संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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द्रव्यका अपहरण करनेवाले और उनका अनुमोदन करनेवाले पापात्मा मनुष्य नरकमें सैकड़ों वर्षोंतक रुद्रतालकी मार खाते रहते हैं।'
तब सबने प्रसन्न होकर 'ऐसा ही हो, ऐसा ही हो' इस प्रकार कहा। इस प्रकार मेरे द्वारा स्थापित किये हुए स्थानमें महर्षि कपिलने कापिल नामक स्थानकी संस्थापना की। तदनन्तर सब देवता देवलोकको चले गये।
लोमशजीका राजा इन्द्रद्युम्नको अपने पूर्वजन्मका चरित्र सुनाकर शिवकी आराधनाका महत्त्व बतलाना
**अर्जुन बोले—**नारदजी! आपने महीसागरसंगमके अद्भुत माहात्म्यका वर्णन किया। उसे सुनकर मुझे बड़ा विस्मय और हर्ष हो रहा है। बताइये, किसके यज्ञमें मही नदी प्रकट हुई है?
**नारदजीने कहा—**पाण्डुनन्दन! प्राचीन कालमें इस पृथ्वीपर इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े दानी, सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता, माननीय पुरुषोंका सम्मान करनेवाले तथा सामर्थ्यशाली थे। वे उचित कार्योंके ज्ञाता, विवेकके निवासस्थान तथा गुणोंके समुद्र थे। भूमण्डलमें कोई भी ऐसा नगर, ग्राम या शहर नहीं था, जो राजाके द्वारा किये गये धर्मानुष्ठानके चिह्नोंसे अंकित न हो। उन्होंने ब्राह्मविवाहकी विधिसे अनेक बार कन्यादान किया था। वे धनार्थियोंको एक हजार स्वर्णमुद्रासे कम दान नहीं देते थे। दशमी तिथिके दिन रात्रिकालमें हाथीकी पीठपर नगाड़ा रखकर उनके सम्पूर्ण नगरमें बजाया जाता और यह घोषणा की जाती कि 'कल प्रातःकाल एकादशीका व्रत है, वह सबको करना चाहिये।' गंगाकी बालू, वर्षाकी धारा तथा आकाशके तारे कदाचित् विद्वान् पुरुषोंद्वारा गिने जा सकते हैं; परंतु महाराज इन्द्रद्युम्नके पुण्योंकी गणना नहीं की जा सकती। ऐसे पुण्योंके प्रभावसे राजा इन्द्रद्युम्न अपने मानव-शरीरसे ही विमानपर बैठकर ब्रह्माजीके लोकमें जा पहुँचे और वहाँ देवदुर्लभ भोगोंका उपभोग किया। इस प्रकार अनेक कल्प बीत जानेके बाद ब्रह्माजीने अपने लोकमें निवास करनेवाले राजा इन्द्रद्युम्नसे कहा—'राजन्! अब तुम पृथ्वीपर जाओ।'
राजाने ब्रह्माजीकी यह बात सुनी और सुननेके साथ ही अपनेको पृथ्वीपर आया हुआ देखा।
(उसके बाद राजा इन्द्रद्युम्न मार्कण्डेय मुनि, नाडीजंघ बक, प्राकारकर्ण उलूक, चिरायु गीधराज एवं मन्थर कछुएसे मिले और) वे बोले—स्वयं चार मुखवाले ब्रह्माने ही मुझे स्वर्गसे निकाल दिया है। इसके कारण मैं लज्जित हूँ, अतः बार-बार पतन होनेके दोषसे दूषित स्वर्गलोकमें अब मैं नहीं जाऊँगा। अब तो मैं अविद्या और पापका नाश करनेवाले विवेक-वैराग्यका आश्रय ले ज्ञान-प्राप्तिपूर्वक मोक्षके लिये यत्न करूँगा। इसलिये यदि आप अपने घरपर आये हुए मुझ अतिथिका आज सत्कार करना चाहते हैं तो मुझे ऐसे किसी