भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * १११

रहो।' मेधातिथि बड़ी देरतक प्रसन्नतामें डूबे रहे। फिर पुत्रसे इस प्रकार बोले—'चिरकारिक ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी आयु चिरस्थायिनी हो। सौम्य ! तुमने चिरकालतक विलम्ब करके जो कार्य किया है, उसके कारण मुझे इस समय अधिक समयतक दुखी नहीं होना पड़ा है।'

तदनन्तर प्रसिद्ध विद्वान् मुनिश्रेष्ठ गौतमने गाथा गान किया, जो इस प्रकार है—'चिरकालतक विचार करके कोई मन्त्रणा स्थिर करे। स्थिर किये हुए मन्त्र (परामर्श)-को चिरकालके बाद छोड़े। चिरकालमें किसीको मित्र बनाकर उसे चिरकालतक धारण किये रहना उचित है। राग, दर्प, अभिमान, द्रोह, पापकर्म तथा अप्रिय कर्तव्यमें चिरकारी (विलम्ब करनेवाला) प्रशंसाका पात्र है। बन्धु, सुहृद्, भृत्य और स्त्रीवर्गके अव्यक्त अपराधोंमें जल्दी कोई दण्ड न देकर देरतक विचार करनेवाला पुरुष प्रशंसनीय माना गया है। चिरकालतक धर्मोंका सेवन करे। किसी बातकी खोजका कार्य चिरकालतक करता रहे। विद्वान् पुरुषोंका संग अधिक कालतक करे। इष्टमित्रोंका सेवन अथवा इष्टदेवताकी उपासना दीर्घकालतक करे। अपनेको चिरकालतक विनयशील बनाये रखनेवाला पुरुष दीर्घकालतक आदरका पात्र बना रहता है। दूसरा कोई भी यदि धर्मयुक्त वचन कहे तो उसे देरतक सुने और देरतक उसके विषयमें प्रश्न करता रहे। ऐसा करनेसे मनुष्य चिरकालतक तिरस्कारका पात्र नहीं बनता।

पर यदि कोई धर्मका कार्य आ गया हो तो उसके पालनमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। शत्रु हाथमें हथियार लेकर आता हो तो उससे आत्मरक्षा करनेमें देर नहीं लगानी चाहिये। यदि कोई सुपात्र व्यक्ति अपने समीप आ गया हो तो उसका सम्मान करने या उसे कुछ देनेमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। भयसे बचने और साधु पुरुषोंका स्वागत-सत्कार करनेमें भी देर नहीं करनी चाहिये। उपर्युक्त कार्योंमें जो विलम्ब करता है, वह प्रशंसाका पात्र नहीं है।'*

ऐसा कहकर स्त्री और पुत्रके साथ गौतम मुनि शान्तिको प्राप्त हुए। तदनन्तर चिरकालतक तपस्या करके उन्होंने दिव्यलोक प्राप्त किया।

यह बात मैंने उन सर्वगुणसम्पन्न ब्राह्मणोंके समक्ष वहाँ कही। तत्पश्चात् धर्मवर्माके समीप हारीत आदि मुनियोंके चरण पखारकर सम्पूर्ण देवताओंको साक्षी बनाकर मैंने संकल्पपूर्वक सुवर्ण, गौ, गृह, धन, स्त्री, वस्त्र और आभूषण आदि दे उन ब्राह्मणोंको कृतार्थ किया। इसके बाद उस देवसमाजमें इन्द्रने हाथ उठाकर कहा—'देवताओ! भगवान् शंकरके अर्द्धांगमें अपना वामार्द्ध भाग स्थापित करनेवाली देवी गिरिराजनन्दिनी जबतक विद्यमान हैं, गणेशजी, हम सब देवता और ये तीनों लोक जबतक मौजूद हैं, तबतक नारदजीके द्वारा स्थापित किया हुआ यह स्थान सदा समृद्धिशाली बना रहे। इस स्थानको नष्ट करनेवाले मनुष्यपर ब्रह्मशाप, विष्णुशाप, रुद्रशाप तथा ब्राह्मणशाप भी पड़े; क्योंकि तीर्थभूमिमें देवताओं और ब्राह्मणोंके


* चिरेण मन्त्रं संधीयाच्चिरेण च कृतं त्यजेत् । चिरेण विहितं मित्रं चिरं धारणमर्हति ॥
रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि । अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते ॥
बन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च । अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते ॥
चिरं धर्मान्निषेवेत कुर्याच्चान्वेषणं चिरम् । चिरमन्वास्य विदुषश्चिरमिष्टानुपास्य च ॥
चिरं विनीय चात्मानं चिरं यात्यनवज्ञताम् । ब्रुवतश्च परस्यापि वाक्यं धर्मोपसंहितम् ॥
चिरं पृच्छेच्च शृणुयाच्चिरं न परिभूयते । धर्मे शत्रौ शस्त्रहस्ते पात्रे च निकटस्थिते ॥
भये च साधुपूजायां चिरकारी न शस्यते ।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ४। १२०—१२६)