भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 143

१९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


दिन सब रोएँ नष्ट हो जायँगे, उस दिन मेरी मृत्यु हो जायगी। देखो, मेरे घुटनेमें दो अंगुलतक रोएँसे खाली हो गया है। इसीसे मैं डरता हूँ, जब मरना ही है तब घर बनाकर क्या होगा?

इन्द्रद्युम्न बोले—ब्रह्मन्! मैं पूछता हूँ कि आपको जो ऐसी बड़ी आयु प्राप्त हुई है वह दानका प्रभाव है अथवा तपस्याका?

लोमशजीने कहा—राजन्! सुनो, मैं अपने पूर्वजन्मका प्रसंग सुना रहा हूँ। यह कथा शिवधर्मकी महिमासे युक्त, पुण्यदायिनी तथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। पूर्वकालमें मैं इस पृथ्वीपर अत्यन्त दरिद्र शूद्र होकर उत्पन्न हुआ था। उस समय भूखसे बहुत पीड़ित होकर पृथ्वीपर भ्रमण किया करता था। एक दिन दोपहरके समय जलके भीतर मैंने एक बहुत बड़ा शिवलिंग देखा। फिर उस जलाशयमें प्रवेश करके जल पीया और स्नान किया। तत्पश्चात् कमलके सुन्दर फूलोंसे उस नहलाये हुए शिवलिंगका पूजन किया। भूखसे मेरा गला सूखा जा रहा था। भगवान् नीलकण्ठको नमस्कार करके मैं पुनः आगे चल दिया। उस मार्गमें ही मेरी मृत्यु हो गयी। तदनन्तर दूसरे जन्ममें मैं ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुआ। एक ही बार शिवलिंगको नहलाने और पूजा करनेसे मुझे अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रहने लगा। 'यह सम्पूर्ण जगत् जो सत्य-सा प्रतीत हो रहा है, मिथ्याका विलास है, अविद्या ही इसका मूलकारण है।' ऐसा जानकर मैंने मूकता धारण कर ली। उस ब्राह्मणने भगवान् शंकरकी भलीभाँति आराधना करके वृद्धावस्थामें मुझे प्राप्त किया था। इसलिये मेरा नाम ईशान रखा। मेरे माता-पिताके मनको महामायाने ममतामें बाँध रखा था। वे मेरा गूँगापन दूर करनेके लिये नाना प्रकारके मन्त्र-यन्त्र तथा दूसरे उपाय भी किया करते थे। उनकी वह मूढ़ता देखकर मुझे मन-ही-मन हँसी आती थी। कुछ कालके पश्चात् जब मैं जवान हुआ, तो रातमें अपना घर छोड़कर निकल जाता और कमलके फूलोंसे भगवान् शिवकी पूजा करके पुनः शयनस्थानपर लौट आता था। तदनन्तर पिताकी मृत्यु हो जानेपर मेरे सम्बन्धियोंने मुझे निरा गूँगा समझकर त्याग दिया। इससे मुझे प्रसन्नता ही हुई। अब मैं फलाहार करके रहने लगा और भाँति-भाँतिके कमलोंसे भगवान् भूतनाथकी पूजा करने लगा। इस प्रकार सौ वर्ष बीतनेपर वरदायक भगवान् चन्द्रशेखरने मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय मैंने याचना की—'भगवन्! मेरी जरा और मृत्युका नाश हो।'

तब भगवान् शिव बोले—जो नाम और रूप धारण करता है वह सर्वथा अजर-अमर नहीं हो सकता। अतः तुम अपने जीवनकी कोई सीमा निश्चित करो।

भगवान् शिवका यह वचन सुनकर मैंने इस प्रकार वरदान माँगा—'प्रत्येक कल्पके अन्तमें मेरे शरीरका एक रोम गिरे और इस प्रकार सब रोम गिर जानेपर मेरी मृत्यु हो, उसके बाद मैं आपका गण होऊँ, यही मेरा अभीष्ट वर है।' 'अच्छा, ऐसा ही होगा' यों कहकर भगवान् शिव अदृश्य हो गये और मैं तभीसे तपस्यामें संलग्न हो गया। ब्रह्म-कमल अथवा अन्य कमलोंसे भगवान्