संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 138, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १०९
हजार ब्राह्मण दीजिये। कलापग्रामके निवासी इन ब्राह्मणोंको मैं भूमिदान करूँगा। आप इसकी व्यवस्था करें।' तब मैंने उनसे प्रतिज्ञापूर्वक कहा—'महामुने! ऐसा ही हो। आप भी यहाँ उत्तम कपिलस्थानका निर्माण करें। श्राद्धमें अथवा श्राद्धोपयोगी समय प्राप्त होनेपर जिसके आश्रममें आया हुआ अतिथि विमुख लौट जाता है, उसका सब सत्कर्म निष्फल होता है। जो अतिथिका पूजन—स्वागत-सत्कार नहीं करता, वह रौरव नरकमें जाता है। जिसके द्वारा अतिथिका पूजन होता है, वह सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा स्वयं भी पूजित होता है।<sup>१</sup> इसलिये उस तीर्थमें दान और यज्ञके द्वारा मैंने कपिल मुनिको भोजन कराया।'
तत्पश्चात् मैंने श्रीमान् हारीत मुनिको उनका चरण पखारनेके लिये बुलाया। तब मैंने ब्राह्मणोंसे कहा—
पूर्वकालकी बात है, महर्षि अंगिराके कुलमें एक प्रसिद्ध ब्राह्मण हुए थे। वे महान् विद्वान् थे, परंतु प्रत्येक कार्यमें अधिक विलम्ब किया करते थे। उनके पिताका नाम महर्षि गौतम था। वे सब कार्य भलीभाँति सोच-विचारकर बहुत देरके बाद प्रारम्भ करते थे। उनके द्वारा चिरकालमें कार्य-सिद्धि होनेके कारण वे जनसाधारणमें चिरकारी कहे जाने लगे। एक बार चिरकारीकी मातासे कोई अपराध हो गया। उससे कुपित होकर उनके अदीर्घदर्शी पिताने अन्य सब पुत्रोंको छोड़कर केवल चिरकारीको आदेश दिया कि 'तुम अपनी इस माताको मार डालो।' उन्होंने बड़ी देरके बाद उत्तर दिया—'अच्छा, ऐसा ही करूँगा।' परंतु वे तो स्वभावसे ही चिरकारी थे। अपनी चिरकारिताका विचार करके चिरकालतक इस विषयमें सोच-विचार करते रहे। 'मैं पिताकी इस आज्ञाका पालन कैसे करूँ? अपनी माताको कैसे मारूँ? पिताके आज्ञापालनस्वरूप धर्मका बहाना लेकर इस मातृहत्यारूप अधर्ममें कैसे डूब जाऊँ? माना कि पिताकी आज्ञाका पालन सबसे बड़ा धर्म है; परंतु उसी प्रकार माताकी रक्षा भी तो मेरा अपना धर्म है। पुत्रत्व सर्वथा परतन्त्र है—पुत्र माता और पिता दोनोंके अधीन है। स्त्रीकी, उसमें भी माताकी हत्या करके कभी भी कौन सुखी रह सकता है? ऐसे ही, पिताकी भी अवहेलना करके कौन प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है? पुत्रके लिये यही उचित है कि पिताकी अवहेलना न करे। साथ ही उसके लिये माताकी रक्षा करना भी उचित है। शरीर आदि जो देनेयोग्य वस्तुएँ हैं, उन सबको एकमात्र पिता देते हैं, इसलिये पिताकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करना चाहिये। पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले पुत्रके पूर्वकृत पातक भी धुल जाते हैं। पिता स्वर्ग है, पिता धर्म है और पिता सर्वश्रेष्ठ तपस्या है। पिताके प्रसन्न होनेपर सब देवता प्रसन्न हो जाते हैं।<sup>२</sup> यदि पिता प्रसन्न है, तो पुत्रके सब पापोंका प्रायश्चित्त हो जाता है। वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। पुत्रके स्नेहसे कष्ट पाते हुए भी पिता उसके प्रति स्नेह नहीं छोड़ते। यह पिताका गौरव है, जिसपर पुत्रकी दृष्टिसे मैंने विचार किया है। पिताका छोटा-मोटा स्थान नहीं है। उनका पद बहुत ऊँचा है। अब मैं माताके विषयमें विचार करूँगा। मेरे इस मानव-जन्ममें जो यह पंचभूतोंका समुदायरूप शरीर प्राप्त हुआ है इसका कारण तो मेरी माता ही है। जिसकी माता जीवित है, वह सनाथ है। जो मातृहीन है, वह अनाथ है। पुत्र और पौत्रसे युक्त मनुष्य यदि सौ वर्षकी आयुके बाद भी अपनी माताके आश्रयमें जाता है, तो वह दो वर्षके बालककी भाँति आचरण
१- श्राद्धे वा प्राप्तकाले वा ह्यतिथिर्विमुखो भवेत्। यस्याश्रममुपायातस्तस्य सर्वं हि निष्फलम्॥
स गच्छेद्रौरवाँल्लोकान् योऽतिथिं नाभिपूजयेत्। अतिथिः पूजितो येन स देवैरपि पूज्यते॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४।५७-५८)
२- पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः। पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीणन्ति देवताः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४। ८९-९०)