसे वहाँ जिस प्रकार जाना हो सकता है, उसे सुनो। अन्न और जलका त्याग करके उपवासपूर्वक दक्षिण दिशावर्ती भगवान् कार्तिकेयकी आराधना करे। कार्तिकेयजी जब साधकको पापरहित हुआ मानते हैं तब स्वप्नमें प्रकट होकर आदेश देते हैं कि तुम अभीष्ट स्थानकी यात्रा करो। कार्तिकेयजीके स्थानसे पश्चिम एक बहुत बड़ी गुफा है, वह सात सौ योजन दूरतक गयी हुई है। कार्तिकेयजीकी आज्ञा मिलनेके पश्चात् उसीमें प्रवेश करके आगे बढ़ना चाहिये। उसके भीतर मरकतमणिका एक शिवलिंग है, जो सूर्यके समान प्रकाश करनेवाला है। उस शिवलिंगके आगे अत्यन्त स्वच्छ सुवर्णके रंगकी मिट्टी मिलती है। वहाँ शिवलिंगको नमस्कार करके तथा उस पीली मिट्टीको हाथमें लेकर स्तम्भ तीर्थमें आना चाहिये। वहाँ भगवान् कुमार तथा वाराहदेवकी आराधना करके आधी रात होनेपर कुएँसे जल निकालना चाहिये। उस जल और मिट्टीसे दोनों आँखोंमें अंजन करना चाहिये। साथ ही सम्पूर्ण शरीरमें उस जल और मिट्टीका उबटन लगाना चाहिये। उस अंजनके प्रभावसे कदाचित् साठ कदम चलनेपर उसे एक सुन्दर बिल दिखायी देता है। तदनन्तर उस बिलके भीतरसे होकर वह यात्रा करे। वहाँ कारीष नामक बड़े भयंकर कीड़े होते हैं, परंतु वे उस उबटनके प्रभावसे साधकको डँसते नहीं हैं। उस बिलके भीतर भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी सिद्ध पुरुषोंका दर्शन करते हुए साधक आगे बढ़ता है और परम उत्तम कलाप-ग्राममें पहुँच जाता है। वहाँके मनुष्योंकी आयु चार हजार वर्षकी बतलायी गयी है। वहाँ सब लोग फलोंका ही भोजन करते हैं।
इस प्रकार बिलके मार्गसे कलाप-ग्रामतक पहुँचनेकी विधि बतायी गयी है। अब आगे जो कुछ हुआ उसको श्रवण करो। अपनी तपस्याकी शक्तिसे अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करनेवाले उन ब्राह्मणोंको दण्डके अग्र भागपर रखकर मैं महीसागरसंगम तीर्थमें आया और वहाँ पवित्र जलाशयके तटपर उतारंकर उन्हें स्वतन्त्र कर दिया। फिर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ मैंने सम्पूर्ण दोषोंको दग्ध करनेके लये दावानलसदृश महीसागरसंगम तीर्थमें स्नान किया और देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करके परम उत्तम गायत्रीमन्त्रका जप करते हुए हम सब लोगं संगमके समीप बैठ गये। हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए भगवान् सूर्यकी ओर देखते रहे। इसी समय इन्द्र आदि देवता, सूर्य आदि सम्पूर्ण ग्रह, लोकपाल, आठ देव-जातियाँ, गन्धर्व तथा अप्सराओंके समूह—ये सब वहाँ आ पहुँचे। तदनन्तर महामुनि कपिलजी भी वहाँ आये और नारदजीसे इस प्रकार बोले—'देवर्षे ! मुझे आठ