भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 142
  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ११३

गुरुका पता बता दीजिये जो मुझे इस संसारसागरसे पार कर देनेवाला हो।

कछुएने कहा—राजन्! लोमश नामवाले एक महामुनि हैं, जिनकी आयु मुझसे भी बड़ी है। पहले मैंने उन्हें कलाप-ग्राममें कहीं देखा था।

इन्द्रद्युम्न बोले—तब तो चलिये, हम सब लोग साथ ही उनके पास चलें, विद्वान् पुरुष सत्संगको तीर्थसे भी अधिक पवित्र बतलाते हैं।<sup></sup>

नारदजी कहते हैं—अर्जुन! तदनन्तर उन सबने कलाप-ग्राममें पहुँचकर महामुनि लोमशके दर्शन किये। वे मन और इन्द्रियोंके संयममें तत्पर तथा क्रियायोगमें संलग्न थे। तीनों काल स्नान करनेसे उनकी जटाएँ कुछ पीली पड़ गयी थीं, उन्हींको अपने मस्तकपर धारण किये हुए, घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निकी भाँति अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उन्होंने छाया करनेके लिये अपने बायें हाथमें एक मुट्ठी तृण ले रखा था और दाहिने हाथमें रुद्राक्षकी माला धारण कर रखी थी। वे महामुनि मैत्र मार्गमें स्थित थे। जो कटुवचन आदिके द्वारा पृथ्वीपर रहनेवाले प्राणियोंको पीड़ा न देते हुए केवल जपसे सिद्धि प्राप्त कर लेता है वह मुनि 'मैत्र' कहलाता है।<sup></sup> राजा, मुनि, बक, उलूक, गृध्र और कछुएने कलाप-ग्राममें उन पुरातन तपोनिधि महात्माका दर्शन करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया। मुनिने भी आसन आदि देकर स्वागत-सत्कारके द्वारा उन सबको प्रसन्न किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपना मनोगत कार्य निवेदन किया।

कछुआ बोला—भगवन्! ये यज्ञ करनेवाले पुरुषोंमें अग्रगण्य महाराज इन्द्रद्युम्न हैं। वसुधामें इनकी कीर्तिका लोप हो जानेसे ब्रह्माजीने इन्हें स्वर्गसे निकाल दिया है। अब ये स्वर्गकी इच्छा नहीं रखते। वहाँसे पुनः गिरनेका भय बना रहता है। इसलिये स्वर्ग इन्हें भयानक प्रतीत होता है। अब आपके अनुग्रहसे ये मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं। अतएव मैं इन्हें आपके पास ले आया हूँ, इन्हें आप अपना शिष्य समझें और इनके मनोवाञ्छित प्रश्नोंका उत्तर दें, क्योंकि परोपकार साधुपुरुषोंका व्रत है।

लोमशजीने कहा—कूर्म! तुम्हारा कथन उचित ही है। राजन्! तुम्हारे मनमें क्या सन्देह है सो बताओ।

इन्द्रद्युम्न बोले—भगवन्! मेरा पहला प्रश्न यह है कि गरमीका समय है, सूर्यदेव आकाशके मध्यमें आकर तप रहे हैं, तो भी आपने अपने लिये कोई कुटी क्यों नहीं बनायी, जो हाथमें तिनके लेकर आप मस्तकपर छाया किये हुए हैं।

लोमशजीने कहा—राजन्! एक दिन मरना अवश्य है। यह शरीर गिर जायगा, फिर इस अनित्य संसारमें रहनेवाले मनुष्योंद्वारा किसके लिये घर बनाया जाता है। दाँत चले जाते हैं, लक्ष्मी चली जाती है तथा यौवन और जीवन भी चला जानेवाला है। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब अत्यन्त चंचल (क्षणभंगुर) है। ऐसी दशामें दान करना ही मनुष्योंके लिये सर्वोत्तम गृह है। इस प्रकार संसारको असार और चलायमान जान लेनेपर किसके लिये कुटी आदिका संग्रह किया जाय।

इन्द्रद्युम्नने पूछा—भगवन्! तीनों लोकोंमें केवल आप ही चिरायु सुने जाते हैं, इसीलिये मैं आपके पास आया हूँ। फिर आपके मुँहसे ऐसी बात क्यों निकलती है?

लोमशजीने कहा—राजन्! प्रत्येक कल्पमें मेरे शरीरसे एक रोम टूटकर गिर जाता है। जिस


१- प्राहुः पूततमां तीर्थादपि सत्संगतिं बुधाः।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ९।४९)
२- अहिंसयन्दुरुक्ताद्यैः प्राणिनो भूमिचारिणः। यः सिद्धिमेति जप्येन स मैत्रो मुनिरुच्यते॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० १०।४)