भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

११० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करता है। पुत्र समर्थ हो या असमर्थ, दुर्बल हो या पुष्ट—माता उसका विधिवत् पालन करती है। माताके समान कोई तीर्थ नहीं है, माताके समान कोई गति नहीं है, माताके समान कोई रक्षक नहीं है तथा माताके समान कोई प्याऊ नहीं है। माता अपने गर्भमें धारण करनेके कारण 'धात्री' है, जन्म देनेवाली होनेसे 'जननी' है, अंगोंकी वृद्धि करनेके कारण 'अम्बा' है, वीर पुत्रका प्रसव करनेके कारण 'वीरप्रसू' कहलाती है, शिशुकी शुश्रूषा करनेसे वह 'शक्ति' कही गयी है तथा सदा सम्मान देनेके कारण उसे 'माता' कहते हैं।* मुनिलोग पिताको देवताके समान समझते हैं परंतु मनुष्यों और देवताओंका समूह माताके समीप नहीं पहुँच पाता—माताकी बराबरी नहीं कर सकता। पतित होनेपर गुरुजन भी त्याग देनेयोग्य माने गये हैं; परंतु माता किसी प्रकार भी त्याज्य नहीं है। कौशिकी नदीके तटपर स्त्रियोंसे घिरे हुए राजा बलिकी ओर वह देरतक देखती रही; केवल इसी अपराधवश पिताने मुझे अपनी माताको मार डालनेका आदेश दिया है।' चिरकारी होनेके कारण वे इन्हीं सब बातोंपर अधिक समयतक विचार करते रहे, परंतु उनकी चिन्ताका अन्त नहीं हुआ।

इसी समय उदारबुद्धिवाले मेधातिथि (गौतम) दुःखी हो आँसू बहाते हुए इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'अहो! पतिव्रता नारीका वध करके मैं पापके समुद्रमें डूब गया हूँ। अब कौन मेरा उद्धार करेगा? मैंने उदार विचारवाले चिरकारीको बड़ी शीघ्रतासे वह कठोर आज्ञा दे दी थी। यदि यह सचमुच चिरकारी हो तो मुझे पापसे बचा सकता है। चिरकारिक! तुम्हारा कल्याण हो। यदि आज भी अपने नामके अनुसार तुम चिरकार्य बने रहे, तभी वास्तवमें चिरकार्य हो। बेटा! तुम आज मुझे अपनी माताको तथा मेरे द्वारा उपार्जित तपस्याको बचाओ। चिरकारक! तुम पातक और भयसे अपनी भी रक्षा करो।' इस प्रकार अत्यन्त दुःखित हो चिन्ता करते हुए गौतम मुनि चिरकारीके पास आये। वहाँ आकर उन्होंने अपने पुत्र चिरकारीको माताके पास बैठे देखा। चिरकारी पिताको अपने समीप आया देख बहुत दुःखी हुए और हथियार फेंककर पिताके चरणोंमें मस्तक रखकर वे उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे। मेधातिथि पुत्रको पृथ्वीपर मस्तक रखकर पड़े देख और पत्नीको जीवित पाकर बड़े प्रसन्न हुए। जब पुत्र हाथमें हथियार लेकर खड़ा था, तब भी माताने ऐसा नहीं समझा कि यह मुझे मार डालेगा। अब उसे पिताके चरणोंमें पड़ा देख माता यह विचार करने लगी कि 'इसने हथियार उठानेकी जो चपलता की है, उसीको पिताके भयसे छिपा रहा है।' तदनन्तर पिताने बड़ी देरतक पुत्रकी ओर देखा। देरतक उसका मस्तक सूँघा। चिरकालतक उसे दोनों भुजाओंमें कसकर छातीसे लगाये रखा और अन्तमें कहा—'बेटा! तुम चिरजीवी


* नास्ति मात्रा समं तीर्थं नास्ति मात्रा समा गतिः। नास्ति मात्रा समं त्राणं नास्ति मात्रा समा प्रपा ॥
कुक्षौ सन्धारणाद्धात्री जननाज्जननी तथा। अङ्गानां वर्द्धनादम्बा वीरसूत्वेन वीरसूः ॥
शिशोः शुश्रूषणाच्छक्तिर्माता स्यान्माननाच्च सा। ... ... ... ... ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४। ९९-१०१)